कश्मीर में मंडरा रहा ‘महाविनाश’ का खतरा! 5 ग्लेशियर झीलें हाई रिस्क पर
धरती के स्वर्ग कहे जाने वाले खूबसूरत और शांत कश्मीर घाटी के ऊपर इन दिनों प्रकृति का एक ऐसा भयानक और डरावना साया मंडरा रहा है, जिसके बारे में सोचकर ही रूह कांप जाती है। अपनी बर्फीली वादियों, कलकल करती नदियों और मनमोहक नजारों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर कश्मीर अब एक बहुत बड़े पर्यावरणीय संकट के मुहाने पर खड़ा है। वैज्ञानिकों और भू-विशेषज्ञों की हालिया रिपोर्टों ने भारत सरकार और स्थानीय प्रशासन की नींद उड़ा दी है, क्योंकि कश्मीर के पर्वतीय इलाकों में स्थित कई विशाल ग्लेशियर झीलें (Glacial Lakes) इस समय 'अतिसंवेदनशील और उच्च जोखिम' (High Risk) की श्रेणी में आ चुकी हैं। जलवायु में लगातार हो रहे तेजी से बदलाव, ग्लोबल वार्मिंग और तापमान में बेतहाशा वृद्धि के कारण ये झीलें लगातार बड़ी होती जा रही हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि यदि इन झीलों के पास कोई छोटा सा भी भूकम्प या टेक्टोनिक हलचल होती है, तो इन प्राकृतिक बांधों के टूटने से पानी का एक ऐसा भयानक सैलाब नीचे की बस्तियों पर टूटेगा जो पलभर में सब कुछ तहस-नहस कर देगा। यह महाविनाश किसी अदृश्य खतरे की तरह चुपचाप आगे बढ़ रहा है और समय रहते अगर पुख्ता कदम नहीं उठाए गए, तो यह इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक साबित हो सकता है।
क्या होती है ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की यह घातक आपदा?
आम लोगों के मन में यह सवाल आना लाजिमी है कि आखिर इन झीलों से इतना बड़ा खतरा क्यों पैदा हो रहा है और यह किस बला का नाम है। विज्ञान की भाषा में इसे जीएलओएफ (GLOF - Glacial Lake Outburst Flood) कहा जाता है। जब ऊंचे पहाड़ों पर जमे हुए ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं, तो उनके पीछे पानी इकट्ठा होने से प्राकृतिक झीलें बन जाती हैं। इन झीलों के चारों तरफ कोई पक्का कंक्रीट का बांध नहीं होता, बल्कि यह मलबे, बर्फ, चट्टानों और पत्थरों के कमजोर तटबंधों से बंधी होती हैं। जैसे-जैसे ग्लोबल वार्मिंग के कारण तापमान बढ़ता है, इन झीलों में पानी का दबाव दिन-प्रतिदिन खतरनाक स्तर तक बढ़ता चला जाता है। इसके अलावा, हिमालयी क्षेत्र में लगातार आ रहे छोटे-छोटे भूकंप और भूस्खलन इन कमजोर प्राकृतिक दीवारों को और अधिक अस्थिर बना देते हैं। जब दबाव हद से ज्यादा बढ़ जाता है या कोई झटका लगता है, तो ये तटबंध अचानक फट जाते हैं और करोड़ों लीटर पानी एक साथ पहाड़ से नीचे मैदानी इलाकों और घाटियों की तरफ ऐसे दौड़ता है जैसे कोई महादानव सब कुछ निगलने आ रहा हो।
कश्मीर की वे 5 हाई रिस्क झीलें जो कभी भी बन सकती हैं तबाही की वजह
