जितिया व्रत 2026 नहाय-खाय से शुरू: जानिए नहाय-खाय से लेकर पारण तक का सही समय
सनातन धर्म, संस्कृति और विशेष रूप से उत्तर भारत के लोकपर्वों में 'जितिया व्रत' यानी जीवित्पुत्रिका व्रत का स्थान बहुत ही पवित्र और सर्वोच्च माना गया है। माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य, सुरक्षा और उज्जवल भविष्य के लिए इस कठिन और निर्जला व्रत को पूरी निष्ठा के साथ रखती हैं। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाने वाला यह व्रत तीन दिनों तक अत्यंत कड़े नियमों के साथ मनाया जाता है, जिसकी शुरुआत 'नहाय-खाय' के साथ होती है। पंचांग और ग्रह-नक्षत्रों की गणना के अनुसार इस वर्ष जितिया व्रत 2026 की शुरुआत कल से होने जा रही है, जिसे लेकर माताओं के मन में जबरदस्त उत्साह और तैयारियां देखने को मिल रही हैं। आधुनिकता की इस दौड़ के बीच हमारी यह प्राचीन लोकसंस्कृति आज भी परिवार के प्रति प्रेम और समर्पण की सबसे बड़ी मिसाल पेश करती है। आइए बेहद गहराई, विस्तार और रिपोर्टर की संवादात्मक शैली में जितिया व्रत के इस महापर्व के नहाय-खाय, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और संपूर्ण महत्व का पूरा विश्लेषण करते हैं।
क्या है जितिया व्रत का पूरा शेड्यूल, नहाय-खाय से लेकर पारण तक का सही समय और तिथियों का गणित
जितिया या जीवित्पुत्रिका का यह तीन दिवसीय महापर्व मुख्य रूप से तीन महत्वपूर्ण चरणों में बंटा होता है, जिसमें पहला दिन नहाय-खाय, दूसरा दिन निर्जला उपवास और तीसरा दिन पारण का होता है। इस वर्ष नहाय-खाय के साथ शुरू होने वाले इस व्रत के दौरान महिलाएं स्नान करने के बाद पूरी शुद्धता के साथ भोजन ग्रहण करती हैं और अगले दिन से बिना जल के निर्जला व्रत की शुरुआत करती हैं। पंचांग के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को नहाय-खाय होता है, जिसके अगले दिन अष्टमी तिथि को महिलाएं पूरे दिन और पूरी रात बिना पानी के रहकर अपनी संतानों के लिए प्रार्थना करती हैं। इसके पश्चात नवमी तिथि के दिन सूर्योदय के बाद और नियमों का पालन करते हुए व्रत का पारण किया जाता है। इस दौरान समय का विशेष ध्यान रखना पड़ता है क्योंकि शास्त्रों में यह बताया गया है कि हर एक चरण को सही मुहूर्त पर ही पूरा किया जाना चाहिए ताकि व्रत का पूरा पुण्य फल प्राप्त हो सके।
नहाय-खाय के दिन क्या खाया जाता है और इस दौरान किन कड़े नियमों का पालन करना होता है अनिवार्य
जितिया व्रत के पहले दिन यानी नहाय-खाय के अवसर पर घर की साफ-सफाई करने के बाद महिलाएं नदी या पवित्र कुंड में स्नान करती हैं। इसके बाद भगवान सूर्य और भगवान जीमूतवाहन की पूजा करने के बाद ही भोजन ग्रहण किया जाता है। नहाय-खाय के दिन भोजन में मुख्य रूप से मड़ुआ (रागी) की रोटी, नोनी का साग और कूटू या अन्य सात्विक चीजें बनाई जाती हैं, जिन्हें बहुत ही पवित्रता के साथ ग्रहण किया जाता है। इस दिन भोजन में लहसुन और प्याज का प्रयोग पूरी तरह वर्जित होता है, और भोजन केवल एक बार ही सूर्योदय के समय या दिन में ही किया जाता है। इसके अगले दिन से शुरू होने वाले निर्जला उपवास के लिए शरीर को ऊर्जावान बनाए रखने के साथ-साथ मानसिक रूप से भी पूरी तरह तैयार होना पड़ता है, क्योंकि इस व्रत में एक बूंद जल भी ग्रहण करने का प्रावधान नहीं होता है।
जितिया व्रत की संपूर्ण पूजा विधि और भगवान जीमूतवाहन की कथा का धार्मिक महत्व
अष्टमी तिथि के दिन मुख्य जितिया व्रत रखा जाता है, जिसमें महिलाएं प्रदोष काल के समय भगवान जीमूतवाहन की पूजा करती हैं। पूजा स्थल पर गाय के गोबर से लीपा करके एक छोटा सा तालाब या पोखर जैसा प्रतीक बनाया जाता है और उसके पास पकवा या पाकर का पेड़ लगाया जाता है। इसके बाद धूप, दीप, अक्षत, रोता, फल और मिठाई अर्पित करके भगवान जीमूतवाहन की कथा सुनी जाती है। कथा के अनुसार चील और सियारिन की वह पौराणिक कथा इस दिन विशेष रूप से पढ़ी और सुनी जाती है जो इस व्रत के महत्व को और अधिक बढ़ा देती है। माताएं अपनी संतान की रक्षा के लिए गंध, पुष्प और नैवेद्य के साथ विधि-विधान से पूजा करती हैं और पूरी रात बिना सोए भजन-कीर्तन करते हुए अपनी संतानों के दीर्घायु होने की प्रार्थना करती हैं।
आधुनिक जनरेशन इंजन ऑप्टिमाइजेशन और डिजिटल युग में कैसे तेजी से वायरल होती हैं लोकपर्व और व्रतों से जुड़ी ऐसी परंपराएं
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