सीमा पर टकराव नहीं शांति पर जोर... NSA डोभाल की बीजिंग यात्रा से क्या बदलेगा?

सीमा पर टकराव नहीं शांति पर जोर... NSA डोभाल की बीजिंग यात्रा से क्या बदलेगा?

भारत और चीन के बीच कूटनीतिक मोर्चे पर एक बेहद अहम और बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल चीन की राजधानी बीजिंग के दौरे पर पहुंचे हैं। उनकी इस यात्रा को दोनों एशियाई दिग्गजों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने और सीमा पर पिछले कुछ वर्षों से चले आ रहे तनाव को पूरी तरह समाप्त करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम के रूप में देखा जा रहा है। कूटनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि क्या यह हाई-प्रोफाइल यात्रा साल 2005 की उस स्थिति को वापस लाने में कामयाब होगी, जब दोनों देशों के बीच संबंधों में एक मजबूत विश्वास और स्थिर सहयोग का दौर चल रहा था। इस यात्रा से न केवल एशियाई कूटनीति में गर्माहट आने की उम्मीद है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी भारत और चीन के संबंधों की दिशा पर गहरी नजर रखी जा रही है।

सीमा पर टकराव को पीछे छोड़कर स्थायी शांति की बहाली पर विशेष जोर

बीजिंग में आयोजित हो रही इन उच्चस्तरीय बैठकों का मुख्य एजेंडा पूर्वी लद्दाख और वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर लंबे समय से चले आ रहे गतिरोध को खत्म करना है। भारत ने हमेशा से यह स्पष्ट किया है कि जब तक सीमा पर शांति और स्थिरता बहाल नहीं होती, तब तक व्यापारिक और सामान्य द्विपक्षीय संबंधों का सामान्य गति से आगे बढ़ना संभव नहीं है। एनएसए अजीत डोभाल अपनी इस कूटनीतिक यात्रा के दौरान चीनी समकक्षों के साथ बहुत ही स्पष्ट और दो-टोूक लहजे में चर्चा कर रहे हैं। बातचीत का मुख्य केंद्र बिंदु यह है कि दोनों देशों को सैन्य टकराव के रास्ते को छोड़कर आपसी विश्वास को फिर से मजबूत करना चाहिए। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि दोनों देशों के बीच संवाद का खुला रहना ही किसी भी बड़े विवाद को टालने का एकमात्र और सबसे असरदार रास्ता है।

क्या साल 2005 जैसे दौर में वापस लौटेंगे भारत और चीन के कूटनीतिक संबंध

विशेषज्ञों के बीच यह बड़ा सवाल लगातार बना हुआ है कि क्या भारत और चीन अपने रिश्तों को साल 2005 के उस सुनहरे दौर में ले जा सकते हैं, जब सीमाई मुद्दों को दरकिनार कर दोनों देश आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को बढ़ावा दे रहे थे। उस समय दोनों देशों के बीच विशेष प्रतिनिधियों की वार्ता प्रणाली शुरू की गई थी, जिसने आपसी व्यापार और राजनीतिक संवाद को एक नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया था। हालांकि, साल 2020 की गलवान घाटी की दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद दोनों देशों के आपसी विश्वास को गहरा झटका लगा था, जिसके बाद से रिश्ते बेहद निचले स्तर पर चले गए थे। अब एनएसए अजीत डोभाल की बीजिंग यात्रा से यह उम्मीद बंध रही है कि दोनों देश एक बार फिर से कूटनीतिक परिपक्वता का परिचय देते हुए पुराने विवादों को पीछे छोड़ेंगे और भविष्य के विकास के लिए एक नई रूपरेखा तैयार करेंगे।

भारत की मजबूत कूटनीतिक स्थिति और चीन का बदलता रणनीतिक रुख

आज का भारत साल 2005 की तुलना में वैश्विक पटल पर आर्थिक और सैन्य रूप से कहीं अधिक मजबूत, आत्मनिर्भर और मुखर स्थिति में खड़ा है। भारत ने अपनी विदेश नीति में यह साफ कर दिया है कि राष्ट्रीय संप्रभुता और सुरक्षा से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि चीन अब भारत के साथ कूटनीतिक वार्ताओं में अधिक सतर्क और गंभीर नजर आ रहा है। अमेरिकी भू-राजनीतिक बदलावों और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के इस दौर में चीन भी यह अच्छी तरह समझता है कि भारत जैसे विशाल बाजार और उभरती हुई महाशक्ति के साथ लंबे समय तक तनावपूर्ण रिश्ते रखना उसके अपने आर्थिक हितों के लिए भी नुकसानदेह साबित हो सकता है। डोभाल की यह यात्रा इसी रणनीतिक संतुलन को साधने और चीन को यह संदेश देने में बेहद अहम है कि भारत शांति का समर्थक है, लेकिन अपनी शर्तों पर और समान सम्मान के साथ।

आर्थिक सहयोग, व्यापारिक संतुलन और क्षेत्रीय स्थिरता पर व्यापक असर

भारत और चीन के बीच संबंधों के सुधरने का असर केवल दोनों देशों की सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव पूरे दक्षिण एशिया और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। दोनों देशों के बीच व्यापारिक असंतुलन को दूर करने और आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित रखने पर भी इन बैठकों में गहन मंथन हो रहा है। यदि सीमा पर स्थायी शांति बहाल होती है, तो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, तकनीकी साझेदारी और बहुपक्षीय मंचों पर आपसी सहयोग के नए रास्ते खुलेंगे। अजीत डोभाल की बीजिंग यात्रा से यह संकेत मिल रहे हैं कि कूटनीतिक संवाद के जरिए अविश्वास की दीवारों को गिराया जा सकता है। आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच होने वाले फैसलों से यह तय होगा कि क्या एशिया की ये दो बड़ी ताकतें मिलकर एक नए और स्थिर भविष्य की नींव रखने जा रही हैं।