1 मंच पर आए 21 देश: BRICS के 5 बड़े फैसले, जानिए दिल्ली सम्मेलन से भारत को क्या मिला?

1 मंच पर आए 21 देश: BRICS के 5 बड़े फैसले, जानिए दिल्ली सम्मेलन से भारत को क्या मिला?

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था के मंच पर इस वक्त भारत की साख और कूटनीतिक दबदबा एक नए शिखर पर पहुंच गया है। हाल ही में नई दिल्ली में संपन्न हुए ऐतिहासिक ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में दुनिया भर के 21 से अधिक देशों के राष्ट्राध्यक्षों और प्रतिनिधियों ने एक ही मंच पर जुटकर भविष्य के ग्लोबल ऑर्डर की रूपरेखा तैयार की है। इस महासम्मेलन में लिए गए पांच सबसे बड़े और क्रांतिकारी फैसलों ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। एक तरफ जहां पश्चिमी देशों के वर्चस्व वाले वित्तीय संस्थानों को एक मजबूत विकल्प मिलने की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी तरफ भारत के दृष्टिकोण से यह सम्मेलन देश की रणनीतिक और आर्थिक विजय का बड़ा प्रतीक बनकर उभरा है। आइए विस्तार से जानते हैं कि इस बहुचर्चित दिल्ली सम्मेलन से भारत के हाथ क्या-क्या खास लगा है और ब्रिक्स के इन 5 बड़े फैसलों के वैश्विक राजनीति पर क्या गहरे और दूरगामी प्रभाव पड़ने वाले हैं।

एक मंच पर 21 देशों का जुटना: वैश्विक दक्षिण की बुलंद आवाज बना ब्रिक्स

नई दिल्ली की धरती पर आयोजित इस भव्य ब्रिक्स सम्मेलन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसमें केवल पारंपरिक ब्रिक्स सदस्य देश ही नहीं, बल्कि ग्लोबल साउथ (Global South) यानी विकासशील और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं वाले 21 से अधिक देशों ने पूरी एकजुटता के साथ हिस्सा लिया। भू-राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आज के दौर में जब दुनिया तमाम तरह के युद्धों, आर्थिक मंदी, सप्लाई चेन संकट और ध्रुवीकरण से जूझ रही है, तब इतनी बड़ी संख्या में देशों का एक मंच पर आना यह साबित करता है कि अब वैश्विक फैसले किसी एक या दो महाशक्तियों के हाथ में सीमित नहीं रहेंगे। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विकासशील देशों की इन आवाजों को एक मजबूत मंच मिला है, जो अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं जैसे संयुक्त राष्ट्र और विश्व बैंक में सुधार के लिए लंबे समय से अपनी बात पुरजोर तरीके से रख रहे थे।

ब्रिक्स के 5 बड़े फैसले: जो बदल देंगे दुनिया की आर्थिक और रणनीतिक चाल

दिल्ली सम्मेलन के दौरान ब्रिक्स देशों के बीच सर्वसम्मति से पांच ऐसे ऐतिहासिक और क्रांतिकारी निर्णय लिए गए, जो आने वाले दशकों में वैश्विक अर्थव्यवस्था का नक्शा बदल सकते हैं:

  • स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा (Local Currency Settlement): डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए आपसी व्यापार को डॉलर के बजाय स्थानीय मुद्राओं (रुपया, युआन, रूबल आदि) में करने की दिशा में ठोस रूपरेखा तैयार की गई है।

  • वैकल्पिक भुगतान प्रणाली और फाइनेंशियल आर्किटेक्चर: पश्चिमी देशों के स्विफ्ट (SWIFT) सिस्टम के विकल्प के रूप में एक स्वतंत्र और सुरक्षित ब्रिक्स क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट मेकैनिज्म विकसित करने पर मुहर लगी है।

  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और तकनीक का साझा इस्तेमाल: डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (DPI) और एआई तकनीक को सदस्य देशों के बीच साझा करने के लिए एक नए तकनीकी फ्रेमवर्क का गठन किया गया है।

  • खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा गठबंधन: ग्लोबल सप्लाई चेन को सुरक्षित रखने और कच्चे तेल व खाद्यान्न की सुचारू आपूर्ति के लिए एक विशेष ऊर्जा गलियारे की स्थापना पर सहमति बनी है।

  • जलवायु परिवर्तन और सस्टेनेबल डेवलपमेंट फंड: पर्यावरण संरक्षण और रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स के लिए विकासशील देशों को आसान शर्तों पर वित्तीय मदद देने हेतु संयुक्त कोष के गठन का प्रस्ताव पास हुआ है।

दिल्ली सम्मेलन से भारत को क्या मिला? रणनीतिक और आर्थिक लाभों का विश्लेषण

भारत के कूटनीतिक इतिहास में नई दिल्ली में हुआ यह ब्रिक्स सम्मेलन कई मायनों में मील का पत्थर साबित हुआ है। सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि भारत ने वैश्विक मंच पर अपनी 'विश्व मित्र' की छवि को और अधिक मजबूत किया है, जहां वह पश्चिमी देशों और ग्लोबल साउथ के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु की भूमिका निभा रहा है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार समझौते को बढ़ावा मिलने से भारतीय रुपये (INR) को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के प्रधानमंत्री मोदी के प्रयासों को जबरदस्त बल मिला है, जिससे भविष्य में भारत के आयात-निर्यात में मुद्रा रूपांतरण की लागत में भारी कमी आएगी। इसके अलावा, आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति और सीमा पार आतंकवाद के मुद्दों को ब्रिक्स के घोषणापत्र में प्रमुखता से शामिल कराना भारत की एक बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा रही है।

भविष्य की ग्लोबल इकॉनमी पर क्या पड़ेगा ब्रिक्स के इन फैसलों का असर?

ब्रिक्स के इन तमाम बड़े फैसलों और विकासशील देशों की इस बढ़ती एकजुटता से आने वाले समय में वैश्विक महाशक्तियों के समीकरणों में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। जिस प्रकार से दुनिया के एक बड़े भूभाग और विशाल बाजार वाले देश आपसी सहयोग को मजबूत कर रहे हैं, उससे एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था का दौर अब बहुध्रुवीय (Multipolar World) व्यवस्था में तब्दील हो रहा है। भारत के लिए यह अवसर अपनी अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन डॉलर और उससे आगे ले जाने के साथ-साथ तकनीकी और रणनीतिक आत्मनिर्भरता हासिल करने का एक स्वर्णिम काल साबित हो रहा है। दिल्ली सम्मेलन ने यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि इक्कीसवीं सदी का यह दशक सामूहिक सहकारिता, संप्रभुता के सम्मान और संतुलित वैश्विक विकास का दशक होगा।