36 साल बाद भी वैसा ही खौफ... कश्मीरी पंडितों को धमकी भरे लेटर; बाहरी मजदूर भी बने निशाना

36 साल बाद भी वैसा ही खौफ... कश्मीरी पंडितों को धमकी भरे लेटर; बाहरी मजदूर भी बने निशाना

भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास के सबसे काले और दर्दनाक अध्यायों में शुमार कश्मीरी पंडितों के पलायन के तीन दशक से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन उनके जेहन से उस खौफ की दास्तान आज भी पूरी तरह से धुंधली नहीं हुई है। नब्बे के दशक के शुरुआती दौर में जिस तरह से घाटी से इस समुदाय को चुन-चुनकर भगाया गया था, उसका सिहरन पैदा करने वाला मंजर आज भी लोगों की आंखों के सामने ताजा है। समय के साथ भले ही यह उम्मीद बंध रही थी कि कश्मीर की वादियों में हालात सामान्य हो रहे हैं और विस्थापित लोग अपने घरों की तरफ वापसी का सपना देख सकते हैं, लेकिन हाल ही में सामने आई एक सनसनीखेज घटना ने उस पुराने डर और आतंक को फिर से जिंदा कर दिया है। पिछले महज 17 दिनों के छोटे से अंतराल के भीतर कश्मीरी पंडित परिवारों को लक्षित करते हुए दो खौफनाक धमकी भरे पत्र (Letters) भेजे गए हैं। इन पत्रों के जरिए उन्हें एक बार फिर से घाटी छोड़ने की चेतावनी दी गई है, जिससे कश्मीरी पंडितों के साथ-साथ वहां रोजी-रोटी की तलाश में गए बाहरी मजदूरों के बीच भी भारी दहशत का माहौल पैदा हो गया है।

तीन दशक पुराना दर्द और कश्मीरी पंडितों के दिलों में एक बार फिर लौटा खौफ

जब नब्बे के दशक की शुरुआत में घाटी की मस्जिदों से लाउडस्पीकरों के जरिए कश्मीरी पंडितों को यह फरमान सुनाया गया था कि वे या तो कश्मीर छोड़ दें या मौत का सामना करें, तो उस तबाही ने इतिहास की दिशा बदल दी थी। हजारों परिवारों को अपनी पुश्तैनी जमीन, मंदिर, कारोबार और सब कुछ छोड़कर शरणार्थी शिविरों में जीवन बिताने के लिए मजबूर होना पड़ा था। सरकार और सुरक्षा बलों के कड़े प्रयासों के बाद पिछले कुछ वर्षों में कुछ कश्मीरी पंडित परिवारों ने प्रधानमंत्री पुनर्वास पैकेज के तहत घाटी में वापस आकर रहना शुरू किया था और सरकारी नौकरियों में अपनी सेवाएं दे रहे थे। लेकिन हाल ही में उनके घरों और दफ्तरों के बाहर जिस तरह से धमकियों से भरे खत चस्पा किए गए हैं, उसने उस जख्म को फिर से हरा कर दिया है। इन धमकी भरे पत्रों में साफ तौर पर यह चेतावनी दी गई है कि वे कश्मीर छोड़कर चले जाएं वरना उनके परिणाम बहुत बुरे होंगे। इस तरह की धमकियों ने एक बार फिर से उस समुदाय के भीतर यह डर पैदा कर दिया है कि क्या वे कभी अपने ही देश में सुरक्षित होकर नहीं रह सकते।

