मंगलवार को महंगाई का चौतरफा और भयानक वार: इस बेकाबू महंगाई के लिए आखिर कौन है जिम्मेदार?

मंगलवार को महंगाई का चौतरफा और भयानक वार: इस बेकाबू महंगाई के लिए आखिर कौन है जिम्मेदार?

भारतीय अर्थव्यवस्था और आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी पर इन दिनों महंगाई का ऐसा चक्रव्यूह कसा हुआ है कि हर गुजरते दिन के साथ जीना मुहाल होता जा रहा है। आम जनता पहले से ही पेट्रोल-डीजल, दालों, सब्जियों और जीवन की बुनियादी जरूरतों के आसमान छूते दामों की मार झेल रही थी, कि अब मंगलवार का दिन देश के नागरिकों के लिए एक और बड़ा आर्थिक झटका लेकर आया है। इस मंगलवार को महंगाई का एक ऐसा चौतरफा और जबरदस्त वार हुआ है, जिसने हर परिवार के बजट को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया है। रसोई घर की जान कहे जाने वाले एलपीजी (LPG) गैस सिलेंडर के दामों में इजाफा करने के साथ-साथ, वाहनों के लिए जरूरी सीएनजी (CNG), हर घर की जरूरत दूध और अब विमान ईंधन यानी एटीएफ (ATF - Aviation Turbine Fuel) के दामों में भी भारी बढ़ोतरी कर दी गई है। एक ही दिन में एक साथ इतने सारे आवश्यक उत्पादों और ईंधनों के दाम बढ़ने से पूरे देश में हाहाकार मच गया है। मिडिल क्लास और गरीब वर्ग के लोगों के सामने अब यह सवाल मुंह बाए खड़ा है कि आखिर वे इस बढ़ती हुई और बेकाबू महंगाई से कैसे पार पाएंगे और सरकार की नीतियों के बावजूद कीमतों पर लगाम क्यों नहीं लग पा रही है?

रसोई घर से लेकर सड़क तक फैली महंगाई की यह आग

मंगलवार को जैसे ही सरकारी तेल कंपनियों और संबंधित विभागों ने नए रेट कार्ड जारी किए, वैसे ही देश के करोड़ों परिवारों की नींद उड़ गई। रसोई गैस सिलेंडर के बढ़ते दामों ने उन महिलाओं के पसीने छुड़ा दिए जो पहले से ही महीने का बजट मैनेज करने में एड़ी-चोटी का जोर लगा रही थीं। इसके तुरंत बाद सीएनजी के दाम बढ़ने से ऑटो, टैक्सी और निजी वाहन चालकों की लागत में सीधा इजाफा हो गया है, जिसका असर आने वाले दिनों में रोजमर्रा के सामानों के किराए और ढुलाई पर पड़ना तय है। शहरों में रहने वाले आम आदमी के लिए सुबह की शुरुआत जिस दूध से होती है, उसके दाम भी बढ़ जाने से बच्चों की सेहत पर असर पड़ने लगा है। जब एक साथ रसोई, परिवहन और खान-पान की चीजें इतनी महंगी हो जाती हैं, तो आम आदमी की बचत का दायरा शून्य हो जाता है। इस चौतरफा वार ने यह साबित कर दिया है कि महंगाई अब केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं रह गई है, बल्कि यह हर भारतीय घर के चूल्हे और सुकून को सीधे तौर पर प्रभावित करने वाला एक बहुत बड़ा संकट बन चुकी है।

