CJP प्रोटेस्ट के बीच चुनाव आयोग का बड़ा कदम: फॉर्म 7 के नियमों में भारी बदलाव
देश की राजधानी दिल्ली में चल रहे गरमागरम सीजेपी (CJP) प्रोटेस्ट और मतदाता सूचियों में धांधली के आरोपों के बीच भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने एक बहुत बड़ा और सख्त फैसला लिया है। चुनाव आयोग ने मतदाता सूची से किसी का नाम हटाने या उस पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए इस्तेमाल होने वाले बेहद संवेदनशील 'फॉर्म 7' (Form 7) के नियमों में बड़ा संशोधन कर दिया है। अब तक भौतिक रूप से थोक में फॉर्म भरने और फर्जी तरीके से नाम कटवाने की शिकायतों को देखते हुए आयोग ने यह तय कर दिया है कि विशेष पुनरीक्षण (SIR) अवधि के दौरान कोई भी पंजीकृत मतदाता अधिकतम 10 बार ही फॉर्म 7 जमा कर सकेगा। आयोग के इस कड़े फैसले से राजनीतिक गलियारों और प्रशासनिक हलकों में एक नई हलचल पैदा हो गई है, क्योंकि पिछले कुछ समय से बड़े पैमाने पर बल्क में नाम कटवाने के आवेदनों को लेकर लगातार सवाल उठ रहे थे।
क्या है फॉर्म 7 और क्यों उठ रहे थे इसके दुरुपयोग पर गंभीर सवाल?
भारतीय चुनाव प्रक्रिया के नियमों के तहत 'फॉर्म 7' वह आधिकारिक दस्तावेज है जिसका उपयोग किसी निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में किसी व्यक्ति के नाम शामिल किए जाने पर आपत्ति जताने या पहले से दर्ज किसी मतदाता का नाम सूची से हटाने का अनुरोध करने के लिए किया जाता है। हाल के दिनों में कर्नाटक, ओडिशा और कई अन्य राज्यों से ऐसी शिकायतें सामने आई थीं कि कुछ निहित स्वार्थ वाले लोगों या राजनीतिक कार्यकर्ताओं द्वारा थोक (Bulk) में हजारों फॉर्म 7 भरकर वैध मतदाताओं के नाम चुपचाप कटवाने की साजिश रची जा रही है। इन गड़बड़ियों के खिलाफ विभिन्न नागरिक संगठनों और सीजेपी मंचों ने मोर्चा खोल दिया था और देश भर में प्रदर्शन तेज हो गए थे। इसी पृष्ठभूमि में चुनाव आयोग ने पारदर्शिता सुनिश्चित करने और फर्जीवाड़े पर लगाम लगाने के लिए यह सख्त कदम उठाया है।
चुनाव आयोग के नए निर्देश: ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों के लिए कड़े नियम
नए दिशा-निर्देशों के मुताबिक, अब चुनाव आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि दावे और आपत्तियों की विशेष अवधि (Summary Revision Period) के दौरान एक व्यक्तिगत मतदाता अधिकतम 10 फॉर्म-7 ही दाखिल कर सकेगा। इसके अलावा, मतदाता सूची के निरंतर अद्यतीकरण (Continuous Updation) के सामान्य दिनों में यह सीमा घटाकर प्रति माह केवल 5 आवेदन तय कर दी गई है। सबसे अहम बात यह है कि यह सख्त सीमा ऑनलाइन और ऑफलाइन (भौतिक रूप से जमा किए जाने वाले फॉर्म) दोनों ही तरीकों पर समान रूप से लागू होगी। पहले जहां ऑनलाइन आवेदन सीमित थे, वहीं फिजिकल फॉर्म्स की कोई तय सीमा न होने के कारण दुरुपयोग की आशंका बनी रहती थी, जिसे अब पूरी तरह से बंद कर दिया गया है।
इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) के लिए अनिवार्य हुई भौतिक जांच और सुनवाई
चुनाव आयोग ने अपने नए आदेश में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (CEOs) को यह निर्देश दिया है कि वे मैदानी स्तर के अधिकारियों तक इन नियमों को सख्ती से पहुंचाएं। नए नियमों के तहत अब किसी भी मतदाता का नाम आसानी से नहीं काटा जा सकेगा। इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रत्येक फॉर्म 7 की पूरी तरह से भौतिक और कागजी जांच हो। आपत्ति दर्ज कराने वाले व्यक्ति को नोटिस देकर व्यक्तिगत रूप से बुलाया जाएगा और हर आवेदन के लिए उसके अलग से बयान दर्ज किए जाएंगे। इसके साथ ही, जिस मतदाता के नाम पर आपत्ति जताई गई है, उसे भी अपना पक्ष रखने का पूरा मौका दिया जाएगा। यदि कोई आवेदन फर्जी या मनगढ़ंत पाया जाता है, तो जनप्रतिनिधि कानून के तहत सख्त कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है।
लोकतांत्रिक शुचिता और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश
चुनाव आयोग का यह संशोधन ऐसे समय में आया है जब देश में मतदाता सूचियों की शुद्धता और निष्पक्षता को लेकर राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों के बीच तीखी बहस छिड़ी हुई है। सीजेपी और अन्य समूहों के विरोध प्रदर्शनों के बीच आयोग का यह कदम इस बात का संदेश देता है कि संस्था चुनावी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी या सुनियोजित छेड़छाड़ को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। विश्लेषकों का मानना है कि इन नए नियमों से न केवल फर्जी शिकायतों और थोक में नाम कटवाने के अवैध धंधों पर लगाम लगेगी, बल्कि आम मतदाताओं के लोकतांत्रिक अधिकारों की भी पुख्ता सुरक्षा हो सकेगी। आने वाले चुनावों के मद्देनजर चुनाव आयोग की यह सख्ती चुनावी प्रणाली को और अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने की दिशा में एक बहुत बड़ा मील का पत्थर साबित होगी।