सिर्फ कश्मीरी पंडित ही नहीं, अब रोजी-रोटी कमाने आए बाहरी मजदूर भी बने निशाना

आतंकवादी संगठनों और उनके स्थानीय सहानुभूति रखने वाले स्लीपर सेल के निशाने पर इस बार केवल कश्मीरी पंडित ही नहीं हैं, बल्कि कश्मीर की आर्थिकी और निर्माण कार्यों में रीढ़ की हड्डी माने जाने वाले बाहरी मजदूर भी उनके क्रूर एजेंडे का शिकार बन रहे हैं। देश के अलग-अलग राज्यों जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और अन्य इलाकों से जो गरीब मजदूर अपने परिवार का पेट पालने के लिए कश्मीर में मजदूरी करने, ईंट-भट्ठों पर काम करने या छोटी-मोटी नौकरियां करने जाते हैं, उन्हें चुन-चुनकर डराया जा रहा है। हालिया धमकी भरे पत्रों में इन बाहरी श्रमिकों को भी घाटी खाली करने की चेतावनी दी गई है। आतंकवादी यह अच्छी तरह जानते हैं कि अगर बाहरी मजदूर और कश्मीरी पंडित घाटी में सुरक्षित महसूस करने लगेंगे, तो उनका प्रोपेगेंडा पूरी तरह फेल हो जाएगा। यही वजह है कि वे इस तरह की कायराना हरकतों के जरिए डर का एक ऐसा साम्राज्य स्थापित करना चाहते हैं, जिससे विकास के सभी कार्य बाधित हो जाएं और अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ जाए।

सुरक्षा एजेंसियों की कड़ी चौकसी और सरकार का सख्त एक्शन प्लान

महज 17 दिनों के अंदर दो बार धमकी भरे पत्र सामने आने के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय, स्थानीय पुलिस और खुफिया एजेंसियों (Intelligence Agencies) में हड़कंप मच गया है। सरकार ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लेते हुए कश्मीर घाटी में रह रहे सभी कश्मीरी पंडितों और बाहरी मजदूरों के ट्रांजिट कैंप्स तथा रिहायशी इलाकों की सुरक्षा व्यवस्था को कई गुना बढ़ा दिया है। अतिरिक्त सुरक्षा बलों को तैनात कर दिया गया है और चप्पे-चप्पे पर सीसीटीवी कैमरों तथा ड्रोन के जरिए निगरानी रखी जा रही है। पुलिस उन असामाजिक तत्वों और आतंकवादियों के ओवरग्राउंड वर्कर्स (OGWs) की शिनाख्त करने में जुटी है जिन्होंने इन धमकी भरे पत्रों को लिखकर माहौल बिगाड़ने का कुचक्र रचा है। उपराज्यपाल प्रशासन और सुरक्षा अधिकारियों ने स्पष्ट कर दिया है कि घाटी में अमन-चैन को बाधित करने वाले किसी भी शख्स को बख्शा नहीं जाएगा और हर एक नागरिक की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।

आधुनिक डिजिटल और एआई सर्च के दौर में आतंकवाद के इन कायराना प्रयासों के मायने

आज के इस आधुनिक डिजिटल और जेनेरेटिव एआई सर्च के दौर में सुरक्षा से जुड़ी ऐसी संवेदनशील और गंभीर खबरें कुछ ही पलों में दुनिया के कोने-कोने तक पहुँच जाती हैं। गूगल डिस्कवर और बिंग जैसे आधुनिक सर्च इंजन यूजर की जिज्ञासा, राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवीय मुद्दों से जुड़ी खबरों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं ताकि लोग सच्चाई से वाकिफ रह सकें। पाठकों के बीच यह जानना हमेशा से बहुत महत्वपूर्ण रहा है कि कैसे दशकों पुराना दर्द आज भी किसी न किसी रूप में लोगों के वर्तमान को प्रभावित कर रहा है। 36 साल बाद भी कश्मीरी पंडितों के मन में बैठे उसी पुराने खौफ का लौट आना और 17 दिनों में दो धमकी भरे पत्र मिलना इस बात का प्रमाण है कि घाटी में छिपे आतंकवाद के अवशेषों को पूरी तरह से नेस्तनाबूद करने के लिए अभी और भी कड़ी लड़ाइयां लड़नी बाकी हैं। देश की जनता और सुरक्षा बल पूरी एकजुटता के साथ इस आतंक का मुकाबला कर रहे हैं और यह उम्मीद की जा रही है कि बहुत जल्द इन कायराना धमकियों देने वालों को उनके अंजाम तक पहुंचा दिया जाएगा।