मुस्लिम देश किर्गिस्तान में महिलाओं की आजादी ने कट्टरपंथी सोच पर खड़े किए बड़े सवाल

मुस्लिम देश किर्गिस्तान में महिलाओं की आजादी ने कट्टरपंथी सोच पर खड़े किए बड़े सवाल

जब कभी किसी समाज में सदियों से चली आ रही दबे-कुचले रहने की परंपराएं टूटने लगती हैं, तो सबसे पहले उन लोगों की नींद उड़ती है जो पितृसत्तात्मक सोच और कट्टरता के बल पर अपनी हुकूमत चलाना चाहते हैं। मध्य एशिया के खूबसूरत और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण मुस्लिम बहुल देश किर्गिस्तान में इन दिनों कुछ ऐसा ही भूचाल आया हुआ है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इस देश में महिलाओं की बढ़ती आजादी, शिक्षा, राजनीति और हर क्षेत्र में उनकी सक्रिय भागीदारी ने उस रूढ़िवादी और कट्टरपंथी सोच को बुरी तरह हिलाकर रख दिया है जो महिलाओं को चार दीवारों के भीतर कैद रखना चाहती थी। किर्गिस्तान की महिलाएं अब हर मोर्चे पर आगे बढ़ रही हैं, और उनके इस सशक्तिकरण को देखकर कट्टरपंथियों के मन में यह डर बैठ गया है कि अगर महिलाएं इसी तरह मंच पर आती रहीं, तो उनकी पुरानी और दबे-कुचले समाज वाली व्यवस्था का तख्तापलट होना तय है। इस सामाजिक बदलाव ने एक बहुत बड़ी बहस को जन्म दे दिया है कि क्या आधुनिकता और पारंपरिक इस्लाम के बीच का यह संघर्ष आने वाले समय में देश की राजनीति और संस्कृति की दिशा तय करेगा।

किर्गिस्तान में महिलाओं की आजादी का बढ़ता दायरा और आधुनिकता की बयार

सोवियत संघ के प्रभाव से निकले किर्गिस्तान में यूं तो लंबे समय से धर्मनिरपेक्षता की संस्कृति रही है, लेकिन ग्रामीण इलाकों और अंदरूनी हिस्सों में आज भी रूढ़िवादी परंपराओं का गहरा प्रभाव देखने को मिलता है। इसके बावजूद, पिछले कुछ वर्षों में किर्गिस्तानी महिलाओं ने जिस तेजी के साथ हर क्षेत्र में अपनी पैठ बनाई है, उसने सबको चौंका दिया है। आज किर्गिस्तान की महिलाएं न केवल बड़े कॉर्पोरेट सेक्टर और स्टार्टअप्स में लीडरशिप भूमिका निभा रही हैं, बल्कि देश की संसद, न्यायपालिका और सरकारी प्रशासनिक पदों पर भी उनका दबदबा तेजी से बढ़ रहा है। वे अपनी आवाज मुखर होकर उठा रही हैं, घरेलू हिंसा और बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ खुलकर विरोध दर्ज करा रही हैं और सामाजिक बदलाव की अगुवाई कर रही हैं। महिलाओं का यह बढ़ता हुआ आत्मबल और स्वतंत्रता उन पारंपरिक और कट्टर सोच वाले लोगों के गले नहीं उतर रही है जो महिलाओं को केवल घर संभालने तक सीमित देखना चाहते हैं। यही वजह है कि जैसे-जैसे महिलाएं मुख्यधारा के मंच पर आ रही हैं, वैसे-वैसे वहां का सामाजिक और राजनीतिक पारा गरमाता जा रहा है।

