चिदंबरम के वार पर बीजेपी का पलटवार, 'शर्म अल शेख' समझौते का हवाला देकर बताया भारत को क्या मिला?

चिदंबरम के वार पर बीजेपी का पलटवार, 'शर्म अल शेख' समझौते का हवाला देकर बताया भारत को क्या मिला?

भारतीय राजनीतिक गलियारों में इस समय राष्ट्रीय सुरक्षा, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश के बर्चस्व को लेकर एक बहुत बड़ा और तीखा सियासी संग्राम छिड़ गया है, जिसकी वजह ब्रिक्स (BRICS) संगठन और उससे जुड़े कूटनीतिक फैसले बने हैं। देश के पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम द्वारा ब्रिक्स सम्मेलन और हालिया भू-राजनीतिक गतिविधियों पर सरकार की नीतियों को लेकर उठाए गए सवालों के बाद से राजनीति का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। कांग्रेस पार्टी के तीखे हमलों का जवाब देते हुए भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने भी पूरी ताकत से पलटवार किया है और कांग्रेस के शासनकाल के दौरान हुए पुराने विवादित फैसलों—विशेषकर वर्ष 2009 के 'शर्म अल शेख' (Sharm el-Sheikh) समझौते—का हवाला देकर विपक्ष को करारा जवाब दिया है। सत्ताधारी पार्टी ने यह बताने की कोशिश की है कि किस प्रकार वर्तमान नेतृत्व ने कूटनीतिक मोर्चे पर देश के हितों को सर्वोपरि रखते हुए वैश्विक मंचों पर भारत का दबदबा कायम किया है, जबकि पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में हमेशा देश की कूटनीति को कमजोर करने वाले समझौते किए गए थे।

पी. चिदंबरम के तीखे सवाल और ब्रिक्स सम्मेलन पर उठाए गए राजनीतिक बिंदु

कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने अपने बयानों के जरिए केंद्र सरकार की विदेश नीति और बहुपक्षीय मंचों पर उसके रुख पर सवाल खड़े करते हुए यह जानने की कोशिश की थी कि वैश्विक आयोजनों और ब्रिक्स जैसी बैठकों से देश को जमीनी स्तर पर आर्थिक और रणनीतिक रूप से क्या हासिल हो रहा है। विपक्ष का यह हमेशा से तर्क रहा है कि सरकार को केवल अंतरराष्ट्रीय आयोजनों की चमक-दमक दिखाने के बजाय देश के भीतर के वास्तविक आर्थिक संकटों, बेरोजगारी और क्षेत्रीय सुरक्षा पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए। चिदंबरम जैसे अनुभवी नेता के इन बयानों के बाद राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह चर्चा तेज हो गई थी कि क्या भारत को बहुपक्षीय संगठनों के भीतर चीन या अन्य देशों के साथ संतुलन बनाते समय अपनी प्राथमिकताओं को और अधिक स्पष्ट करने की जरूरत है। विपक्ष के इन हमलों ने एक बार फिर से इस बात को साबित कर दिया है कि भारत जैसी बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विदेश नीति और कूटनीति के मुद्दों पर भी घरेलू राजनीति किस हद तक मुखर होकर आमने-सामने आ जाती है।

बीजेपी का जोरदार पलटवार और 'शर्म अल शेख' के पुराने जख्मों का जिक्र

कांग्रेस के इन हमलों का कड़ा और आक्रामक जवाब देते हुए बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ताओं और वरिष्ठ नेताओं ने पलटवार करते हुए वर्ष 2009 के उस दौर की याद दिलाई जब कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मिस्र के शर्म अल शेख में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी से मिले थे। बीजेपी का यह मुख्य आरोप रहा है कि शर्म अल शेख समझौते के उस संयुक्त बयान में बलूच आतंकवाद और अन्य संवेदनशील मामलों में भारत की पारंपरिक और मजबूत स्थिति से समझौता कर लिया गया था, जिसे देश की कूटनीति के इतिहास में एक बड़े आत्मसमर्पण के रूप में देखा जाता है। भगवा पार्टी के नेताओं ने यह दो टूक कहा कि जो लोग आज वर्तमान सरकार की मजबूत और स्वतंत्र विदेश नीति पर सवाल उठा रहे हैं, उन्हें पहले अपने गिरेबान में झांककर देखना चाहिए कि उन्होंने अपने शासनकाल में देश के सामरिक हितों को किस प्रकार कमजोर किया था। बीजेपी ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आज का भारत किसी के दबाव में झुकने वाला भारत नहीं है, बल्कि यह दुनिया की आंख में आंख डालकर अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना अच्छी तरह जानता है।

ब्रिक्स मंच पर भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व

वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में ब्रिक्स केवल एक आर्थिक संगठन नहीं रह गया है, बल्कि यह ग्लोबल साउथ की आवाज उठाने और पश्चिमी प्रभुत्व वाली वित्तीय व्यवस्था को संतुलित करने का एक बहुत बड़ा मंच बन चुका है। भारत ने इस संगठन के भीतर हमेशा अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) का परिचय दिया है और यह सुनिश्चित किया है कि किसी भी देश के व्यक्तिगत एजेंडे को पूरे संगठन पर हावी न होने दिया जाए। जब नई दिल्ली में ब्रिक्स से जुड़े कूटनीतिक घटनाक्रम आगे बढ़ रहे हैं, तब देश के भीतर इस तरह की राजनीतिक बयानबाजी इस बात का प्रतीक है कि भारत में कूटनीति अब केवल विदेश मंत्रालयों के बंद कमरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आम जनता की बहस का एक मुख्य हिस्सा बन चुकी है। आर्थिक सहयोग, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस जैसी नीतियों पर भारत ने ब्रिक्स के भीतर जो अपना रुख साफ किया है, उसने देश की वैश्विक साख को और अधिक मजबूत किया है, जिसे विपक्ष के राजनीतिक चश्मे से भले ही अलग तरह से देखा जा रहा हो, लेकिन दुनिया भर के रणनीतिकार इसकी सराहना कर रहे हैं।

घरेलू राजनीति बनाम राष्ट्रीय हित: कूटनीतिक बहसों का अंतहीन सिलसिला

देश के भीतर राजनीतिक दलों का एक-दूसरे पर वार-पलटवार करना लोकतंत्र का एक स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन जब बात देश की सीमाओं, अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और वैश्विक समझौतों की आती है, तो कई बार राजनीतिक सीमाओं से ऊपर उठकर सोचने की आवश्यकता होती है। चिदंबरम के बयानों पर बीजेपी का यह आक्रामक पलटवार इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आने वाले दिनों में संसद से लेकर चुनावी मंचों तक विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे मुख्य बहस का केंद्र बने रहेंगे। जनता अब बहुत समझदार हो चुकी है और वह यह अच्छी तरह जानती है कि किस पार्टी के शासनकाल में देश ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपना सम्मान खोया और किसके नेतृत्व में आज दुनिया भारत की एक-एक बात को ध्यान से सुनने के लिए मजबूर है। ब्रिक्स पर छिड़ी यह सियासी तकरार भले ही कुछ समय के लिए राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक द्वंद्व को बढ़ा रही हो, लेकिन यह अंततः देश की विदेश नीति और कूटनीतिक प्राथमिकताओं को और अधिक पारदर्शी और मजबूत बनाने में ही सहायक सिद्ध होगी।