बप्पा के मखर की सजावट में भूलकर भी न लगाएं प्लास्टिक! ये 4 देसी आइडिया हैं सबसे खास

बप्पा के मखर की सजावट में भूलकर भी न लगाएं प्लास्टिक! ये 4 देसी आइडिया हैं सबसे खास

14 सितंबर तक देश भर के घरों में गणेश चतुर्थी के महापर्व की तैयारियां अपने चरम पर होंगी। अधिकांश भक्तों ने अपने घर लाए जाने वाले बप्पा की खास मूर्ति भी चुन ली होगी। इस पावन अवसर पर हर किसी के मन में एक ही सवाल रहता है कि भगवान गणेश के बैठने के स्थान यानी 'मखर' (पूजा मंडप) को किस तरह दिव्य, सुंदर और विशिष्ट रूप दिया जाए।

बदलते दौर में पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए 'ज़ीरो प्लास्टिक वेस्ट' आधारित प्राकृतिक सजावट न केवल प्रकृति की रक्षा करती है, बल्कि पूजा स्थल की आध्यात्मिक आभा और घर की सुंदरता को भी कई गुना निखार देती है।

1. ताज़े गेंदे के फूलों से सजेगा आकर्षक 'फ़्लोरल मंडला'

डेढ़ से पांच दिनों तक गणपति बप्पा की स्थापना करने वाले परिवारों के लिए ताजे फूलों का बैकड्रॉप सबसे बेहतरीन और जीवंत विकल्प है। नारंगी और पीले गेंदे के फूलों से तैयार किया गया गोल 'फ़्लोरल मंडला' पूजा मंडप के पीछे मुख्य आकर्षण का केंद्र बन सकता है।

इसे तैयार करने के लिए किसी पुराने कार्डबोर्ड को गोल काटकर उस पर गेंदे के फूलों की पंखुड़ियों और कलियों को एक लय में चिपकाया जा सकता है। यह प्राकृतिक व्यवस्था तस्वीरों में बेहद मनमोहक दिखती है और फूलों की भीनी-भीनी खुशबू से पूरा घर सकारात्मक ऊर्जा, शांति और सुगंध से भर जाता है। गेंदे के फूल बिना मुरझाए चार से पांच दिनों तक पूरी तरह तरोताज़ा रहते हैं।

2. केले के पत्तों का तोरण और खजूर की पत्तियों की पारंपरिक बुनाई

मंडप सजावट में थर्मोकोल या प्लास्टिक शीट के इस्तेमाल से बचने के लिए प्राकृतिक पत्तियों का उपयोग एक उत्कृष्ट विकल्प है। बप्पा के आसन के चारों ओर और प्रवेश द्वार पर केले के ताजे पत्तों से बना तोरण पारंपरिक दक्षिण और पश्चिमी भारतीय स्थापत्य कला का सुंदर अहसास कराता है। इसके अलावा, हरे या सूखे खजूर के पत्तों को आपस में विभिन्न ज्यामितीय (जियोमेट्रिक) पैटर्न्स में बुनकर एक सुंदर और टिकाऊ बैकड्रॉप वॉल तैयार की जा सकती है। यह डिज़ाइन 'मखर' को एक भव्य, गरिमामयी और विशुद्ध पारंपरिक रूप प्रदान करता है।

3. गेरू के बेस पर चावल के आटे की सोंधी 'अल्पना' और पीतल की घंटियां

रासायनिक रंगों के इस्तेमाल से हटकर लाल गेरू मिट्टी और चावल के आटे का पारंपरिक मेल पूजा स्थल को अद्भुत पवित्रता देता है। पूजा की चौकी ('पाटा') के इर्द-गिर्द अथवा ज़मीन पर गेरू का हल्का लेप लगाकर उस पर गीले या सूखे चावल के घोल/आटे से 'अल्पना' या 'कोलम' बनाना भारतीय संस्कृति की प्राचीन पहचान है।

महाराष्ट्र की पारंपरिक 'वारली' कलाकृतियां भी इस लाल पृष्ठभूमि पर अत्यंत आकर्षक लगती हैं। इस पारंपरिक सजावट को अंतिम रूप देने के लिए मखर की मेहराब या छत से विभिन्न आकारों की पीतल की छोटी-बड़ी घंटियां लटकाएं, जो मंडप को भव्य मंदिर जैसा रूप देती हैं।

4. आम की टहनियां, कच्ची हल्दी और नारियल का दिव्य प्राकृतिक तोरण

पूजा सामग्री में प्रयुक्त होने वाली मांगलिक वस्तुओं से घर पर ही एक अनोखा और इको-फ्रेंडली तोरण तैयार किया जा सकता है। ताजे आम के पत्तों, कच्ची हल्दी की गांठों, सुपारी और छोटे सूखे नारियलों को एक सूती धागे में पिरोकर मखर के चारों कोनों पर सजाया जा सकता है। विशेष रूप से कोंकण क्षेत्र में गणेश जी के आसन के ऊपरी भाग को इसी प्रकार के प्राकृतिक तत्वों से सुसज्जित करने की पुरानी परंपरा है। ये सभी सामग्रियां 100% बायोडिग्रेडेबल हैं, जो त्योहार के समापन पर आसानी से मिट्टी में विलीन हो जाती हैं और किसी भी प्रकार का प्रदूषण नहीं फैलाती हैं।

प्राकृतिक तत्वों की सादगी और पर्यावरण के प्रति निष्ठा

मिट्टी, काष्ठ, ताज़े पत्ते, फूल और पीतल के बर्तनों से की जाने वाली सजावट में जो आत्मीयता और दिव्यता होती है, उसकी तुलना बाज़ार में मिलने वाले प्लास्टिक या कृत्रिम सामान से कभी नहीं की जा सकती। इस गणेशोत्सव पर प्रकृति-अनुकूल और अर्थपूर्ण थीम अपनाकर विघ्नहर्ता का स्वागत करें, जो आस्था के साथ-साथ प्रकृति के प्रति हमारे कृतज्ञ भाव को भी प्रदर्शित करेगा।