कट्टरपंथियों के माथे पर चिंता की शिकन और 'तबाही' का डर

महिलाओं के इस तरह तेजी से आगे बढ़ने से देश के धार्मिक और कट्टरपंथी संगठनों में भारी बेचैनी और हड़कंप मचा हुआ है। इन रूढ़िवादी ताकतों का मानना है कि महिलाओं का इस हद तक आजाद होना और सार्वजनिक जीवन में मुखर होना उनकी पारंपरिक संस्कृति और धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ है। वे दबी जुबान से और कई बार खुले मंचों से यह प्रचारित करने की कोशिश करते हैं कि यदि महिलाओं को इस तरह खुली छूट दी गई और वे नीति-निर्माता की भूमिका में आईं, तो समाज की मूल व्यवस्था में 'तबाही' मच जाएगी। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि यह तथाकथित 'तबाही' असल में उन पुरुषवादी मानसिकता वाले लोगों के डर का प्रतीक है जो अपनी सत्ता और नियंत्रण खोने से डरते हैं। जब एक महिला शिक्षित होकर अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो जाती है, तो वह किसी भी अन्याय के आगे झुकने से इनकार कर देती है। किर्गिस्तान में यही बदलाव हो रहा है, जहां महिलाएं अब उत्पीड़न या दोयम दर्जे के जीवन को स्वीकार करने के बजाय अपने दम पर अपनी तकदीर लिख रही हैं, जिससे कट्टरपंथियों का पुराना किला दरक रहा है।

कानून और समाज के बीच खींचतान तथा घरेलू हिंसा के खिलाफ संघर्ष

किर्गिस्तान में महिलाओं की इस आजादी की राह इतनी आसान भी नहीं है। एक तरफ जहां आधुनिक सोच वाली युवा पीढ़ी और महिलाएं आगे बढ़ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ समाज के एक हिस्से में आज भी पुरानी दबी हुई कुप्रथाएं जीवित हैं। देश में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों, जैसे कि अपहरण करके जबरन शादी करने की कुप्रथा (Ala Kachuu) के खिलाफ महिलाओं ने जो आंदोलन छेड़ा है, उसने सरकार को भी कड़े कदम उठाने पर मजबूर कर दिया है। जब महिलाओं ने इन अमानवीय प्रथाओं के खिलाफ सड़कों पर उतरकर आवाज उठाई, तो कट्टरपंथी ताकतों ने इसे पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव बताकर बदनाम करने की कोशिश की। लेकिन इसके बावजूद महिलाओं का हौसला कम नहीं हुआ है। वे अपने कानूनी अधिकारों के लिए एकजुट होकर लड़ रही हैं और यह साबित कर रही हैं कि आधुनिक किर्गिस्तान में महिलाओं की आवाज को अब दबाया नहीं जा सकता। समाज के इस दोराहे पर खड़े होकर किर्गिस्तान की महिलाएं एक ऐसा इतिहास लिख रही हैं जो आसपास के अन्य रूढ़िवादी देशों के लिए भी एक मिसाल बनता जा रहा है।

भविष्य के संकेत और वैश्विक पटल पर पड़ने वाले इसके दूरगामी प्रभाव

किर्गिस्तान में चल रहा यह सामाजिक और वैचारिक संघर्ष सिर्फ एक देश की सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके संदेश दूर-दूर तक जा रहे हैं। यह घटना इस बात को साबित करती है कि शिक्षा और जागरूकता किसी भी समाज की रूढ़िवादी दीवारों को गिराने की सबसे बड़ी ताकत होती है। जब महिलाएं मंच पर आती हैं और नेतृत्व संभालती हैं, तो वे सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि पूरे समाज के विकास का मार्ग प्रशस्त करती हैं। किर्गिस्तान के हुक्मरानों और समाज को अब यह तय करना होगा कि वे मध्ययुगीन कट्टरता के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं या फिर महिलाओं की शक्ति को साथ लेकर एक प्रगतिशील और आधुनिक राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं। कट्टरपंथियों की लाख कोशिशों के बावजूद यह साफ नजर आ रहा है कि बदलाव की यह आंधी अब रुकने वाली नहीं है, और किर्गिस्तान की महिलाएं अपने हक, सम्मान और समानता के साथ जीने के अधिकार को हासिल करके ही दम लेंगी।