भारत में 'अल्पसंख्यक' कौन? किरेन रिजिजू के पारसी वाले बयान पर भड़के ओवैसी, जानें क्या कहता है हमारा संविधान और क्या हैं आंकड़े
देश में अल्पसंख्यक (Minority) की परिभाषा और उनके अधिकारों को लेकर एक बार फिर सियासत का पारा चढ़ गया है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के बीच इस संवेदनशील मुद्दे पर बेहद तीखी बहस छिड़ गई है। विवाद की शुरुआत तब हुई जब केंद्रीय मंत्री रिजिजू ने भारत की विशाल मुस्लिम आबादी की तुलना देश के सबसे छोटे अल्पसंख्यक समुदाय 'पारसी' से कर दी। इस पर ओवैसी ने पलटवार करते हुए आरोप लगाया कि सरकार मुसलमानों को संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत मिले मौलिक अधिकारों से वंचित करने के लिए दुष्प्रचार का सहारा ले रही है।
किरेन रिजिजू का बड़ा बयान: 'मुस्लिम आबादी दुनिया का छठा सबसे बड़ा देश बन सकती है'
एक राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने देश की जनसांख्यिकी (Demographics) पर बात करते हुए एक दिलचस्प तर्क सामने रखा। उन्होंने कहा, "यदि हम भारत में मुस्लिम आबादी को एक अलग राष्ट्र के रूप में देखें, तो यह आबादी के लिहाज से दुनिया का छठा सबसे बड़ा देश हो सकता है। दूसरी ओर, देश का पारसी समुदाय है, जिसकी आबादी महज 52,000 के आसपास है, जो एक छोटे कस्बे या गांव जैसी है। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि हमारे देश की व्यवस्था में पारसियों और मुसलमानों दोनों को एक समान यानी अल्पसंख्यक का ही दर्जा प्राप्त है।"
केंद्रीय मंत्री ने फंड और सरकारी सहायता के वितरण पर भी खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने तर्क दिया कि देश में अल्पसंख्यक समुदायों को बहुसंख्यक हिंदू समुदाय की तुलना में सरकार से कहीं अधिक विशेष अधिकार, फंड और सहायता मिलती है। रिजिजू के शब्दों में, "हिंदुओं को जो कुछ भी सामान्य रूप से मिलता है, वह तो अल्पसंख्यकों को भी मिलता ही है। लेकिन जो विशेष लाभ अल्पसंख्यकों को मिलता है, वह बहुसंख्यक हिंदुओं को नहीं मिल पाता है।"
ओवैसी का गणितीय पलटवार: '79.8% बड़ा है या 14%?'
केंद्रीय मंत्री के इस बयान पर असदुद्दीन ओवैसी ने कड़ी आपत्ति जताई और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (ट्विटर) पर सीधे गणित का एक सरल सवाल दाग दिया। देश में हिंदुओं और मुसलमानों की कुल आबादी की तुलना करते हुए ओवैसी ने लिखा, "79.8% बड़ा है या 14%? नियम बहुत साफ है, यदि हिंदू देश में बहुसंख्यक समुदाय हैं, तो हर गैर-हिंदू समूह स्वाभाविक रूप से एक अल्पसंख्यक समुदाय ही कहलाएगा।" ओवैसी ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि मंत्री जानबूझकर ऐसा नैरेटिव सेट कर रहे हैं ताकि मुसलमानों को उनके संवैधानिक अधिकारों से दूर किया जा सके।
ओवैसी के इस वार पर किरेन रिजिजू ने भी तुरंत तंज कसा। उन्होंने ओवैसी को भारत में मुसलमानों का सबसे बड़ा स्वघोषित नेता बताते हुए कहा कि कांग्रेस अब पूरी तरह से 'मुस्लिम लीग' पार्टी में तब्दील हो चुकी है। रिजिजू ने आगे कहा कि भारत का इतिहास गवाह है कि यहां हर धर्म फला-फूला है, लेकिन अगर हम प्रतिशत के लिहाज से देखें तो आजादी के बाद से देश में केवल हिंदुओं और पारसियों की आबादी का प्रतिशत ही कम हुआ है।
संविधान में क्या है प्रावधान? चौंकाने वाला है यह कानूनी सच
