थिएटर्स में रिलीज हुई अनन्या पांडे और लक्ष्य की 'चांद मेरा दिल', जानें टिकट बुक करने से पहले आपका मूड फ्रेश होगा या खराब
करण जौहर के धर्मा प्रोडक्शंस के बैनर तले बनी और विवेक सोनी के निर्देशन में निर्देशित फिल्म 'चांद मेरा दिल' आखिरकार 22 मई 2026 को सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी है। फिल्म 'किल' में अपनी दमदार एक्टिंग से तहलका मचाने वाले लक्ष्य और बॉलीवुड की ग्लैमरस एक्ट्रेस अनन्या पांडे इस बार एक रोमांटिक ड्रामा के साथ बड़े पर्दे पर आए हैं। शादी, करियर, बच्चे और जिम्मेदारियों के बीच उलझती इस प्रेम कहानी को लेकर दर्शकों में काफी बज था। अगर आप भी इस वीकेंड सिनेमाघरों का रुख करने की सोच रहे हैं, तो थिएटर जाने से पहले यह पूरा रिव्यू जरूर पढ़ लीजिए, ताकि आपको पता चल सके कि यह फिल्म मनोरंजन की कसौटी पर कितनी खरी उतरती है।
क्या है 'चांद मेरा दिल' की असली कहानी?
फिल्म की कहानी चांदनी (अनन्या पांडे) और आरव (लक्ष्य) के इर्द-गिर्द घूमती है। दोनों की मुलाकात हैदराबाद के एक कॉलेज में होती है, जहां दोनों को एक-दूसरे से प्यार हो जाता है। कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब चांदनी शादी से पहले प्रेग्नेंट हो जाती है। वह इस बच्चे को जन्म देने का फैसला करती है और दोनों शादी के बंधन में बंध जाते हैं। शुरुआत में सब कुछ किसी सपने जैसा खूबसूरत लगता है, लेकिन जैसे ही असल जिंदगी की जिम्मेदारियां, बच्चे की परवरिश और करियर का दबाव सामने आता है, वैसे ही उनकी खुशहाल जिंदगी बिखरने लगती है। डायरेक्टर ने आधुनिक रिश्तों की इस उलझन को पर्दे पर उतारने की कोशिश की है।
फिल्म की वे कमियां जो दर्शकों को करती हैं निराश
'चांद मेरा दिल' का सबसे कमजोर पहलू इसकी शुरुआत है। फिल्म के पहले 30 मिनट इतने खींचे हुए और अजीब लगते हैं कि दर्शक खुद से पूछने पर मजबूर हो जाते हैं कि आज के दौर में ऐसा कौन करता है। कई सीन्स बिना सिर-पैर के लगते हैं जो कहानी के फ्लो को बिगाड़ते हैं।
इसके अलावा, एक रोमांटिक फिल्म की सबसे बड़ी जान उसकी लीड पेयर की केमिस्ट्री होती है, लेकिन यहाँ अनन्या पांडे और लक्ष्य के बीच वह जादुई कनेक्शन पूरी तरह गायब नजर आता है। कैमरा मूवमेंट और कमजोर स्क्रीनप्ले दर्शकों को फिल्म से जोड़े रखने में नाकाम रहते हैं। जब शुरुआत में प्यार की गहराई महसूस नहीं होती, तो क्लाइमेक्स में दोनों का दर्द और बिखराव भी दर्शकों के दिल को नहीं छू पाता। फिल्म का अंत इतना प्रेडिक्टेबल (पूर्वानुमानित) है कि आखिरी तक आते-आते बोरियत हावी होने लगती है। विषय अच्छा होने के बावजूद कहानी में असलियत का पुट बेहद कम महसूस होता है।
म्यूजिक और लक्ष्य की एक्टिंग ने संभाली लाज
इस डूबती नैया को पार लगाने में फिल्म के संगीत और लक्ष्य की अदाकारी ने अहम भूमिका निभाई है। सचिन-जिगर का कंपोज किया हुआ म्यूजिक काफी शानदार है। फिल्म का टाइटल ट्रैक और 'इश्क निभावन' गाना कानों को सुकून देता है और थकाऊ स्क्रीनप्ले के बीच दर्शकों का मूड थोड़ा फ्रेश करने का काम करता है।
एक्टिंग की बात करें तो लक्ष्य ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे लंबी रेस के घोड़े हैं। 'किल' के बाद इस रोमांटिक-इमोशनल रोल में भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी है। खासकर भावुक कर देने वाले सीन्स में जब वे स्क्रीन पर टूटते हैं, तो उनका दर्द बिल्कुल वास्तविक और गहरा लगता है।
अनन्या पांडे की परफॉर्मेंस और फाइनल वर्डिक्ट
वहीं दूसरी ओर, अनन्या पांडे स्क्रीन पर बेहद खूबसूरत और ग्लैमरस तो दिखी हैं, लेकिन जब बात संजीदा एक्टिंग की आती है, तो वे अपने किरदार के साथ न्याय नहीं कर पातीं। उन्हें अपनी एक्टिंग स्किल्स और इमोशनल सीन्स की डिलीवरी पर अभी काफी काम करने की जरूरत है। वे चांदनी के दर्द को दर्शकों तक पहुंचाने में असफल रहीं।
फाइनल वर्डिक्ट: 'चांद मेरा दिल' का मुख्य विषय और कॉन्सेप्ट अच्छा था, लेकिन कमजोर निर्देशन और लचर स्क्रीनप्ले ने इसका कबाड़ा कर दिया। फिल्म को 2/5 रेटिंग दी जा सकती है। अगर अनन्या पांडे की जगह किसी अधिक परिपक्व या नॉन-पॉपुलर एक्ट्रेस को लिया जाता, तो शायद यह फिल्म थिएटर्स में देखने लायक बनती। हमारी सलाह यही है कि सिनेमाघरों में पैसे खर्च करने के बजाय, आप इस फिल्म के ओटीटी (OTT) पर रिलीज होने का इंतजार कर सकते हैं।