लद्दाख की सदियों पुरानी शिल्पकला को लगा 'ग्लोबल पंख', पश्मीना समेत 8 पारंपरिक उत्पादों को मिला जीआई टैग

लद्दाख की सदियों पुरानी शिल्पकला को लगा 'ग्लोबल पंख', पश्मीना समेत 8 पारंपरिक उत्पादों को मिला जीआई टैग

केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख की सांस्कृतिक विरासत और सदियों पुरानी कला के लिए एक बेहद गौरवशाली खबर सामने आई है। लद्दाख के आठ पारंपरिक उत्पादों को एक साथ प्रतिष्ठित भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग (GI Tag) से नवाजा गया है। इस ऐतिहासिक फैसले से न सिर्फ यहां की प्राचीन कला और पारंपरिक ज्ञान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है, बल्कि स्थानीय कारीगरों के लिए तरक्की के नए रास्ते भी खुल गए हैं।

इस बड़ी उपलब्धि पर खुशी जताते हुए उपराज्यपाल ने कहा कि यह सिर्फ एक प्रमाणन नहीं है, बल्कि लद्दाख के लोगों की सदियों पुरानी मेहनत, शिल्पकला और सांस्कृतिक विरासत को मिला एक सच्चा सम्मान है। इससे उत्पादों को वैश्विक प्रामाणिकता मिलेगी, जिससे बाजार में नकली सामानों से इनका बचाव होगा और स्थानीय कारीगरों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी।

इन 8 खास लद्दाखी कलाकृतियों को मिला जीआई टैग

लद्दाख की जिन आठ अनूठी विधाओं और उत्पादों को जीआई टैग की सूची में शामिल किया गया है, उनमें लद्दाख चल्ली टेक्सटाइल्स, लद्दाख थिग्मा, लद्दाख पेंटिंग, पाबू ऑफ लद्दाख, लद्दाख नाम्बू टेक्सटाइल, लद्दाख पश्मीना टेक्सटाइल, लद्दाख चिलिंग मेटल वर्क और लद्दाख लिकिर पॉटरी शामिल हैं। आपको बता दें कि इन 8 नए उत्पादों से पहले लद्दाख की 'राक्तसे करपो खुबानी' और 'शिंग-त्साक' (लकड़ी की नक्काशी) को भी यह गौरव मिल चुका है, जिससे अब लद्दाख के प्रमाणित उत्पादों की साख दुनिया भर में और मजबूत हो गई है।

दुनिया का सबसे कीमती कपड़ा: लद्दाखी पश्मीना और चल्ली टेक्सटाइल

लद्दाख का पश्मीना टेक्सटाइल पूरी दुनिया में अपने सबसे महीन और महंगे प्राकृतिक कपड़ों के लिए मशहूर है। यह कपड़ा लद्दाख की विषम भौगोलिक परिस्थितियों, समृद्ध संस्कृति और चीन सीमा से सटे चांगपा समुदाय के घुमंतू पशुपालकों की कड़ी मेहनत की कहानी बयां करता है। वहीं, लद्दाख चल्ली टेक्सटाइल को याक और बकरियों के प्राकृतिक बालों से बेहद खूबसूरती के साथ बुना जाता है, जो प्राकृतिक सफेद, हल्के और गहरे भूरे रंग के आकर्षक शेड्स में उपलब्ध होता है।

थिग्मा कला और लिकिर पॉटरी का अनोखा जादू

लद्दाख की पारंपरिक टाई-एंड-डाई यानी रंगाई तकनीक 'थिग्मा' का जादू नुब्रा घाटी और साबू क्षेत्र में देखने को मिलता है। इसकी तुलना अक्सर देश की प्रसिद्ध बंधनी शैली से की जाती है, जिसमें भेड़ या मेमने की ऊन को विशेष तरीके से कसकर बांधा जाता है, जिससे रंगाई के बाद बेहद खूबसूरत गोलाकार डिजाइन उभरते हैं। इसके अलावा, लेह से करीब 60 किलोमीटर दूर ज़ांस्कर नदी के किनारे बसे चिलिंग गांव के धातु शिल्प (मेटल वर्क) और लिकिर में मिट्टी से तैयार होने वाले बर्तनों (लिकिर पॉटरी) को भी जीआई टैग देकर सुरक्षित किया गया है।

हाड़ कंपाने वाली ठंड का रक्षक: पाबू बूट और नाम्बू वस्त्र

लद्दाख के दुर्गम रास्तों और शून्य से नीचे के तापमान को झेलने के लिए 'पाबू ऑफ लद्दाख' (पारंपरिक हस्तनिर्मित जूते) सदियों से स्थानीय लोगों का सहारा रहे हैं। इन्हें हाथ से काते गए ऊन, याक के बाल और मजबूत चमड़े के मिश्रण से बनाया जाता है, जो पैरों को गजब की गर्माहट और आराम देते हैं। इसी तरह, 'नाम्बू' भी चांगथांग क्षेत्र की स्थानीय भेड़ों की ऊन से बना एक पारंपरिक वस्त्र है, जो अपनी प्राकृतिक ऊष्मा संरक्षण क्षमता के कारण लद्दाखी चोगा और विंटर जैकेट बनाने का मुख्य आधार है।