पैकेट पर छपे वजन से काफी कम निकला चिप्स, अब PepsiCo कंपनी भरेगी पूरे ₹8000 का हर्जाना

पैकेट पर छपे वजन से काफी कम निकला चिप्स, अब PepsiCo कंपनी भरेगी पूरे ₹8000 का हर्जाना

खाद्य पदार्थों और स्नैक्स के पैकेट्स में हवा ज्यादा और सामान कम होने की शिकायत अक्सर लोग सोशल मीडिया या दोस्तों के बीच चर्चा में करते हैं, लेकिन जब कोई सजग नागरिक इसे कानूनी चुनौती देता है तो बड़ी से बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भी झुकना पड़ता है। कुछ ऐसा ही मामला सामने आया है जहां मशहूर स्नैक निर्माता कंपनी पेप्सिको इंडिया (PepsiCo India) को चिप्स के पैकेट पर दर्ज वजन से कम सामग्री बेचने के आरोप में उपभोक्ता फोरम ने दोषी ठहराया है। अदालत ने कंपनी को न केवल उपभोक्ता के नुकसान की भरपाई करने का आदेश दिया है, बल्कि मानसिक प्रताड़ना और अदालती खर्च के एवज में ₹8000 का हर्जाना भरने का भी कड़ा फरमान सुनाया है। यह फैसला उन तमाम उपभोक्ताओं के लिए एक नजीर बन गया है जो अक्सर बाजार में ऐसी धोखाधड़ी का शिकार होकर भी चुप्पी साध लेते हैं।

एक पैकेट चिप्स और वजन का बड़ा खेल

पूरा मामला तब शुरू हुआ जब एक ग्राहक ने बाजार से पेप्सिको कंपनी का एक चिप्स का पैकेट खरीदा। पैकेट के बाहरी हिस्से पर स्पष्ट रूप से शुद्ध वजन अंकित था, लेकिन जब ग्राहक को पैकेट हाथ में लेने पर उसकी मात्रा पर संदेह हुआ तो उसने घर लाकर डिजिटल वजन मशीन पर उसकी जांच की। नतीजा चौंकाने वाला निकला, क्योंकि पैकेट के भीतर चिप्स का असल वजन उस पर लिखे गए दावे से काफी कम पाया गया। पैकेज्ड कमोडिटीज रूल्स और कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट के तहत यह स्पष्ट रूप से एक अनुचित व्यापारिक व्यवहार (Unfair Trade Practice) और भ्रामक पैकेजिंग का मामला बनता था। शिकायतकर्ता ने सबसे पहले कंपनी के कस्टमर केयर से संपर्क कर इस बात की शिकायत दर्ज कराई, लेकिन जब वहां से कोई संतोषजनक प्रतिक्रिया या समाधान नहीं मिला, तो उन्होंने उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा के लिए सीधे जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का दरवाजा खटखटाया।

उपभोक्ता अदालत में कंपनी की दलीलें हुईं खारिज

उपभोक्ता आयोग के समक्ष जब सुनवाई शुरू हुई, तो पेप्सिको के प्रतिनिधियों और वकीलों ने पैकेजिंग प्रक्रिया, ऑटोमेटेड मशीनों की तकनीक और उत्पादन के दौरान होने वाले सामान्य अंतर (tolerance limits) का हवाला देकर अपना बचाव करने की पूरी कोशिश की। हालांकि, शिकायतकर्ता ने अदालत के सामने पुख्ता साक्ष्य पेश किए, जिसमें वजन मापने का वीडियो, पैकेट की रसीद और वजन मशीन की सटीक माप शामिल थी। उपभोक्ता अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों और सबूतों का बारीक अवलोकन करने के बाद माना कि ब्रांड चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, वह पैकेट पर गलत जानकारी दर्ज करके उपभोक्ताओं को गुमराह नहीं कर सकता। अदालत ने माना कि उत्पाद में दर्ज मात्रा से कम वजन देना उपभोक्ता के भरोसे के साथ खिलवाड़ है और यह सीधे तौर पर अधिकारों का हनन है।

हर्जाना और उपभोक्ता अधिकारों की जीत

सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद उपभोक्ता मंच ने पेप्सिको इंडिया को आदेश दिया कि वह पीड़ित ग्राहक को मानसिक क्षतिपूर्ति और कानूनी कार्यवाही में हुए खर्च के रूप में ₹8000 का भुगतान करे। इसके साथ ही पैकेट की असल कीमत भी वापस करने का निर्देश दिया गया। हालांकि वित्तीय दृष्टिकोण से ₹8000 की राशि किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के लिए बहुत बड़ी नहीं लगती, लेकिन कानूनी और नैतिक दृष्टिकोण से यह फैसला एक बड़ा संदेश देता है। यह निर्णय साबित करता है कि उपभोक्ता संरक्षण कानून आम नागरिकों को सशक्त बनाता है और यदि कोई भी ब्रांड उत्पाद की गुणवत्ता या मात्रा में लापरवाही बरतता है, तो उसे जवाबदेह ठहराया जा सकता है।

भ्रामक पैकेजिंग और घटतौली पर कानूनी नियम

भारत में पैकेज्ड कमोडिटी रूल्स 2011 के तहत किसी भी बंद पैकेट पर वजन, निर्माण तिथि, एक्सपायरी डेट, एमआरपी और कस्टमर केयर विवरण का सही-सही उल्लेख करना अनिवार्य है। कानूनी तौर पर कंपनियों को एक बहुत ही सूक्ष्म सीमा तक वजन में अंतर की अनुमति होती है, लेकिन अगर यह अंतर तय मानकों से अधिक पाया जाता है तो इसे कानूनी अपराध माना जाता है। खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग तथा लीगल मेट्रोलॉजी विभाग समय-समय पर ऐसे मामलों में छापेमारी और जांच करते हैं। उपभोक्ता मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि पैकेजिंग के दौरान होने वाली ऐसी लापरवाही से कंपनियां अनजाने में या जानबूझकर करोड़ों रुपए का मुनाफा कमा लेती हैं, क्योंकि अधिकांश ग्राहक कुछ ग्राम के अंतर को नजरअंदाज कर देते हैं।

ग्राहक ध्यान रखें ये जरूरी बातें

इस फैसले के बाद आम उपभोक्ताओं के लिए यह समझना बेहद जरूरी हो गया है कि बाजार से कोई भी डिब्बाबंद सामान खरीदते समय वे पूरी तरह सतर्क रहें। यदि आपको कभी भी किसी पैकेज्ड फूड, ग्रॉसरी या अन्य सामान के वजन, गुणवत्ता या कीमत में कोई गड़बड़ी नजर आती है तो सबसे पहले उसका बिल और पैकेट सुरक्षित रखें। आप राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन (NCH) के टोल-फ्री नंबर 1915 पर अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं या 'उपभोक्ता ऐप' के माध्यम से ऑनलाइन रिपोर्ट कर सकते हैं। इसके अलावा आप अपने क्षेत्र के जिला उपभोक्ता फोरम में बहुत ही मामूली शुल्क के साथ बिना किसी वकील के भी स्वयं याचिका दाखिल कर सकते हैं। यह मामला हमें सिखाता है कि अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता ही बाजार में होने वाली हर तरह की धोखाधड़ी से बचाव का सबसे असरदार हथियार है।