वैज्ञानिकों और आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों द्वारा किए गए गहन उपग्रह (Satellite) सर्वेक्षणों के अनुसार, कश्मीर क्षेत्र में कुल पांच ऐसी मुख्य ग्लेशियर झीलें चिन्हित की गई हैं जो इस वक्त सबसे ज्यादा खतरनाक स्थिति में हैं। इन पांचों झीलों का जलस्तर और उनके आसपास के कमजोर भू-भाग लगातार विशेषज्ञों के रडार पर हैं। इन झीलों में पानी की मात्रा इतनी ज्यादा बढ़ चुकी है कि वे किसी भी वक्त ओवरफ्लो होकर फट सकती हैं। हैरानी की बात यह है कि ये सभी झीलें बेहद ऊंचाई पर और दुर्गम इलाकों में स्थित हैं, जहां इंसानों का पहुंचना और वहां किसी प्रकार का कंक्रीट का मजबूत ढांचा खड़ा करना बेहद कठिन काम है। यदि इनमें से किसी भी एक झील में जरा सी भी बड़ी हलचल हुई, तो उसके रास्ते में आने वाले तमाम गांव, पनबिजली परियोजनाएं, सड़कें और हजारों बेकसूर लोगों की जिंदगियां चंद मिनटों में काल के गाल में समा सकती हैं। इन पांचों हाई रिस्क झीलों की मौजूदगी ने घाटी के लोगों के दिलों में एक अनजाना खौफ पैदा कर दिया है, क्योंकि वे जानते हैं कि यह खतरा उनके सिर पर हर पल तलवार की तरह लटक रहा है।
एक छोटा सा भूकंप और घाटी में आ जाएगा इतिहास का सबसे बड़ा जल प्रलय
कश्मीर का यह पूरा इलाका भूकम्पीय दृष्टि से बहुत अधिक संवेदनशील (Seismic Zone) माना जाता है, जहां अक्सर धरती के भीतर प्लेटों की हलचल के कारण छोटे या मध्यम तीव्रता के भूकंप आते रहते हैं। सामान्य दिनों में रिक्टर स्केल पर आने वाले ये हल्के झटके हमें महसूस भी नहीं होते, लेकिन इन हाई रिस्क ग्लेशियर झीलों के संदर्भ में यही छोटे झटके किसी परमाणु बम से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि इन नाजुक झीलों के पास जरा सा भी कंपन हुआ, तो मलबे से बने उनके प्राकृतिक अवरोध तुरंत ढह जाएंगे। एक बार दीवार टूटने के बाद पानी का जो दबाव छूटेगा, वह अपने साथ बड़े-बड़े बोल्डर, चट्टानें और कीचड़ लेकर नीचे की ओर बढ़ेगा। रास्ते में आने वाले पुल, मकान, खेत और बुनियादी ढांचा इस सैलाब के आगे तिनके की तरह बह जाएंगे। इस संभावित महाविनाश का दायरा इतना व्यापक होगा कि न केवल आसपास के पर्वतीय इलाके बल्कि निचले इलाकों में बसे प्रमुख शहर भी इसकी चपेट में आ सकते हैं, जिससे अभूतपूर्व मानवीय और आर्थिक क्षति होगी।
समय रहते बचाव के उपाय और प्रशासन के सामने खड़ी बड़ी चुनौतियां
इस आसन्न महाविनाश के खतरे को भांपते हुए अब केंद्रीय और राज्य स्तर के आपदा प्रबंधन संस्थान पूरी तरह से सतर्क हो गए हैं। इन झीलों के पास अर्ली वार्निंग सिस्टम (Early Warning Systems) लगाने, पानी के स्तर को नियंत्रित करने के लिए कृत्रिम निकास चैनल बनाने और समय-समय पर सैटेलाइट के जरिए इनकी निगरानी करने के प्रोजेक्ट्स पर काम तेजी से चल रहा है। हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन बर्फीली ऊंचाइयों पर जाकर काम करना मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों के चलते बेहद दुष्कर है। स्थानीय प्रशासन अब उन बस्तियों और गांवों की पहचान कर रहा है जो इन संभावित बाढ़ के रास्तों में आते हैं, ताकि आपात स्थिति में लोगों को तुरंत सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सके। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में प्रकृति के इन छिपे हुए खतरों को नजरअंदाज करना अब संभव नहीं रहा है। कश्मीर की इन 5 हाई रिस्क झीलों पर मंडराता यह खतरा हमें यह चेतावनी देता है कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति अगर अब भी कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो प्रकृति का यह रोद्र रूप इंसान के बनाए तमाम विकास के दावों को बहाकर ले जाएगा।