वृंदा करात, पिनाराई विजयन और जॉन ब्रिटास समेत CPIM के 9 दिग्गज नेता डिटेन
देश की राजधानी नई दिल्ली के जंतर-मंतर क्षेत्र में आज राजनीतिक गहमागहमी उस वक्त अपने चरम पर पहुंच गई जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी CPIM के तमाम दिग्गज नेता और कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए। लोकतांत्रिक अधिकारों, नागरिक स्वतंत्रता और देश के मौजूदा राजनीतिक हालातों के खिलाफ विरोध मार्च निकाल रहे सीपीएम नेताओं को दिल्ली पुलिस ने बीच रास्ते में ही रोक लिया और भारी सुरक्षा बल के बीच हिरासत (डिटेन) में ले लिया। इस उच्च-प्रोफाइल कार्रवाई में पार्टी की वरिष्ठ नेता वृंदा करात, केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन और सांसद जॉन ब्रिटास सहित कुल 9 प्रमुख नेताओं को पुलिस ने अपनी हिरासत में ले लिया है। अचानक हुई इस कार्रवाई से मौके पर भारी अफरा-तफरी मच गई और पुलिस छावनी में तब्दील हुए इलाके में सरकार विरोधी नारों के बीच सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया।
जंतर-मंतर मार्च की पूर्व संध्या और पुलिस प्रशासन की भारी-भरकम तैयारियां
पिछले कई दिनों से दिल्ली में विभिन्न राजनीतिक दलों, नागरिक संगठनों और वामपंथी दलों द्वारा बड़े पैमाने पर प्रदर्शनों की रूपरेखा तैयार की जा रही थी। आज सुबह जैसे ही सीपीएम के नेतृत्व में जंतर-मंतर की तरफ मार्च शुरू होना था, उससे पहले ही दिल्ली पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने इलाके में चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम कर दिए थे। पुलिस का साफ निर्देश था कि कानून-व्यवस्था और यातायात को सुचारू बनाए रखने के लिए किसी भी बड़े अनधिकृत मार्च की अनुमति नहीं दी जाएगी। इसके बावजूद जब वामपंथी नेताओं ने पुलिस के बैरिकेड्स को पार कर आगे बढ़ने की कोशिश की, तो सुरक्षा बलों को त्वरित कदम उठाते हुए इन बड़े नेताओं को हिरासत में लेना पड़ा। इस कार्रवाई के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हल्की तीखी नोकझोक भी देखने को मिली, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।
वृंदा करात, पिनाराई विजयन और जॉन ब्रिटास की अगुवाई में हो रहा था प्रदर्शन
इस विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने वालों में देश के जाने-माने वामपंथी चेहरे शामिल थे। केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन, पार्टी की वरिष्ठ नेत्री वृंदा करात और संसद में अपनी मुखर आवाज के लिए पहचाने जाने वाले सांसद जॉन ब्रिटास के नेतृत्व में कार्यकर्ता केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे थे। हिरासत में लिए जाने के तुरंत बाद मीडिया से बात करते हुए इन नेताओं ने दो टूक शब्दों में कहा कि देश में तानाशाही रवैया अपनाया जा रहा है और जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचला जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने और मार्च निकालने के संवैधानिक अधिकार को भी पुलिस बल के दम पर छीना जा रहा है, जिसे देश का विपक्ष और वामपंथी दल कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे।
राजनीतिक गलियारों में मची खलबली और विपक्षी दलों की तीखी प्रतिक्रियाएं
CPIM के शीर्ष नेताओं और मुख्यमंत्रियों स्तर के नेताओं को इस तरह से हिरासत में लिए जाने की खबर जैसे ही देश भर में फैली, राजनीतिक हलकों में भूचाल आ गया। विपक्षी दलों के कई अन्य नेताओं ने भी इस कार्रवाई की कड़ी निंदा करते हुए इसे लोकतंत्र की गला घोंटने की कोशिश करार दिया है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि विरोध प्रदर्शन करना और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना हर भारतीय नागरिक और राजनीतिक दल का मौलिक अधिकार है, लेकिन प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग करके इस तरह की आवाजें दबाई जा रही हैं। दूसरी तरफ, सत्तारूढ़ दल और पुलिस प्रशासन का तर्क है कि बिना अनुमति के बड़े पैमाने पर भीड़ जुटाना और यातायात व्यवस्था को बाधित करना कानून के खिलाफ है, इसलिए कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह सख्त कदम उठाना अनिवार्य था।
देश में बढ़ते राजनीतिक टकराव और आगे के आंदोलनों की रूपरेखा
यह घटना इस बात का स्पष्ट संकेत देती है कि आने वाले दिनों में देश की राष्ट्रीय राजधानी और अन्य राज्यों में राजनीतिक सरगर्मी और अधिक तेज होने वाली है। एक तरफ जहां सरकार अपनी नीतियों और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर अडिग है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष और वामपंथी दल सड़कों पर उतरकर सरकार को घेरने की कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। जंतर-मंतर पर हुए इस हाई-वोल्टेज ड्रामे के बाद अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि हिरासत में लिए गए इन नेताओं को कब छोड़ा जाता है और आगे वाम दलों की क्या रणनीति रहती है। देश के राजनीतिक पटल पर यह टकराव इस बात को साबित करता है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के उपयोग और नागरिक अधिकारों को लेकर वैचारिक संघर्ष अपने सबसे तीव्र दौर से गुजर रहा है।