इस पूरी बहस के बीच सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला कानूनी पहलू यह है कि भारत का संविधान अपने नागरिकों को 'अल्पसंख्यक' के तौर पर मौलिक संरक्षण तो प्रदान करता है, लेकिन वह पूरे संविधान में कहीं भी 'अल्पसंख्यक' शब्द को परिभाषित नहीं करता है।
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अनुच्छेद 29: यह अनुच्छेद देश के अल्पसंख्यकों के हितों, उनकी विशेष भाषा, लिपि और संस्कृति के संरक्षण की पूरी गारंटी देता है।
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अनुच्छेद 30: यह अनुच्छेद अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उनका सुचारू रूप से प्रशासन करने का एक बेहद मजबूत मौलिक अधिकार प्रदान करता है।
संविधान निर्माताओं ने बेहद समझदारी दिखाते हुए 'अल्पसंख्यक' को किसी निश्चित परिभाषा में बांधने का काम जानबूझकर कार्यपालिका (सरकार) पर छोड़ दिया था। कानूनी और वैधानिक रूप से देखा जाए तो 'राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992' के तहत केंद्र सरकार को यह शक्ति मिलती है कि वह किसी भी समुदाय को आधिकारिक तौर पर अल्पसंख्यक अधिसूचित (Notify) कर सके।
वर्तमान में भारत में राष्ट्रीय स्तर पर कुल छह धार्मिक समुदायों को अल्पसंख्यक के रूप में कानूनी मान्यता प्राप्त है, जिनमें शामिल हैं: मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी और जैन। केंद्र सरकार की इसी अधिसूचना के आधार पर इन समुदायों को अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय द्वारा चलाई जाने वाली विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं, विशेष छात्रवृत्तियों (Scholarships) और वक्फ संपत्तियों के संरक्षण का सीधा लाभ मिलता है।
राज्य-वार दर्जे की मांग और इन राज्यों में हिंदुओं की असली स्थिति
पिछले कुछ समय से देश के राजनीतिक और कानूनी गलियारों में यह मांग लगातार जोर पकड़ रही है कि अल्पसंख्यक का दर्जा राष्ट्रीय स्तर के बजाय 'राज्य-वार' (State-wise) आबादी के आधार पर तय होना चाहिए। कई कानूनविदों और दक्षिणपंथी विचारकों का तर्क है कि जम्मू-कश्मीर, पंजाब और पूर्वोत्तर के कई राज्यों में जहां मुस्लिम, सिख या ईसाई बहुसंख्यक हैं, वहां केंद्रीय स्तर पर उन्हें अल्पसंख्यक मानकर विशेष लाभ देना तर्कसंगत नहीं है। वहां के स्थानीय हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा मिलना चाहिए।
2011 की आधिकारिक जनगणना के आंकड़े भी इस बात की तस्दीक करते हैं कि देश के कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हिंदुओं की आबादी बेहद कम है और वे वहां असल में अल्पसंख्यक की स्थिति में हैं:
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लक्षद्वीप: 2.5%
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मिजोरम: 2.75%
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नागालैंड: 8.75%
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मेघालय: 11.53%
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जम्मू और कश्मीर: 28.44%
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अरुणाचल प्रदेश: 29%
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मणिपुर: 31.39%
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पंजाब: 38.40%
यही कारण है कि देश में अल्पसंख्यक की परिभाषा को लेकर छिड़ी यह बहस महज एक राजनीतिक बयानबाजी नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरा संवैधानिक, जनसांख्यिकीय और कानूनी विवाद छिपा हुआ है जो आने वाले समय में देश की राजनीति को एक नया मोड़ दे सकता है।