'मुझे पागल साबित करने की हो रही कोशिश...' मुस्लिम प्रेमी संग रह रही सिख युवती की मानसिक जांच से हाईकोर्ट का इनकार, कोर्ट रूम में हुए कई बड़े खुलासे
बेंगलुरु: कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक बेहद संवेदनशील मामले की सुनवाई करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने अपने मर्जी से मुस्लिम प्रेमी के साथ रह रही 21 साल की एक सिख युवती की जबरन मानसिक जांच कराने की मांग वाली याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। यह याचिका लड़की की मां द्वारा अपनी बेटी को वापस पाने के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) के तहत दायर की गई थी। इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत में उस वक्त नया मोड़ आ गया जब युवती ने खुद सामने आकर अपनी मां और कुछ संगठनों पर बेहद गंभीर और चौंकाने वाले आरोप लगाए।
कोर्ट में लड़की का बड़ा खुलासा, बोलीं- डरा-धमका कर लिखवाई गई थी झूठी चिट्ठी
हाईकोर्ट की वेकेशन बेंच के सामने पेश हुई युवती ने अपने माता-पिता के दावों की हवा निकाल दी। उसने न्यायाधीशों के सामने बयान दिया कि अतीत में उसके माता-पिता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के कुछ सदस्यों ने उस पर मानसिक दबाव बनाया था। युवती ने आरोप लगाया कि उसे डराया-धमकाया गया और उसके प्रेमी के खिलाफ दुष्कर्म (रेप) व जबरन धर्म परिवर्तन कराने की झूठी शिकायत लिखवाई गई थी।
युवती ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि मैंने पहले जो भी चिट्ठी लिखी थी, वह पूरी तरह दबाव में आकर लिखी गई थी। मेरे माता-पिता ने मुझे आरएसएस के कार्यकर्ताओं से मिलवाया था और उन्हीं के कहने पर वह पत्र तैयार हुआ था। उसने कोर्ट को आश्वस्त किया कि न तो उसका धर्म परिवर्तन हुआ है और न ही उसके साथ कोई गलत काम हुआ है। यह सारे आरोप मनगढ़ंत हैं और उसे सिर्फ डराकर यह सब करवाया गया था।
मां के वकील ने दी निमहंस की रिपोर्ट, लड़की बोली- मुझे पागल साबित करने की है साजिश
याचिकाकर्ता मां की ओर से अदालत में पेश हुए वकील राहुल रेड्डी ने एक अलग ही दलील पेश की। उन्होंने कोर्ट को बताया कि युवती का पहले बेंगलुरु के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज (NIMHANS) में मनोवैज्ञानिक इलाज और थेरेपी सेशन चल चुका है। वकील ने अस्पताल के डिस्चार्ज समरी और पुराने मेडिकल रिकॉर्ड को अदालत के सामने रखते हुए मांग की कि लड़की का एक स्वतंत्र मानसिक मूल्यांकन कराया जाना चाहिए। उनका कहना था कि जांच से यह साफ हो सकेगा कि क्या युवती अपने होशोहवास में यह फैसला ले रही है या नहीं।
इस दलील का पुरजोर विरोध करते हुए युवती ने कहा कि उसके परिवार वाले उसे जबरन मानसिक रूप से बीमार साबित करने पर तुले हुए हैं। उसने अपने माता-पिता के साथ जाने से साफ मना कर दिया। युवती ने जजों के सामने अपनी बात मजबूती से रखते हुए कहा कि निमहंस का बहाना बनाकर मुझ पर जो पागल होने के आरोप मढ़े जा रहे हैं, वे सब फर्जी हैं। मैं मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ और स्थिर हूं। मुझे समझ नहीं आ रहा कि बालिग होने के बावजूद मेरे परिवार वाले मुझे इस कदर क्यों प्रताड़ित कर रहे हैं।
कर्नाटक हाईकोर्ट की दोटूक- बालिग लड़की को जबरन जांच के लिए मजबूर नहीं कर सकते
इस पूरे मामले को सुनने और युवती के आत्मविश्वास को देखने के बाद जस्टिस सूरज गोविंदराज और जस्टिस के. मन्मथ राव की खंडपीठ ने मां की याचिका को खारिज करने में देर नहीं लगाई। अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील से तीखा सवाल करते हुए कहा कि सिर्फ इसलिए कि आप मांग कर रहे हैं, किसी भी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध मानसिक जांच से गुजरने के लिए कैसे मजबूर किया जा सकता है? अगर आपको कोई शिकायत है तो आप 'मेंटल हेल्थकेयर एक्ट' के तहत तय कानूनी प्रक्रिया का पालन कर सकते हैं, लेकिन अदालत इस तरह का कोई जबरन आदेश जारी नहीं करेगी।
हाईकोर्ट ने अपने अंतिम आदेश में यह स्पष्ट कर दिया कि युवती कानूनन बालिग है और उसने अदालत के समक्ष खुद यह स्वीकार किया है कि वह बिना किसी दबाव के, अपनी स्वतंत्र इच्छा से अपने प्रेमी के साथ रह रही है। उसे किसी ने भी बंधक बनाकर नहीं रखा है। कानून के दायरे में जब कोई बालिग नागरिक अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनता है, तो उसमें किसी का हस्तक्षेप सही नहीं है। इसी के साथ अदालत ने मां की 'फरियाद' को नामंजूर करते हुए केस को बंद कर दिया।