शेयर बाजार में लगातार 8 हफ्ते की भारी गिरावट से निवेशकों में हड़कंप

शेयर बाजार में लगातार 8 हफ्ते की भारी गिरावट से निवेशकों में हड़कंप

भारतीय शेयर बाजार (Indian Stock Market) के इतिहास में पिछले कुछ हफ्तों के दौरान एक ऐसा हैरान करने वाला और चिंताजनक दौर देखने को मिला है जिसने देश भर के निवेशकों, ट्रेडर्स और वित्तीय विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी है। शेयर बाजार के पिछले 25 सालों के इतिहास में यह एक दुर्लभ और अभूतपूर्व घटना है जब मुख्य सूचकांक लगातार आठ हफ्तों तक बिना किसी बड़े ठहराव या राहत के गिरावट के काले साए में डूबे रहे हैं। बाजार में मची इस जबर्दस्त उथल-पुथल और बिकवाली के दौर ने सेंसेक्स (Sensex) और निफ्टी (Nifty) के निवेशकों की गाढ़ी कमाई को पानी की तरह बहा दिया है, जिससे हर तरफ दहशत का माहौल बना हुआ है। कभी रॉकेट की रफ्तार से नए रिकॉर्ड बनाने वाला भारतीय शेयर बाजार अचानक से ऐसी मंदी की गिरफ्त में कैसे आ गया, और क्या यह सिलसिला अभी और लंबा चलने वाला है, इसको लेकर बाजार गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हैं। आज के इस विस्तृत आलेख में हम आपको शेयर बाजार में आई इस ऐतिहासिक आठ हफ्ते की मंदी के पीछे की असल वजहों, विदेशी निवेशकों की निकासी और आने वाले दिनों में बाजार की संभावित चाल व रणनीतियों के बारे में पूरी जानकारी देने जा रहे हैं, ताकि आप अपनी निवेश योजनाओं को सुरक्षित रख सकें।

शेयर बाजार के 25 साल के इतिहास में क्यों दर्ज हुआ यह डरावना रिकॉर्ड?

भारतीय शेयर बाजार की चाल का अध्ययन करने वाले पुराने वित्तीय विश्लेषकों का भी यह मानना है कि पिछले ढाई दशकों के दौरान बाजार ने कई बड़े संकटों, वैश्विक मंदी, कोरोना महामारी और राजनीतिक उथल-पुथल का सामना किया है, लेकिन इस तरह का ट्रेंड कभी देखने को नहीं मिला था। बाजार के आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले आठ सप्ताह से लगातार हर हफ्ते लाल निशान पर बंद होने का यह सिलसिला निवेशकों के लिए एक बहुत बड़ा झटका साबित हुआ है। इस लगातार गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) द्वारा लगातार की जा रही भारी बिकवाली और भारतीय बाजारों से पैसे निकालकर अन्य सुरक्षित बाजारों में निवेश करना रहा है। इसके अलावा, कंपनियों के तिमाही वित्तीय नतीजे उम्मीद के मुताबिक न रहना, वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उठापटक ने घरेलू बाजार के सेंटमेंट को पूरी तरह से तोड़कर रख दिया है। जब बाजार में लगातार बिकवाली का दबाव बढ़ता है, तो निवेशकों का कॉन्फिडेंस हिल जाता है, और यही वजह है कि छोटे से लेकर बड़े निवेशकों तक हर कोई इस वक्त भारी नुकसान का सामना कर रहा है।

बाजार में लगातार गिरावट के पीछे कौन से मुख्य घरेलू और वैश्विक कारण जिम्मेदार हैं?

किसी भी शेयर बाजार में मंदी का आना अचानक नहीं होता, बल्कि इसके पीछे कई आर्थिक और भू-राजनीतिक कारक मिलकर काम करते हैं। वर्तमान परिस्थिति की बात करें तो अमेरिका और अन्य विकसित देशों में महंगाई के आंकड़े और वहां के केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों को लेकर अपनाए गए सख्त रुख ने वैश्विक तरलता (Global Liquidity) को प्रभावित किया है, जिसका सीधा असर भारत जैसे उभरते बाजारों पर पड़ा है। इसके साथ ही, घरेलू मोर्चे पर कंपनियों के शेयरों के ऊंचे मूल्यांकन (High Valuations) को लेकर भी लंबे समय से चिंता जताई जा रही थी, और जानकारों का यह कहना था कि बाजार बहुत ज्यादा महंगे हो चुके हैं, जिससे करेक्शन आना लाजिमी था। खुदरा महंगाई दर में उतार-चढ़ाव और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा ब्याज दरों में कटौती को लेकर धीमी प्रतिक्रिया ने भी बाजार की रफ्तार पर ब्रेक लगाने का काम किया है। इन सभी वजहों के एक साथ मिलने से बिकवाली का ऐसा चक्र चला कि बाजार लगातार आठ हफ्तों तक संभलने में नाकामयाब रहा और हर हफ्ते निवेशकों की संपत्ति में भारी सेंध लगती चली गई।

अब आगे कैसी रहेगी शेयर बाजार की चाल और निवेशकों को क्या सावधानी बरतनी चाहिए?

लगातार आठ हफ्तों की इस ऐतिहासिक गिरावट के बाद अब हर निवेशक के मन में बस यही एक सवाल है कि क्या बाजार में और भी बड़ी गिरावट देखने को मिलेगी या फिर यहां से कोई रिकवरी की उम्मीद की जा सकती है। बाजार विशेषज्ञों का यह मानना है कि हालांकि यह मंदी काफी लंबी और गहरी खींच चुकी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के बुनियादी फंडामेंटल्स कमजोर हो गए हैं। भारत की घरेलू खपत, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और दीर्घकालिक विकास की कहानी अभी भी बेहद मजबूत बनी हुई है। विशेषज्ञों की सलाह है कि इस तरह के घबराहट भरे माहौल में निवेशकों को पैनिक बिकवाली (Panic Selling) करने से बचना चाहिए, क्योंकि अक्सर ऐसे मौकों पर ही मजबूत शेयरों में निवेश के सुनहरे अवसर मिलते हैं। लॉन्ग-टर्म निवेशकों के लिए यह समय अपने पोर्टफोलियो की समीक्षा करने और अच्छी क्वालिटी वाले फंडामेंटली स्ट्रॉन्ग शेयरों को एसआईपी (SIP) के जरिए धीरे-धीरे जोड़ने का है। आने वाले दिनों में कंपनियों के नए वित्तीय परिणाम, बजट की घोषणाएं और वैश्विक बाजार के संकेत यह तय करेंगे कि बाजार किस दिशा में करवट लेगा, इसलिए सतर्कता और धैर्य ही इस समय सबसे बड़ा हथियार है।