पूरा 'वंदे मातरम' बजने पर गर्व से खड़ा रहा अब्दुल्ला परिवार, कांग्रेस के इस रुख से बिल्कुल जुदा है नेशनल कॉन्फ्रेंस का स्टैंड
भारतीय राजनीतिक गलियारों में राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' को लेकर हमेशा से ही अलग-अलग वैचारिक दृष्टिकोण और तीखी बहसें देखने को मिलती रही हैं, लेकिन हाल ही में श्रीनगर से एक ऐसा राजनीतिक और सांस्कृतिक घटनाक्रम सामने आया है जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। एक तरफ जहां देश की राजधानी दिल्ली और अन्य हिंदी पट्टी के राजनीतिक मंचों पर वंदे मातरम या राष्ट्रगान के सम्मान को लेकर अक्सर विवाद और असहजता की स्थिति पैदा हो जाती है, वहीं कश्मीर की राजनीति के केंद्रबिंदु माने जाने वाले अब्दुल्ला परिवार ने एक बिल्कुल अलग और सकारात्मक रुख पेश किया है। श्रीनगर में आयोजित एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक और राजनीतिक कार्यक्रम के दौरान जब पूरा 'वंदे मातरम' बजाया गया, तो नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के दिग्गज नेता और अब्दुल्ला परिवार के सदस्यों ने बिना किसी झिझक के अपनी सीटों से खड़े होकर इसका पूरा सम्मान किया। यह दृश्य कश्मीरी राजनीति के पारंपरिक दायरे से हटकर एक बहुत बड़ा संदेश देने वाला था, क्योंकि अक्सर यह माना जाता था कि क्षेत्रीय दल इस प्रकार के राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर असहज रहते हैं। इस घटना ने न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि राष्ट्रीय मीडिया में भी एक नई बहस को जन्म दे दिया है कि कैसे क्षेत्रीय दल अब राष्ट्रीय संस्कृति और प्रतीकों के प्रति अपनी सोच में बदलाव ला रहे हैं।
कांग्रेस के रुख से पूरी तरह जुदा है नेशनल कॉन्फ्रेंस का स्टैंड
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पहलू यह है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस का यह रुख उनके प्रमुख सहयोगी दल कांग्रेस की नीतियों और कार्यशैली से बिल्कुल अलग और जुदा नजर आता है। हाल के वर्षों में यह देखा गया है कि कांग्रेस पार्टी या उसके कई अन्य विपक्षी सहयोगी जब भी राष्ट्रीय प्रतीकों या ऐसे आयोजनों का सामना करते हैं, तो उनके भीतर एक रणनीतिक असमंजस या वैचारिक दूरी साफ दिखाई देती है। इसके विपरीत, नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेतृत्व ने यह साबित कर दिया है कि वे क्षेत्रीय जनाधार रखते हुए भी राष्ट्रीय अस्मिता और संवैधानिक परंपराओं का सम्मान करने में पीछे नहीं हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि अब्दुल्ला परिवार द्वारा उठाया गया यह कदम एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है, जिसके जरिए वे यह संदेश देना चाहते हैं कि उनकी पार्टी मुख्यधारा की भारतीय राजनीति के साथ पूरी तरह तालमेल बिठाकर चलना चाहती है। दिल्ली के राजनीतिक हलकों में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के लिए यह स्थिति थोड़ी असहज जरूर हो सकती है, क्योंकि जब उनके सहयोगी दल ही इस तरह से राष्ट्रीय मंचों पर अपनी अलग और सकारात्मक छाप छोड़ते हैं, तो उनकी अपनी वैचारिक अस्पष्टता खुलकर सामने आ जाती है।
कश्मीरी राजनीति में नए बदलाव के संकेत और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक इतिहास में यह वाकया एक मील का पत्थर साबित हो सकता है, क्योंकि पिछले कुछ दशकों में घाटी की राजनीति अलगाववाद, विरोध और वैचारिक टकराव के इर्द-गिर्द घूमती रही है। ऐसे माहौल में जब एक प्रमुख कश्मीरी परिवार और उनका दल खुले तौर पर राष्ट्रीय सम्मान के कार्यक्रमों में इस प्रकार की सहभागिता दिखाता है, तो यह वहां की आम जनता और युवाओं के लिए भी एक बड़ा वैचारिक संदेश होता है। भारत के बदलते राजनीतिक परिदृश्य में अब क्षेत्रीय दलों को भी यह समझ आ चुका है कि विकास, सुशासन और राष्ट्र-निर्माण के मुद्दों के साथ-साथ राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करना जनमानस को जोड़ने का सबसे प्रभावी जरिया है। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भले ही दिल्ली के सत्ता गलियारों में राजनीतिक दल एक-दूसरे पर छींटाकशी करने का कोई मौका न छोड़ते हों, लेकिन जब बात देश की मूल भावना और सम्मान की आती है, तो क्षेत्रीय स्तर पर कई बार ऐसे सकारात्मक कदम उठते हैं जो पारंपरिक राजनीतिक दीवारों को गिराने का काम करते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस घटना को किस रूप में लेते हैं और क्या इससे उनके अपने आंतरिक राजनीतिक समीकरणों पर कोई प्रभाव पड़ता है या नहीं।