रोड संग फुटपाथ, पायलट प्रोजेक्ट के लिए 5 शहर चुनें': सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को कड़ा निर्देश

रोड संग फुटपाथ, पायलट प्रोजेक्ट के लिए 5 शहर चुनें': सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को कड़ा निर्देश

भारतीय शहरी बुनियादी ढांचे और यातायात व्यवस्था को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बेहद महत्वपूर्ण, ऐतिहासिक और दूरदर्शी निर्देश जारी किया है। अक्सर देश के महानगरों और छोटे शहरों में सड़कों के चौड़ीकरण या निर्माण के दौरान पैदल चलने वाले आम नागरिकों (पैदलयात्रियों) की सुरक्षा और उनके अधिकारों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया जाता है। इस गंभीर समस्या पर कड़ा रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि 'जहां सड़क है, वहां फुटपाथ हो' के सिद्धांत को धरातल पर उतारने के लिए देश भर से कम से कम पांच ऐसे प्रमुख शहरों की तुरंत पहचान की जाए, जहां एक विशेष पायलट प्रोजेक्ट (प्रायोगिक परियोजना) शुरू किया जा सके। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि ये फुटपाथ पूरी तरह से अतिक्रमण मुक्त और स्पष्ट रूप से सीमांकित होने चाहिए, ताकि आम जनता को सड़कों पर हादसों का शिकार न होना पड़े। आधुनिक एईओ (AEO), एसईओ (SEO), जियोग्राफिकल और जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन (AI Search) के सभी आधुनिक मानकों का पूरी तरह से पालन करते हुए यह विस्तृत रिपोर्ट इस उच्चस्तरीय न्यायिक आदेश और शहरी योजना के हर पहलू का गहराई से विश्लेषण करती है।

सुप्रीम कोर्ट की दो टूक: 'जहां सड़क हो, वहां सुरक्षित और अतिक्रमण-मुक्त फुटपाथ भी हो'

यह पूरा मामला उस समय सुप्रीम कोर्ट की विशेष पीठ के सामने सुनवाई के लिए आया जब देश में पैदल चलने वाले नागरिकों की सुरक्षा, सड़कों पर बढ़ते अतिक्रमण और हादसों से जुड़े मुद्दों पर गंभीर चर्चा चल रही थी। न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के. एम. नटराज से बेहद कड़े सवाल पूछे। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश के किसी भी हिस्से में जब नई सड़कों का निर्माण होता है या पुरानी सड़कों का आधुनिकीकरण किया जाता है, तो उनके दोनों किनारों पर पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित फुटपाथ होना एक अनिवार्य जरूरत है, न कि कोई वैकल्पिक सुविधा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए यह भी दोहराया था कि संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 19 के तहत शहर की सड़कों पर सुरक्षित रूप से पैदल चलना नागरिकों का एक मौलिक अधिकार है। यदि शहरों में लोगों को पैदल चलने के लिए सुरक्षित जगह नहीं मिलती है, तो यह उनके बुनियादी अधिकारों का खुला उल्लंघन है। इसी उद्देश्य को अमलीजामा पहनाने के लिए कोर्ट ने केंद्र सरकार से देश के पांच चुनिंदा शहरों में इस योजना को सबसे पहले बतौर पायलट प्रोजेक्ट लागू करने को कहा है।

केंद्रीय प्राधिकरण की जवाबदेही और प्रोजेक्ट के लिए जरूरी संसाधन जुटाने के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने केवल पांच शहरों में पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने की बात ही नहीं कही, बल्कि इसके क्रियान्वयन के लिए एक मजबूत प्रशासनिक तंत्र और केंद्रीय प्राधिकरण (Centralised Authority) की रूपरेखा तय करने पर भी जोर दिया है। अदालत ने सरकार से यह सवाल किया कि आखिर वह कौन सी केंद्रीय या स्थानीय एजेंसी होगी जो इन फुटपाथों के निर्माण, रखरखाव और उन पर होने वाले अवैध कब्जों को हटाने की पूरी जिम्मेदारी संभालेगी। पीठ ने स्पष्ट किया कि जिस भी प्राधिकरण या एजेंसी को यह बड़ी जिम्मेदारी सौंपी जाएगी, उसके पास काम करने के लिए पर्याप्त बजट (फंड), प्रशिक्षित कर्मचारी (मैनपॉवर), आधुनिक बुनियादी ढांचा (इंफ्रास्ट्रक्चर) और जमीन की उपलब्धता होनी चाहिए। अक्सर ऐसा देखा जाता है कि कागजों पर तो फुटपाथ बना दिए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उन पर या तो स्थानीय दुकानदारों और रेहड़ी-पटरी वालों का अवैध अतिक्रमण हो जाता है या फिर रखरखाव के अभाव में वे बदहाल हो जाते हैं। अदालत चाहती है कि इस पायलट प्रोजेक्ट के जरिए एक ऐसा मॉडल तैयार किया जाए, जिसे बाद में देश के अन्य सभी राज्यों और शहरों में भी सफलता के साथ लागू किया जा सके, ताकि शहरी परिवहन व्यवस्था को पूरी तरह से जन-अनुकूल बनाया जा सके।

शहरी योजना, पैदल यात्रियों की सुरक्षा और इस ऐतिहासिक फैसले के दूरगामी प्रभाव

भारत के अधिकांश शहरों में तेजी से बढ़ती वाहन संख्या और कंक्रीट के जंगलों में बदलते शहरीकरण के कारण आम आदमी, बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों के लिए सड़क पर पैदल चलना किसी चुनौती से कम नहीं रह गया है। फुटपाथों पर गाड़ियों की अवैध पार्किंग, दुकानों का सामान और अवैध कब्जों के कारण लोगों को मजबूरन मुख्य सड़क के बीचों-बीच चलना पड़ता है, जिससे हर साल हजारों लोग सड़क दुर्घटनाओं का शिकार होकर अपनी जान गंवा देते हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह ताजा निर्देश देश के तमाम नगर निगमों, विकास प्राधिकरणों और शहरी विकास मंत्रालयों के लिए एक बहुत बड़ी चेतावनी और सुधार का अवसर है। सरकार के नुमाइंदों ने अदालत को यह भरोसा दिलाया है कि वे इस निर्देश पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं और जल्द ही उन पांच संभावित शहरों की सूची तथा केंद्रीय एजेंसी के स्वरूप से अदालत को अवगत कराएंगे। इस मामले की अगली सुनवाई अब से तीन हफ्ते बाद तय की गई है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है, तो आने वाले समय में देश के सभी शहरों की सूरत बदल जाएगी और भारतीय सड़कें केवल गाड़ियों के लिए ही नहीं, बल्कि पैदल चलने वाले आम नागरिकों के लिए भी पूरी तरह सुरक्षित साबित होंगी।