क्या रसोई गैस की जगह ले सकता था एथेनॉल, सरकार ने संसद में कर दिया साफ
भारत में इन दिनों पर्यावरण और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं। देश में पेट्रोल और डीजल के विकल्प के रूप में एथेनॉल का इस्तेमाल तेजी से बढ़ाया जा रहा है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी था कि क्या आने वाले वक्त में भारतीय रसोई में इस्तेमाल होने वाले एलपीजी यानी रसोई गैस की जगह एथेनॉल ले सकता है।
इस बारे में सरकार ने संसद में बड़ा बयान देते हुए सभी अटकलों पर विराम लगा दिया है। पेट्रोलियम मंत्रालय की तरफ से स्थिति पूरी तरह साफ कर दी गई है कि फिलहाल ऐसा कोई भी प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है।
रसोई में एथेनॉल लाने की फिलहाल कोई योजना नहीं
संसद के सत्र के दौरान सरकार ने स्पष्ट किया कि देश के किसी भी हिस्से में एथेनॉल को घरेलू खाना पकाने के ईंधन के रूप में मंजूरी देने या इसे अनिवार्य करने जैसी कोई योजना नहीं है। इसका सीधा मतलब यह है कि भारतीय घरों में खाना पकाने के लिए एलपीजी ही मुख्य ईंधन बना रहेगा।
हालांकि सरकार इस बात से इनकार नहीं करती कि भविष्य में एथेनॉल एक वैकल्पिक ईंधन के तौर पर अपनी भूमिका निभा सकता है। यदि ऐसा होता है तो इससे विदेशों से मंगाई जाने वाली एलपीजी पर देश की निर्भरता कुछ हद तक कम हो सकती है और लोगों को एक साफ-सुथरा विकल्प मिल सकेगा। सरकार के पास देश में एथेनॉल का अतिरिक्त उत्पादन भी उपलब्ध है, जिसका उपयोग ऊर्जा के दूसरे क्षेत्रों में करने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं।
डीजल में एथेनॉल मिलाने के प्रस्ताव को क्यों किया गया खारिज?
सिर्फ रसोई ही नहीं बल्कि गाड़ियों के ईंधन को लेकर भी सरकार ने स्थिति स्पष्ट की है। सरकारी तेल कंपनियों ने अपने रिसर्च और डेवलपमेंट सेंटर्स के जरिए डीजल में एथेनॉल मिलाने को लेकर वैज्ञानिक परीक्षण किए थे। इन टेस्ट्स में वाहन निर्माताओं और मान्यता प्राप्त लैब्स की भी मदद ली गई थी। लेकिन इन परीक्षणों के दौरान एक बड़ी तकनीकी और सुरक्षा से जुड़ी समस्या सामने आई। वैज्ञानिकों ने पाया कि डीजल में एथेनॉल मिलाने से उसका फ्लैश प्वाइंट काफी कम हो जाता है, जिसकी वजह से यह मिश्रित ईंधन सुरक्षा के तय मानकों और जरूरतों पर खरा नहीं उतर पा रहा था। इसी तकनीकी खामी के चलते फिलहाल डीजल के साथ एथेनॉल के मिश्रण के विचार को खारिज कर दिया गया है।