'सेक्स स्लेव' जैसे गंभीर आरोप: क्या पति पर चलेगा केस? सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकीं निगाहें

'सेक्स स्लेव' जैसे गंभीर आरोप: क्या पति पर चलेगा केस? सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकीं निगाहें

भारतीय न्यायपालिका और वैवाहिक कानूनों के इतिहास में एक ऐसा मोड़ आ गया है, जिसने देश भर के विधि विशेषज्ञों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों की सांसें थाम रखी हैं। क्या एक पत्नी अपने ही पति पर बेहद गंभीर और अमानवीय शारीरिक प्रताड़ना, जबरन शारीरिक संबंध बनाने और उसे 'सेक्स स्लेव' (Sex Slave) की तरह ट्रीट करने जैसे संगीन आरोप लगा सकती है? क्या मैरिटल रेप (Marital Rape) को लेकर भारतीय कानून के दायरे में पति को आपराधिक मुकदमे से पूर्ण छूट मिलनी चाहिए या फिर आधुनिक दौर के कानूनों के तहत उसे कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए? इन तमाम संवेदनशील और जटिल सवालों के केंद्र में देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) की वह बड़ी पीठ है, जिसके आगामी और ऐतिहासिक फैसले पर इस वक्त पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं। यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति या एक परिवार का नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक और कानूनी ढांचे को चुनौती देता है जो सदियों से विवाह संस्था के भीतर पतियों को असीमित विशेषाधिकार देता आया है।

क्या है पूरा मामला और किस हद तक पहुंच चुके हैं गंभीर आरोप

इस कानूनी लड़ाई की शुरुआत तब हुई जब देश की एक अदालत में एक पीड़ित पत्नी ने अपने पति के खिलाफ क्रूरता, मानसिक व शारीरिक शोषण और जबरन अस्वाभाविक यौन संबंध बनाने के आरोप लगाते हुए क्रिमिनल केस दर्ज कराने की मांग की। पीड़िता का आरोप है कि उसके पति ने न केवल उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया, बल्कि घर के भीतर उसके साथ ऐसा बर्ताव किया जो किसी 'सेक्स स्लेव' या गुलाम से बदतर था। हालांकि, निचली अदालतों से लेकर उच्च न्यायालयों तक इस मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 375 (बलात्कार) के उस अपवाद का हवाला दिया गया, जिसके तहत यदि पत्नी की उम्र 18 वर्ष से अधिक है, तो पति द्वारा उसकी मर्जी के खिलाफ बनाए गए शारीरिक संबंध को कानूनी रूप से बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इस पुराने कानूनी प्रावधान को चुनौती देते हुए पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है, जहां अब यह बहस छिड़ गई है कि क्या विवाह का बंधन किसी को भी अपनी जीवनसंगिनी की गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता को कुचलने का लाइसेंस देता है।

भारतीय दंड संहिता का मैरिटल रेप एक्सेप्शन और संविधान के समानता के अधिकारों का टकराव

इस पूरे मामले का सबसे बड़ा कानूनी पेंच उस अपवाद में छिपा है जिसे औपनिवेशिक काल के अंग्रेजी कानूनों से भारत में विरासत के रूप में अपनाया गया था। इस प्रावधान के अनुसार, जब तक पत्नी नाबालिग नहीं है, तब तक पति द्वारा किए गए यौन उत्पीड़न को बलात्कार नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह माना जाता था कि विवाह के समय महिला ने अपनी सहमति स्थायी रूप से दे दी है। आधुनिक समाज सुधारक, महिला अधिकार संगठन और संविधान विशेषज्ञ इस प्रावधान को महिलाओं के मौलिक अधिकारों, जीने के अधिकार (Article 21) और समानता के अधिकार (Article 14) के पूरी तरह खिलाफ मानते हैं। उनका तर्क है कि संविधान हर नागरिक को शारीरिक अखंडता और सम्मान के साथ जीने की गारंटी देता है, ऐसे में वैवाहिक बंधन की आड़ में किसी महिला के साथ होने वाले अमानवीय अत्याचार को संरक्षण देना न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट की बेंच इस बात पर गहन विचार कर रही है कि क्या समय के साथ इन पुराने कानूनों में बदलाव करने की आवश्यकता है।

पतियों के अधिकारों की सुरक्षा और झूठे मामलों की आशंका पर कानूनी बहस के पहलू

इस संवेदनशील मामले के दूसरे पक्ष को देखें तो देश के कई पुरुष अधिकार संगठन और रूढ़वादी कानूनी विशेषज्ञ इस बात की वकालत कर रहे हैं कि यदि मैरिटल रेप को पूरी तरह अपराध घोषित कर दिया जाता है, तो इसके दुरुपयोग की संभावनाएं बहुत अधिक बढ़ जाएंगी। उनका तर्क है कि पारिवारिक विवादों, तलाक के मुकदमों और आपसी मनमुटाव के दौरान पतियों को ब्लैकमेल करने के लिए इस नए कानून का दुरुपयोग किया जा सकता है। अदालत में सुनवाई के दौरान यह भी दलील दी गई है कि इस तरह के मामलों में सबूत जुटाना बेहद मुश्किल होता है, जिससे वैवाहिक व्यवस्था का ताना-बाना और घरेलू शांति पूरी तरह से बिखर सकती है। न्यायपालिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह तय करने की है कि एक तरफ जहां महिलाओं के साथ होने वाले क्रूर शोषण और घरेलू हिंसा पर रोक लगानी जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ पारिवारिक संस्था की स्थिरता और कानूनी दुरुपयोग से बचाव के लिए एक संतुलित और सुरक्षित तंत्र का होना भी उतना ही आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट का आने वाला फैसला जो बदल देगा भारतीय समाज और पारिवारिक कानूनों की दिशा

यह मामला केवल एक कानूनी व्याख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय में भारतीय समाज और महिला सुरक्षा की दिशा तय करने वाला एक मील का पत्थर साबित होगा। यदि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में पति के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति देता है या मैरिटल रेप के अपवाद को असंवैधानिक करार देता है, तो यह भारतीय न्याय व्यवस्था में एक क्रांतिकारी बदलाव होगा। इससे देश की लाखों उन महिलाओं को कानूनी संबल मिलेगा जो चुपचाप घरेलू चारदीवारी के भीतर इस प्रकार की अमानवीय प्रताड़ना और 'सेक्स स्लेव' जैसी जिंदगी जीने को मजबूर हैं। दूसरी ओर, यदि अदालत इस मामले में वर्तमान कानूनी ढांचे को ही सुरक्षित रखती है, तो यह बहस और अधिक तेज हो जाएगी कि क्या संसद को इस पर नया कानून बनाने की पहल करनी चाहिए। फिलहाल, पूरे देश की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले पर टिकी हैं जो यह तय करेगा कि क्या वैवाहिक दायरे में भी कानून की पहुंच होनी चाहिए या नहीं।