छात्रों की ऐतिहासिक जीत और हेमंत सोरेन के 5 बड़े वादे: जानिए पिछले 12 घंटों में झारखंड की राजनीति में क्या-क्या हुआ
झारखंड की आबोहवा में पिछले कुछ घंटों से राजनीतिक सरगर्मी और युवाओं के जोश का एक नया ही बवंडर उठा हुआ है। राज्य में पिछले 12 घंटों के दौरान जो घटनाक्रम सामने आए हैं, उन्होंने पूरे प्रशासनिक और सियासी गलियारों को हिलाकर रख दिया है। सबसे बड़ी खबर उन लाखों प्रतियोगी छात्रों के लिए है जो लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर संघर्ष कर रहे थे। राज्य सरकार ने बड़ा कदम उठाते हुए जेएसएससी-सीजीएल (JSSC-CGL) परीक्षा समेत आउटसोर्स एजेंसी टीडीपीएल (TDPL) के माध्यम से साल 2014 से आयोजित की गईं परीक्षाओं और उनके परिणामों को रद्द करने का ऐतिहासिक फैसला लिया है। छात्रों के इस लंबे संघर्ष और आंदोलन का नेतृत्व कर रहे देवेंदर नाथ महतो ने इसे युवाओं की एक बड़ी जीत करार दिया है। हालांकि, परीक्षा रद्द होने के बाद से उन चयनित अभ्यर्थियों के बीच भी चिंता बढ़ गई है जो पहले ही अपनी सफलता का जश्न मना रहे थे। इस फैसले के बाद से झारखंड की राजधानी रांची से लेकर विभिन्न जिलों तक छात्रों की प्रतिक्रियाओं का दौर जारी है और हर तरफ इसी बात की चर्चा है कि आखिर इस उथल-पुथल का अगला अध्याय क्या होगा।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के 5 प्रमुख वादे और परीक्षा प्रणाली में सुधार के बड़े कदम
छात्रों के भारी विरोध और राज्य में बढ़ती राजनीतिक दबाव के बीच मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने स्थिति को संभालने के लिए पांच अहम और बड़े वादे व फैसले लिए हैं। सरकार का यह प्रयास है कि भविष्य में किसी भी युवा के भविष्य के साथ खिलवाड़ न हो और चयन प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी बने। हेमंत सरकार द्वारा उठाए गए इन पांच प्रमुख कदमों और वादों में निम्नलिखित बिंदु शामिल हैं:
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फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन: झारखंड हाईकोर्ट से यह औपचारिक अनुरोध किया जाएगा कि जेपीएससी (JPSC) और जेएसएससी (JSSC) से जुड़े पुराने और लंबित मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए एक विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया जाए।
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उच्चस्तरीय जांच समिति की रिपोर्ट: परीक्षाओं में हुई गड़बड़ियों और अनियमितताओं की तह तक जाने के लिए सीनियर आईएएस अधिकारी अमिताभ कौशल की अध्यक्षता वाली समिति को जल्द से जल्द अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं।
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आंतरिक सतर्कता प्रकोष्ठ (Vigilance Cell) का निर्माण: परीक्षा आयोजनों में भ्रष्टाचार और धांधली को रोकने के लिए आयोगों के भीतर एक मजबूत और स्वतंत्र आंतरिक सतर्कता प्रकोष्ठ स्थापित किया जाएगा।
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पारदर्शी और सुरक्षित आउटसोर्सिंग नीतियां: भविष्य में परीक्षा के संचालन और तकनीकी कार्यों के लिए ऐसी एजेंसियों का चयन किया जाएगा जिनकी साख बेदाग हो और जिनकी निगरानी सीधे प्रशासनिक अधिकारियों के हाथ में हो।
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युवाओं के लिए रोजगार सुरक्षा: सरकार ने यह आश्वासन भी दिया है कि रद्द की गई परीक्षाओं को नए सिरे से और पूरी शुचिता के साथ कम से कम समय में दोबारा आयोजित किया जाएगा ताकि छात्रों का शैक्षणिक वर्ष बर्बाद न हो।
बीजेपी के सवालिया तीर और विपक्ष का आक्रामक रुख
सत्ता पक्ष द्वारा उठाए गए इन कदमों के बाद भी राज्य का मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार पर पूरी तरह से हमलावर मुद्रा में आ गया है। बीजेपी के नेताओं का कहना है कि हेमंत सोरेन सरकार ने यह फैसला अपनी नाकामी को छुपाने और युवाओं के गुस्से से बचने के लिए मजबूरी में लिया है। विपक्षी दलों का सवाल है कि यदि पिछले कई सालों से परीक्षाओं में इतनी बड़ी गड़बड़ियां हो रही थीं, तो सरकार की नींद अब जाकर क्यों खुली? बीजेपी ने आरोप लगाया है कि झारखंड के युवाओं को हर बार सिर्फ आश्वासन और वादों के जाल में उलझाया गया है, जबकि जमीनी स्तर पर रोजगार के अवसर लगातार कम हो रहे हैं। परीक्षा रद्द होने के प्रशासनिक परिणामों और छात्रों के बीच मचे असमंजस को लेकर राजनीतिक दलों के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। विपक्षी दल यह भी मांग कर रहे हैं कि इस पूरे घोटाले के असली जिम्मेदारों और भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कड़ी आपराधिक कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई भी एजेंसी या अधिकारी छात्रों के भविष्य के साथ खिलваड़ करने की हिम्मत न जुटा सके।
झारखंड की राजनीति और प्रशासनिक भविष्य की अनिश्चितता
पिछले 12 घंटों के इन ताबड़तोड़ घटनाक्रमों ने यह साबित कर दिया है कि झारखंड की राजनीति में 'युवा और छात्र शक्ति' सबसे बड़ा केंद्र बिंदु बन चुकी है। आगामी चुनावों और राजनीतिक भविष्य को देखते हुए कोई भी दल इस वर्ग को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकता। एक तरफ जहां छात्र अपनी जीत का जश्न मना रहे हैं और यह उम्मीद कर रहे हैं कि नई परीक्षाएं निष्पक्ष तरीके से होंगी, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक मशीनरी के लिए इन वादों को धरातल पर उतारना एक बड़ी चुनौती साबित होने वाला है। सरकार और आयोगों की साख को बचाने के लिए अब यह जरूरी हो गया है कि हर एक कदम पूरी पारदर्शिता के साथ उठाया जाए। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या सरकार इन वादों पर खरी उतर पाती है या फिर यह आंदोलन और अधिक विकराल रूप धारण करता है। झारखंड के राजनीतिक पटल पर यह उबाल फिलहाल थमने का नाम नहीं ले रहा है और हर एक घंटे के साथ नए समीकरण बनते-बिगड़ते नजर आ रहे हैं।