इतिहास रचने वाली हैं जस्टिस बी.वी. नागरत्ना! बन सकती हैं भारत की पहली महिला CJI
भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में स्वतंत्रता के बाद पहली बार एक नया और ऐतिहासिक अध्याय जुड़ने जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) की वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस बी.वी. नागरत्ना देश की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India - CJI) बनने की कतार में सबसे आगे हैं।
सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा वरिष्ठता सूची (सीनियरिटी लिस्ट) के अनुसार, जस्टिस विक्रम नाथ के कार्यकाल के बाद जस्टिस नागरत्ना देश के सर्वोच्च न्यायिक पद का दायित्व संभाल सकती हैं। शीर्ष अदालत में अपने कार्यकाल के दौरान कई ऐतिहासिक, साहसिक और नजीर पेश करने वाले फैसलों के जरिए उन्होंने विधिक जगत में अपनी एक मजबूत और स्वतंत्र पहचान बनाई है।
बेंगलुरु से दिल्ली विश्वविद्यालय और फिर वकालत का शानदार सफर
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना का जन्म 30 अक्टूबर 1962 को कर्नाटक के बेंगलुरु में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक उच्च शिक्षा दिल्ली के प्रतिष्ठित जीसस एंड मैरी कॉलेज से पूरी की, जहाँ से उन्होंने इतिहास में बी.ए. (ऑनर्स) की उपाधि प्राप्त की।
इसके पश्चात, वर्ष 1987 में उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के विख्यात कैंपस लॉ सेंटर (CLC) से एलएल.बी. की डिग्री हासिल की। उसी वर्ष यानी 1987 में उन्होंने बार में अपना पंजीकरण कराकर वकालत की शुरुआत की। अपने सुदीर्घ कानूनी करियर के दौरान उन्होंने संवैधानिक कानून, प्रशासनिक कानून, वाणिज्यिक विवाद और पारिवारिक विधि सहित कई जटिल विधिक क्षेत्रों में व्यापक पैरवी की और कानूनी बारीकियों पर अपनी विशिष्ट पकड़ बनाई।
पिता भी रह चुके हैं देश के 19वें सीजेआई, रचेगा नया कीर्तिमान
जस्टिस नागरत्ना के परिवार का न्यायिक इतिहास बेहद समृद्ध और गौरवशाली रहा है। उनके पिता, जस्टिस ई.एस. वेंकटरमैया, भारत के 19वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। उन्होंने 19 जून 1989 से दिसंबर 1989 तक शीर्ष पद संभाला था। यदि जस्टिस नागरत्ना मुख्य न्यायाधीश के पद पर आसीन होती हैं, तो यह भारतीय न्यायिक इतिहास का पहला ऐसा अनूठा उदाहरण होगा जब पिता के बाद उनकी बेटी भी देश के सर्वोच्च न्यायिक पद को सुशोभित करेगी।
'धमकियों से नहीं डरते, गरिमा बनाए रखना जानते हैं'— जब वकीलों का डटकर किया सामना
जस्टिस नागरत्ना हमेशा से अपने निर्भीक, निष्पक्ष और दृढ़ स्वभाव के लिए जानी जाती रही हैं। वर्ष 2009 में जब वे कर्नाटक उच्च न्यायालय में न्यायाधीश थीं, तब वकीलों के एक उग्र समूह ने कोर्ट परिसर में उन्हें घेर लिया था। उस बेहद तनावपूर्ण और अप्रिय स्थिति में भी उन्होंने अनुकरणीय साहस, संतुलन और गरिमा का परिचय दिया और वकीलों के दबाव के आगे झुकने से साफ इनकार कर दिया।
उस समय उनके साहसिक शब्द चर्चा का विषय बने थे, जब उन्होंने स्पष्ट कहा था कि वे ऐसी धमकियों से कतई नहीं डरेंगी क्योंकि उन्होंने कानून और संविधान की रक्षा की शपथ ली है तथा वे अपनी और अदालत की गरिमा बनाए रखना भली-भांति जानती हैं।
नोटबंदी पर ऐतिहासिक असहमति और महत्वपूर्ण फैसले
सुप्रीम कोर्ट की स्थापना वर्ष 1950 में हुई थी, लेकिन सात दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी अब तक कोई भी महिला न्यायाधीश मुख्य न्यायाधीश के पद तक नहीं पहुंच सकी है। हालांकि शीर्ष अदालत में महिला जजों की उपस्थिति में क्रमिक सुधार हुआ है, लेकिन सर्वोच्च पद अभी भी प्रतीक्षारत है। जस्टिस नागरत्ना अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण के लिए प्रसिद्ध हैं।
केंद्र सरकार के 2016 के विमुद्रीकरण (नोटबंदी) के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर जब संविधान पीठ ने फैसला सुनाया, तो उन्होंने बहुमत के रुख से अलग हटते हुए ऐतिहासिक असहमति का फैसला (Dissenting Verdict) दर्ज किया था। इसके अलावा उन्होंने मिनरल रॉयल्टी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) जैसे कई दूरगामी प्रभाव वाले मामलों पर भी अत्यंत महत्वपूर्ण न्यायिक व्यवस्थाएं दी हैं।
सीनियरिटी का नियम और 36 दिनों का संभावित ऐतिहासिक कार्यकाल
सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश पद पर नियुक्ति की सुस्थापित परंपरा वरिष्ठता क्रम (सीनियरिटी कन्वेंशन) पर आधारित है, जिसके तहत सबसे वरिष्ठ उपलब्ध न्यायाधीश को ही देश का अगला मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने की परिपाटी रही है। वर्तमान क्रम के अनुसार, जस्टिस सूर्यकांत के बाद जस्टिस विक्रम नाथ का क्रम आता है और उनके उपरांत जस्टिस बी.वी. नागरत्ना इस पद की स्वाभाविक दावेदार बनती हैं। न्यायिक गणना के अनुसार, जस्टिस नागरत्ना के सितंबर 2027 में मुख्य न्यायाधीश बनने की संभावना है।
30 अक्टूबर 1962 की जन्मतिथि के कारण वे 29 अक्टूबर 2027 को 65 वर्ष की आयु पूर्ण कर सेवानिवृत्त होंगी। इस प्रकार उनका मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्यकाल लगभग 36 दिनों का रहने का अनुमान है, जो छोटा होने के बावजूद भारतीय लोकतंत्र और महिला सशक्तिकरण की दृष्टि से मील का पत्थर साबित होगा।