पैतृक संपत्ति में हिंदू महिलाओं की तरह हक क्यों नहीं? सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

पैतृक संपत्ति में हिंदू महिलाओं की तरह हक क्यों नहीं? सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में मानवाधिकारों, लैंगिक समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के दायरे में एक बार फिर से एक बेहद संवेदनशील और क्रांतिकारी बहस छिड़ गई है। देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में पैतृक और पारिवारिक संपत्ति में मुस्लिम महिलाओं को भी हिंदू महिलाओं की तर्ज पर समान अधिकार और उत्तराधिकार मिलने को लेकर एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई है। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अगुवाई वाली बेंच ने बेहद गंभीर और विचारणीय टिप्पणी की है। अदालत ने पूछा है कि आखिर संवैधानिक समानता के दौर में भी धर्म के आधार पर महिलाओं के संपत्ति अधिकारों में इस तरह का भेदभाव क्यों होना चाहिए। इस ऐतिहासिक कानूनी कदम के बाद देश भर के कानूनी गलियारों, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और सामाजिक संगठनों के बीच हलचल तेज हो गई है। आइए इस महत्वपूर्ण कानूनी लड़ाई, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों और लैंगिक न्याय की इस बड़ी मांग की पूरी गहराई से समीक्षा करते हैं।

मुस्लिम महिलाओं को पैतृक संपत्ति में समान हक दिलाने वाली इस PIL के मुख्य बिंदु

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 देश के हर नागरिक को कानून के समक्ष समानता का अधिकार देता है, और अनुच्छेद 15 धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। इसके बावजूद, देश में अलग-अलग धर्मों के पर्सनल लॉ होने के कारण संपत्ति के उत्तराधिकार के मामले में महिलाओं के अधिकार अलग-अलग तय होते हैं। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (Hindu Succession Act) में साल 2005 में ऐतिहासिक संशोधन करके बेटियों को बेटों के बराबर पैतृक संपत्ति में जन्मजात सहदायिक (Coparcener) का अधिकार दिया गया था। इसके विपरीत, शरिया या मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत महिलाओं को मिलने वाला संपत्ति का हिस्सा पुरुषों की तुलना में आधा तय किया गया है। इसी लैंगिक असमानता और भेदभाव को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में यह जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें मांग की गई है कि मुस्लिम महिलाओं को भी उनके हिंदू भाई-बहनों की तरह पैतृक संपत्ति में पूरी तरह से समान कानूनी अधिकार मिलने चाहिए।

CJI की बेंच की सख्त टिप्पणी और अदालत का दूरगामी रुख

जब यह जनहित याचिका मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली बेंच के समक्ष सुनवाई के लिए आई, तो अदालत ने इस मामले की गंभीरता को तुरंत भांप लिया। बेंच ने सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से यह रेखांकित किया कि आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में लैंगिक न्याय (Gender Justice) सर्वोच्च प्राथमिकता होना चाहिए और किसी भी महिला को केवल उसके धर्म या व्यक्तिगत कानून की वजह से उसके बुनियादी आर्थिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने इस मामले को केवल एक धार्मिक विवाद के रूप में देखने के बजाय संवैधानिक नैतिकता और मौलिक अधिकारों के चश्मे से देखने की बात कही। सीजेआई की इस सख्त और संवेदनशील टिप्पणी ने देश भर की उन लाखों मुस्लिम महिलाओं में एक नई उम्मीद जगा दी है जो लंबे समय से पितृसत्तात्मक नियमों और पर्सनल लॉ की सीमाओं के कारण पैतृक संपत्ति में अपने कानूनी हक से महरूम चली आ रही थीं।

केंद्र सरकार और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर मांगा गया जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने इस जनहित याचिका की संवेदनशीलता और कानूनी जटिलता को देखते हुए केंद्र सरकार, विधि आयोग (Law Commission) और अन्य प्रमुख पक्षों को औपचारिक रूप से नोटिस जारी कर दिया है। अदालत ने इन सभी संस्थानों से यह अपेक्षा की है कि वे इस मामले में अपना विस्तृत जवाब दाखिल करें कि क्या देश में सभी धर्मों की महिलाओं के लिए संपत्ति के उत्तराधिकार को लेकर एक समान कानूनी ढांचा होना चाहिए या नहीं। इस कानूनी प्रक्रिया के शुरू होने से अब संसद से लेकर सड़क तक इस बात पर बहस छिड़ गई है कि क्या भारत में 'समान नागरिक संहिता' (Uniform Civil Code) की दिशा में यह एक और बड़ा और निर्णायक कदम साबित हो सकता है। सरकार के रुख पर अब पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं कि वह अदालत में इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या हलफनामा पेश करती है।

लैंगिक समानता और न्याय की दिशा में एक नया मील का पत्थर

यह मामला केवल कानूनी पन्नों या अदालती बहसों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध भारत की आधी आबादी यानी महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण और आत्मसम्मान से जुड़ा हुआ है। जब तक महिलाओं को पैतृक और पारिवारिक संपत्ति में समान आर्थिक अधिकार नहीं मिलेंगे, तब तक वे सामाजिक और पारिवारिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं बन पाएंगी। सुप्रीम कोर्ट में चल रही यह सुनवाई आने वाले समय में भारतीय न्यायशास्त्र और परिवार कानूनों की दिशा को हमेशा के लिए बदलने की ताकत रखती है। चाहे किसी भी धर्म या समुदाय की महिला हो, न्याय का तराजू हर नागरिक के लिए एक समान होना चाहिए। इस ऐतिहासिक जनहित याचिका के जरिए यह उम्मीद बंधती है कि आने वाले दिनों में भारत की हर बेटी को उसकी पैतृक संपत्ति में बिना किसी भेदभाव के पूरा और बराबर का अधिकार मिल सकेगा, जो सच्चे अर्थों में संविधान की प्रस्तावना को चरितार्थ करेगा।