देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट घराने टाटा ग्रुप में अंदरूनी खींचतान

देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट घराने टाटा ग्रुप में अंदरूनी खींचतान

भारत के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित व्यावसायिक साम्राज्य टाटा ग्रुप (Tata Group) के नियंत्रण और प्रशासन को लेकर शुरू हुआ अंदरूनी घमासान अब कानूनी और नियामक चौखट तक पहुंच गया है। महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर (Maharashtra Charity Commissioner) ने सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (Sir Dorabji Tata Trust - SDTT) के चेयरमैन नोएल टाटा और ट्रस्ट प्रशासन को दो बागी ट्रस्टियों द्वारा दर्ज कराई गई गंभीर शिकायतों का जवाब देने के लिए 19 अक्टूबर तक की मोहलत दी है।

शुरुआत में जवाब दाखिल करने के लिए 12 अक्टूबर की समय सीमा तय की गई थी, लेकिन ट्रस्ट की ओर से अतिरिक्त समय मांगे जाने के बाद नियामक ने एक हफ्ते की मोहलत बढ़ाते हुए 19 अक्टूबर तक की नई समय सीमा तय कर दी है। टाटा संस में 50 प्रतिशत से ज्यादा की नियंत्रक हिस्सेदारी रखने वाले इस मुख्य चैरिटेबल ट्रस्ट के भीतर उभरे मतभेदों ने पूरे देश के कॉर्पोरेट जगत और शेयर बाजार को हैरान कर दिया है।

वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह के तीखे सवाल, ट्रस्ट के शासन और व्यावसायिक दखल पर उठाए सवाल

इस पूरे विवाद की मुख्य वजह एसडीटीटी (SDTT) के वाइस-चेयरमैन वेणु श्रीनिवासन (टीवीएस ग्रुप के दिग्गज) और पूर्व वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी विजय सिंह द्वारा दर्ज कराई गई औपचारिक शिकायतें हैं। इन दोनों वरिष्ठ ट्रस्टियों ने आरोप लगाया है कि टाटा ट्रस्ट्स का प्रबंधन अब अपनी मूल परोपकारी और चैरिटेबल सीमाओं से बाहर निकलकर टाटा संस (Tata Sons) के व्यापारिक और रणनीतिक निर्णयों में सीधा हस्तक्षेप कर रहा है।

शिकायत में कहा गया है कि चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा कॉर्पोरेट पुनर्गठन, शापूरजी पलोनजी (SP Group) की हिस्सेदारी और टाटा संस की प्रस्तावित लिस्टिंग जैसे वाणिज्यिक फैसलों में सीधा दखल देने से ट्रस्ट का टैक्स-फ्री चैरिटेबल दर्जा (Tax-exempt Status) खतरे में पड़ सकता है। इसके साथ ही, नोएल टाटा के 'लाइफटाइम ट्रस्टी' (Perpetual Trustee) बनने के अधिकार, उनके बेटे नेविल टाटा की नियुक्ति और अहम बैठकों में बाकी ट्रस्टियों को अलग-थलग रखे जाने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए गए हैं।

बिना सलाह लिए गए फैसलों से उपजा असंतोष, 7 अन्य टाटा ट्रस्टों ने दाखिल किए 84 कैविएट

ट्रस्टियों के बीच का यह असंतोष उस वक्त और बढ़ गया जब 28 सितंबर को एसडीटीटी और सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT) की ओर से टाटा संस के बोर्ड को एक पत्र भेजकर कुछ समूह कंपनियों के विलय का प्रस्ताव दिया गया। श्रीनिवासन और विजय सिंह ने इस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए लिखा कि इतना बड़ा प्रस्ताव बिना किसी ट्रस्टी बोर्ड बैठक या आपसी चर्चा के आगे बढ़ा दिया गया।

विवाद की गंभीरता को देखते हुए कानूनी मोर्चेबंदी भी तेज हो गई है। एसडीटीटी को छोड़कर टाटा ग्रुप से जुड़े सात अन्य सहयोगी ट्रस्टों (जैसे जेआरडी टाटा ट्रस्ट, आरडी टाटा ट्रस्ट आदि) ने महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के समक्ष 84 कैविएट (Caveats) दाखिल किए हैं। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि चैरिटी कमिश्नर इस मामले में कोई भी एकतरफा आदेश पारित करने से पहले इन सभी ट्रस्टों और नोएल टाटा का पक्ष अनिवार्य रूप से सुने।

19 अक्टूबर की तारीख क्यों है बेहद महत्वपूर्ण, जानिए भारतीय उद्योग जगत पर इसका प्रभाव

टाटा संस की करीब 66 प्रतिशत मालिकाना हिस्सेदारी टाटा ट्रस्ट्स के पास है, जिसमें केवल एसडीटीटी और एसआरटीटी मिलकर 51.54 प्रतिशत की बहुलांश हिस्सेदारी रखते हैं। ऐसे में चैरिटेबल ट्रस्ट्स के भीतर प्रशासनिक नियंत्रण और निर्णयों की पारदर्शिता को लेकर उठी यह आवाज देश के सबसे बड़े औद्योगिक समूह के भविष्य के दृष्टिकोण से बेहद संवेदनशील मानी जा रही है।

19 अक्टूबर को चैरिटी कमिश्नर के समक्ष नोएल टाटा और एसडीटीटी की ओर से पेश किए जाने वाले जवाब से यह तय होगा कि यह मामला आपसी बातचीत से सुलझता है या फिर यह भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी कॉर्पोरेट और कानूनी लड़ाइयों में से एक का रूप लेता है। पूरे देश की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि टाटा ट्रस्ट्स अपने गवर्नेंस ढांचे को कैसे पारदर्शी बनाता है।