एटीएफ (ATF) के दाम बढ़ने से हवाई यात्राओं पर भी मंडराया संकट का साया

इस बार की इस महंगाई की मार में केवल जमीन पर चलने वाले वाहन और रसोईघर ही नहीं, बल्कि आसमान में उड़ने वाले विमान भी इसकी चपेट में आ चुके हैं। विमान ईंधन यानी एटीएफ (Aviation Turbine Fuel) के दामों में हुई भारी बढ़ोतरी ने एविएशन सेक्टर और एयरलाइंस कंपनियों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। जब एटीएफ महंगा होता है, तो एयरलाइन कंपनियां यात्रियों पर उसका सीधा बोझ डालती हैं और फ्लाइट के टिकटों के दाम बढ़ा देती हैं। इसका मतलब साफ है कि अब आम आदमी या नौकरीपेशा लोगों के लिए हवाई सफर करना भी और अधिक महंगा होने वाला है। त्योहारों और छुट्टियों के इस सीजन में जब लोग अपने परिवार से मिलने के लिए सफर करने की सोचते हैं, तो महंगे टिकटों के कारण उनकी जेब पर भारी डाका पड़ता है। ईंधन के अंतरराष्ट्रीय और घरेलू मूल्यों में होने वाले इस उतार-चढ़ाव का सीधा खामियाजा देश के उस आम नागरिक को भुगतना पड़ रहा है जो किसी तरह अपने सपनों को पूरा करने की कोशिश कर रहा है।

आखिर क्यों बार-बार बढ़ रहे हैं दाम और इसके पीछे के आर्थिक कारण क्या हैं?

आम जनता के मन में यह बहुत बड़ा और वाजिब सवाल है कि आखिर हर कुछ दिनों पर इस तरह से गैस, ईंधन और दूध के दाम क्यों बढ़ा दिए जाते हैं। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में उतार-चढ़ाव, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की कमजोरी और देश के भीतर बढ़ती मांग प्रमुख वजहें हैं। इसके अलावा, टैक्स और एक्साइज ड्यूटी का भारी-भरकम बोझ भी इन उत्पादों की खुदरा कीमतों को ऊपर धकेलने में अहम भूमिका निभाता है। सरकार और तेल कंपनियों की अपनी दलीलें होती हैं कि वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित होने के कारण उन्हें मजबूरन दामों में संशोधन करना पड़ता है, लेकिन आम आदमी इन तकनीकी और वैश्विक कारणों से ज्यादा अपने घर के खाली होते बजट को लेकर चिंतित रहता है। जब आमदनी उतनी ही रहती है और खर्च लगातार दो गुना या तीन गुना हो जाते हैं, तो जीवन पटरी से उतरने लगता है और यही मौजूदा समय की सबसे बड़ी सच्चाई है।

बढ़ती महंगाई के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है और क्या है इसका समाधान?

महंगाई के इस राक्षस के सामने आज पूरा देश खुद को असहाय महसूस कर रहा है, और यह बहस छिड़ गई है कि इस स्थिति के लिए असल में जिम्मेदार कौन है? क्या यह केवल वैश्विक परिस्थितियां हैं या देश की नीतियों में कोई ऐसी कमी है जिसे सुधारा जा सकता है? विपक्ष लगातार सरकार को घेरते हुए यह आरोप लगा रहा है कि महंगाई पर नियंत्रण पाने में प्रशासन पूरी तरह से विफल साबित हुआ है, जबकि दूसरी ओर सत्ता पक्ष का यह तर्क है कि वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के दौर में भारत ने फिर भी अन्य देशों के मुकाबले स्थिति को बेहतर तरीके से संभाला है। कारण चाहे जो भी हो, लेकिन धरातल पर सच यही है कि आम जनता पिस रही है। इस समस्या से निजात पाने के लिए सरकार को न केवल ईंधन पर लगने वाले करों (Taxes) में राहत देनी होगी, बल्कि खाद्य सुरक्षा और परिवहन लागत को नियंत्रित करने के लिए कुछ ठोस और दीर्घकालिक रणनीतियां बनानी होंगी। अगर समय रहते इस बढ़ती महंगाई की रफ्तार पर लगाम नहीं लगाई गई, तो यह देश की आर्थिक वृद्धि और सामाजिक ताने-बाने को अंदर से खोखला कर देगी, जिसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा।