वैश्विक निवेश के नक्शे पर भारत का दबदबा, ग्रीनफील्ड FDI में चीन को छोड़ा पीछे

वैश्विक निवेश के नक्शे पर भारत का दबदबा, ग्रीनफील्ड FDI में चीन को छोड़ा पीछे

आर्थिक और सामरिक मोर्चे पर दुनिया भर के देशों के बीच चल रही प्रतिस्पर्धा में भारत के पक्ष में एक बेहद शानदार और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (Foreign Direct Investment - FDI) के सबसे भरोसेमंद और महत्वपूर्ण पैमाने माने जाने वाले 'ग्रीनफील्ड एफडीआई' (Greenfield FDI) के आंकड़ों में भारत ने अपने पड़ोसी देश और सबसे बड़े आर्थिक प्रतिद्वंद्वी चीन को पछाड़ दिया है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और निवेश आंकड़ों के विश्लेषण से यह बात सामने आई है कि पिछले पांच वर्षों की अवधि में भारत ने कुल मिलाकर लगभग 351 बिलियन डॉलर (351 Billion USD) का भारी-भरकम ग्रीनफील्ड विदेशी निवेश आकर्षित किया है। यह उपलब्धि इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि वैश्विक कंपनियों और बहुराष्ट्रीय ब्रांडों (MNCs) के बीच भारत अब केवल एक कंज्यूमर मार्केट नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे पसंदीदा मैन्युफैक्चरिंग और इंडस्ट्रियल हब बनता जा रहा है।

आखिर क्यों चीन से किनारा कर रहे हैं ग्लोबल निवेशक, भारत क्यों बन रहा है पहली पसंद?

विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक सप्लाई चेन (Global Supply Chain) के समीकरणों में बहुत बड़ा बदलाव आया है। कोरोना महामारी के बाद से ही दुनिया भर की बड़ी कंपनियां 'चाइना प्लस वन' (China Plus One) की रणनीति पर काम कर रही हैं, जिसके तहत वे अपनी निर्भरता केवल चीन तक सीमित न रखकर दूसरे देशों में भी अपने कारखाने और उत्पादन इकाइयां स्थापित करना चाहती हैं। इसके साथ ही चीन के भीतर बढ़ती श्रम लागत, सख्त सरकारी नियम, कड़े लॉकडाउन और अमेरिका के साथ चल रहे लगातार व्यापारिक तनाव (Trade War) के कारण निवेशकों का भरोसा वहां से डिगने लगा है।

इसके विपरीत, भारत सरकार द्वारा पिछले कुछ वर्षों में शुरू की गई 'मेक इन इंडिया' (Make in India) पहल, प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI Schemes) योजनाएं, सिंगल विंडो क्लीयरेंस सिस्टम और देश के बुनियादी ढांचे (Infrastructure) में किए गए अभूतपूर्व सुधारों ने विदेशी निवेशकों को अपनी ओर आकर्षित करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है।

351 बिलियन डॉलर के इस निवेश का भारतीय अर्थव्यवस्था और रोजगार पर क्या होगा असर?

पिछले पांच वर्षों में आए 351 बिलियन डॉलर के इस रिकॉर्ड ग्रीनफील्ड एफडीआई का सबसे बड़ा फायदा देश के औद्योगिक क्षेत्रों और युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होने के रूप में मिल रहा है। ग्रीनफील्ड निवेश का मतलब होता है कि विदेशी कंपनियां भारत की जमीन पर नए सिरे से कारखाने, रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटर, सेमीकंडक्टर प्लांट, ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट्स और अत्याधुनिक तकनीक इकाइयां स्थापित कर रही हैं।

ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग, फार्मास्यूटिकल्स, डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग और रिन्यूएबल एनर्जी (सौर और पवन ऊर्जा) जैसे क्षेत्रों में विदेशी कंपनियों ने अरबों डॉलर का निवेश किया है। उत्तर प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्य इस निवेश के बड़े केंद्र बनकर उभरे हैं, जहां स्थानीय स्तर पर लाखों युवाओं को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिल रहा है। भारत के इस तेजी से बढ़ते औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र ने देश के निर्यात (Exports) को भी वैश्विक स्तर पर एक नई मजबूती प्रदान की है।

वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भारत की मजबूत होती स्थिति और भविष्य की राह

आज के दौर में जब दुनिया के कई विकसित देश मंदी, उच्च मुद्रास्फीति और भू-राजनीतिक संघर्षों (जैसे रूस-यूक्रेन और मध्य पूर्व के तनाव) से जूझ रहे हैं, तब भारतीय अर्थव्यवस्था की यह रफ्तार दुनिया के लिए एक बड़ी उम्मीद की किरण बन गई है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं ने भी बार-बार इस बात को दोहराया है कि वैश्विक मंदी के माहौल में भी भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है।

ग्रीनफील्ड एफडीआई के मामले में चीन को पछाड़ने की यह उपलब्धि केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि भारत वैश्विक मंच पर अपनी आर्थिक संप्रभुता और तकनीकी क्षमता का लोहा मनवा रहा है। आने वाले वर्षों में जैसे-जैसे देश में सेमीकंडक्टर निर्माण, हरित हाइड्रोजन और उन्नत तकनीक से जुड़े प्रोजेक्ट्स पूरी तरह जमीन पर उतरेंगे, भारत दुनिया के सबसे बड़े औद्योगिक महाशक्तियों की कतार में सबसे आगे खड़ा नजर आएगा।