'कोई बेघर नहीं, बेवजह विवाद खड़ा करना बन गई है आदत', कश्मीरी पंडितों की मांगों पर बोले उमर अब्दुल्ला

'कोई बेघर नहीं, बेवजह विवाद खड़ा करना बन गई है आदत', कश्मीरी पंडितों की मांगों पर बोले उमर अब्दुल्ला

जम्मू-कश्मीर की राजनीति में इन दिनों कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास और उनकी सुरक्षा के मुद्दों को लेकर घमासान मचा हुआ है, जहां हाल ही में घाटी में लगातार मिल रही आतंकी धमकियों और टारगेट किलिंग के बाद विस्थापित कर्मचारियों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। इस पूरे संवेदनशील और गर्माते हुए राजनीतिक माहौल के बीच राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कश्मीरी पंडित कर्मचारियों की मांगों और उनके विरोध प्रदर्शनों पर एक बहुत ही तीखा और स्पष्ट बयान देकर नए विवाद को जन्म दे दिया है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कश्मीरी पंडितों की इस मांग को सिरे से खारिज करते हुए दो टूक शब्दों में कहा है कि घाटी में फिलहाल कोई भी कश्मीरी पंडित कर्मचारी बेघर नहीं है और हर किसी के लिए प्रशासन द्वारा उचित व्यवस्था की गई है, साथ ही उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ लोगों और संगठनों के लिए हर बात पर बेवजह का राजनीतिक विवाद खड़ा करना आदत बन चुकी है। मुख्यमंत्री के इस कड़े बयान के सामने आने के बाद से ही घाटी से लेकर जम्मू तक सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है और विपक्षी दलों के साथ-साथ खुद विस्थापित कश्मीरी पंडित समुदाय ने भी इसे उनकी समस्याओं के प्रति प्रशासनिक संवेदनहीनता करार देते हुए तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।

कश्मीरी पंडितों की नाराजगी और ट्रांजिट फ्लैट्स में तुरंत शिफ्ट होने की जिद

विस्थापित कश्मीरी पंडित समुदाय और विशेष रूप से प्रधानमंत्री पुनर्वास पैकेज (PM Package) के तहत घाटी में नौकरी कर रहे कर्मचारियों का गुस्सा इस बात को लेकर सबसे ज्यादा फूट रहा है कि उनके सुरक्षित आवास यानी ट्रांजिट फ्लैट्स का निर्माण कार्य लगभग पूरा होने के बावजूद उन्हें उन कॉलोनियों में शिफ्ट नहीं किया जा रहा है। कश्मीरी पंडित संगठनों का साफ कहना है कि किराए के मकानों या असुरक्षित कैंपों में रहने के कारण वे हर रोज आतंकियों के निशाने पर रहते हैं और उनकी जान पर लगातार खतरा मंडराता रहता है, जिसके चलते वे अब और अधिक इंतजार करने को तैयार नहीं हैं। कर्मचारियों ने प्रशासन को चेतावनी दी थी कि यदि उन्हें तुरंत तैयार फ्लैट्स में नहीं बसाया गया, तो वे भूख हड़ताल का रास्ता अपनाने के लिए मजबूर होंगे। इसी पृष्ठभूमि में जब मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से इन मांगों और चेतावनी के बारे में सवाल पूछा गया, तो उनका यह कड़ा रुख सामने आया कि सरकार पहले से ही सभी जरूरी सुरक्षा उपाय कर रही है और बेवजह के दबाव की राजनीति से प्रशासन काम नहीं करेगा, जिससे दोनों पक्षों के बीच तल्खी और अधिक बढ़ गई है।

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का तीखा पलटवार: 'विवाद पैदा करना कुछ लोगों का पुराना शगल'

पत्रकारों और मीडियाकर्मियों के सवालों का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने बहुत स्पष्ट लहजे में कहा कि उनकी सरकार कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा और उनके सम्मानजनक कल्याण के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर छोटी बात पर राजनीतिक तमाशा खड़ा कर दिया जाए। उन्होंने कहा कि घाटी में जितने भी सरकारी कर्मचारी हैं, उन्हें उनकी तैनाती के हिसाब से सुरक्षित आवास मुहैया कराए गए हैं और जो नए ट्रांजिट अवास बनकर तैयार हो रहे हैं, उन्हें भी नियमानुसार और पूरी सुरक्षा जांच के बाद ही चरणबद्ध तरीके से आवंटित किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने नाराजगी जताते हुए कहा कि कुछ लोग और निहित स्वार्थी तत्व बिना किसी ठोस आधार के यह माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं कि सरकार विस्थापितों के प्रति उदासीन है, जबकि हकीकत में ऐसा कुछ नहीं है और इस तरह के बयानों से केवल घाटी में अनावश्यक तनाव और भ्रम की स्थिति पैदा होती है जिसे अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

विस्थापित कर्मचारियों और राजनीतिक दलों का पलटवार, सरकार पर संवेदनहीनता का आरोप

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के इस बयान के तुरंत बाद कश्मीरी पंडित कर्मचारी संघ, लेह-जम्मू के विभिन्न विस्थापित संगठन और कई विपक्षी राजनीतिक दलों ने इसे अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और असंवेदनशील करार देते हुए जोरदार पलटवार किया है। नेताओं और प्रदर्शनकारी कर्मचारियों का कहना है कि जब कोई समुदाय अपनी जान बचाने और सुरक्षित आशियाने की मांग को लेकर सड़कों पर उतरता है, तो राज्य के मुखिया होने के नाते मुख्यमंत्री को उनकी बात को सहानुभूतिपूर्वक सुनना चाहिए था, न कि उन्हें राजनीतिक विवाद खड़ा करने वाला बताना चाहिए था। कश्मीरी पंडितों का यह दर्द है कि वे पिछले कई दशकों से अपने ही देश में शरणार्थी जैसी जिंदगी जी रहे हैं, और जब वे अपनी सुरक्षा की गुहार लगाते हैं तो उन्हें इस तरह के तानों का सामना करना पड़ता है। इस वाकयुद्ध के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास और उनकी सुरक्षा का यह मुद्दा आने वाले दिनों में जम्मू-कश्मीर की विधानसभा और सड़क से लेकर राजनीतिक गलियारों तक एक बहुत बड़ा और ज्वलनशील मुद्दा बना रहेगा।