बॉलीवुड का वो इकलौता गाना जिसे माना गया 'हिंदी सिनेमा का अभिशाप', मोहम्मद रफी की आवाज में टूटे दिल की ऐसी बद्दुआ कभी नहीं सुनी होगी आपने
भारतीय सिनेमा के इतिहास में प्यार, वफा, इश्क और जुदाई पर हजारों खूबसूरत नगमे लिखे गए हैं। जब भी किसी का दिल टूटता है, तो बॉलीवुड के सैड सॉन्ग्स मरहम का काम करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी किसी ऐसे गाने के बारे में सुना है जिसे 'अभिशाप गीत' या 'बद्दुआ का गीत' कहा जाता हो? जी हां, हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर में एक ऐसा गाना भी रिकॉर्ड किया गया था, जिसमें प्यार या दर्द नहीं, बल्कि एक टूटे हुए प्रेमी के दिल से निकली बेहद खौफनाक बद्दुआएं और नफरत भरी है। इस गाने के बोल इतने तीखे हैं कि इन्हें सुनकर आज भी लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
जब महबूब के लिए प्रेमी के दिल से निकली खौफनाक बद्दुआ
हम बात कर रहे हैं साल 1966 में आई सुपरहिट फिल्म 'आये दिन बहार के' के उस आइकॉनिक गाने की, जिसके बोल हैं— "मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे"। इस गाने को मशहूर गीतकार आनंद बक्शी ने कलमबद्ध किया था। आमतौर पर जुदाई के गानों में प्रेमी अपनी किस्मत को कोसता है या महबूब की खुशी की दुआ करता है, लेकिन इस गाने की एक-एक लाइन में प्रतिशोध और तड़प साफ झलकती है। गाने के बोल कुछ ऐसे हैं जो सीधे रूह को कंपा देते हैं, जैसे: "तू फूल बने पतझड़ का, तुझपे बहार ना आए कभी... मेरी ही तरह तू तड़पे तुझको करार न आए कभी।"
धर्मेंद्र और आशा पारेख पर फिल्माया गया था यह अभिशाप गीत
यह सदाबहार और कड़वा गीत बॉलीवुड के ही-मैन धर्मेंद्र और दिग्गज अभिनेत्री आशा पारेख पर फिल्माया गया था। रघुनाथ झलानी के निर्देशन में बनी इस फिल्म में धर्मेंद्र (रवि) और आशा पारेख (कंचन) मुख्य भूमिकाओं में थे, जबकि बलराज साहनी ने भी इसमें अहम किरदार निभाया था। फिल्म में दोनों किरदारों के बीच प्यार और फिर सगाई होती है, लेकिन रवि के अतीत और एक बड़ी गलतफहमी की वजह से दोनों के रास्ते हमेशा के लिए अलग हो जाते हैं।
मोहम्मद रफी की जादुई आवाज ने फूंक दी थी जान
इस अभिशाप गीत को अमर बनाने का सबसे बड़ा श्रेय जाता है शहंशाह-ए-तरन्नुम मोहम्मद रफी साहब को। रफी साहब ने अपनी मखमली और दर्दभरी आवाज से इस गाने को इस तरह गाया कि सुनने वाले को रवि का गुस्सा और उसकी नफरत खुद के भीतर महसूस होने लगती है। फिल्म की कहानी के अनुसार, जब कंचन एक पार्टी में रवि को नीचा दिखाने के लिए गोद में बच्चा लेकर नाटक करती है, तब रवि का दिल पूरी तरह टूट जाता है। वह कंचन को एक धोखेबाज और सितमगर समझ बैठता है, और फिर महफिल में गाता है नफरत से भरा यह बद्दुआ गीत।
'जिंदगी और खुशी को तरसे' - रूह कंपा देने वाले बोल
मोहम्मद रफी की आवाज में यह गाना जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, बद्दुआएं और ज्यादा गहरी होती चली जाती हैं। प्रेमी अपने महबूब से कहता है कि तूने दोस्त बनकर दुश्मनी की है, इसलिए अब तू पूरी जिंदगी सिर्फ खुशियों के लिए तरसेगा। गाने के अंत में दी गई बद्दुआ तो और भी खौफनाक है: "तेरे गुलशन से ज्यादा वीरान कोई विराना न हो, इस दुनिया में कोई तेरा अपना तो क्या बेगाना न हो।" यही वजह है कि आज छह दशक बीत जाने के बाद भी इस गाने को हिंदी सिनेमा का सबसे तीखा और दिल दुखाने वाला 'बद्दुआ गीत' माना जाता है।