कश्मीर घाटी से एक बार फिर सुलगती सुगबुगाहट और कश्मीरी पंडितों का फूटा गुस्सा

कश्मीर घाटी से एक बार फिर सुलगती सुगबुगाहट और कश्मीरी पंडितों का फूटा गुस्सा

जम्मू-कश्मीर की शांत होती वादियों में एक बार फिर तनाव और अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं, और इस बार मुद्दा कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास और उनकी सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। घाटी में लगातार मिल रही आतंकी धमकियों और टर्गेटेड हमलों के खौफ के साए के बीच प्रधानमंत्री पैकेज के तहत कार्यरत कश्मीरी पंडित कर्मचारियों का धैर्य अब पूरी तरह जवाब दे चुका है। पिछले कई वर्षों से अपनी जान हथेली पर रखकर घाटी में सेवाएं दे रहे इन विस्थापित कर्मचारियों ने प्रशासन के खिलाफ अब आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। कश्मीरी पंडितों ने सरकार और संबंधित अधिकारियों के सामने एक बहुत बड़ी और दो टूक मांग रख दी है कि वे सुरक्षित और पहले से बनकर तैयार पड़े ट्रांजिट फ्लैट्स (Transit Flats) में उन्हें तुरंत शिफ्ट करें। यदि प्रशासन ने इस गंभीर मामले पर जल्द से जल्द कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो इन कर्मचारियों ने सामूहिक रूप से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर जाने की चेतावनी दी है, जिससे घाटी का प्रशासनिक गलियारा पूरी तरह हिल गया है।

क्या है पूरा मामला और क्यों दहशत के साये में जीने को मजबूर हैं कश्मीरी पंडित कर्मचारी

कश्मीर घाटी के अलग-अलग जिलों में प्रधानमंत्री रोजगार पैकेज के तहत हजारों की संख्या में कश्मीरी पंडित और आरक्षित वर्ग के कर्मचारी सरकारी विभागों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। लेकिन साल 2016 के बाद से और विशेषकर पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से आतंकवादियों ने घाटी में अल्पसंख्यक कर्मचारियों और बाहरी लोगों को निशाना बनाकर चुन-चुनकर हत्याएं (Targeted Killings) की हैं, उसने इन परिवारों के मन में खौफ भर दिया है। आए दिन मिलने वाली धमकियों और सुरक्षा में सेंध की खबरों के कारण ये कर्मचारी असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। लंबे समय से यह मांग उठाई जा रही थी कि खुले और असुरक्षित किराए के मकानों में रहने वाले इन कर्मचारियों को सुरक्षित सरकारी परिसरों और ट्रांजिट कैंपों में शिफ्ट किया जाए, जहां सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हों। हालांकि सरकार द्वारा इन कर्मचारियों के लिए कई जगहों पर आधुनिक और सुरक्षित फ्लैटों का निर्माण कराया गया है, लेकिन कागजी कार्रवाई और प्रशासनिक सुस्ती के कारण वे अब तक इन तैयार फ्लैटों में पूरी तरह शिफ्ट नहीं हो पाए हैं, जो इस पूरे रोष की मुख्य वजह बन गया है।

सरकार द्वारा बनाए गए तैयार फ्लैट्स में देरी क्यों और कर्मचारियों का बढ़ता आक्रोश

प्रधानमंत्री पुनर्वास पैकेज के तहत कश्मीर के विभिन्न इलाकों में कश्मीरी पंडित कर्मचारियों के लिए सुरक्षित आवासीय परिसरों का निर्माण कार्य तेजी से पूरा किया गया है। कई जिलों में तो ब्लॉक के ब्लॉक बनकर पूरी तरह तैयार खड़े हैं और उनमें बिजली, पानी तथा अन्य बुनियादी सुविधाएं भी लगभग पूरी की जा चुकी हैं। इसके बावजूद कर्मचारियों को उन सुरक्षित परिसरों में आधिकारिक रूप से प्रवेश न मिलने के पीछे प्रशासनिक लालफीताशाही और सुरक्षा संबंधी कुछ अंतिम औपचारिकताएं बताई जा रही हैं। कर्मचारियों का कहना है कि जब उनके रहने के लिए फ्लैट्स बनकर तैयार हैं, तो फिर उन्हें रोजाना असुरक्षित माहौल में रहने के लिए क्यों मजबूर किया जा रहा है। कश्मीरी पंडित कर्मचारी संघ का साफ कहना है कि प्रशासन उनकी जिंदगी के साथ खिलवाड़ कर रहा है और यदि किसी भी कर्मचारी के साथ कोई अनहोनी होती है, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार की होगी। यही कारण है कि अब इन कर्मचारियों ने प्रशासन को अंतिम अल्टीमेटम देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि वे अब और इंतजार नहीं करेंगे।

भूख हड़ताल की चेतावनी और प्रशासन पर बढ़ता चौतरफा नैतिक दबाव

कश्मीरी पंडित कर्मचारियों द्वारा दी गई भूख हड़ताल की इस चेतावनी ने केंद्र और राज्य प्रशासन की नींद उड़ा दी है। घाटी में कानून-व्यवस्था बनाए रखने और वहां सामान्य स्थिति बहाल होने का दावा करने वाली सरकारों के लिए यह स्थिति बेहद असहज करने वाली है। कर्मचारियों ने घोषणा की है कि यदि तय समय सीमा के भीतर उन्हें सुरक्षित ट्रांजिट फ्लैट्स की चाबियां सौंपकर वहां शिफ्ट नहीं कराया गया, तो वे अपने दफ्तरों का बहिष्कार कर सड़कों पर उतर आएंगे और आमरण अनशन शुरू कर देंगे। राजनीतिक दलों और मानवाधिकार संगठनों ने भी इस मुद्दे पर सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। जानकारों का मानना है कि कश्मीरी पंडितों का यह संकट केवल एक आवासीय समस्या नहीं है, बल्कि यह घाटी में भारत सरकार की उस नीति की परीक्षा है जिसके तहत विस्थापितों की सुरक्षित घर वापसी का वादा किया गया था।

घाटी में स्थायी शांति और पुनर्वास के लिए सरकार के सामने खड़ी बड़ी चुनौतियां

कश्मीर घाटी में आतंकवाद की कमर तोड़ने के तमाम दावों के बावजूद कश्मीरी पंडितों का सुरक्षित महसूस न करना इस बात का प्रमाण है कि अभी भी जमीन पर बहुत कुछ किया जाना बाकी है। जब तक अल्पसंख्यक समुदाय के लोग बिना किसी डर के खुलकर अपनी जिंदगी और नौकरी नहीं जी पाएंगे, तब तक सामान्य स्थिति का हर दावा अधूरा माना जाएगा। ट्रांजिट फ्लैट्स में शिफ्टिंग की यह मांग पूरी तरह से न्यायसंगत है, क्योंकि किसी भी इंसान के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर काम करना मुमकिन नहीं है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि स्थानीय प्रशासन और उपराज्यपाल का कार्यालय इस गंभीर चेतावनी के बाद कितनी जल्दी और सख्ती से कदम उठाते हैं ताकि इन विस्थापित कर्मचारियों को सुरक्षित आशियाना मिल सके और एक बड़ा संकट टल