15 सितंबर को रखा जाएगा ऋषि पंचमी का व्रत! जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त, दोष से मुक्ति की कथा

15 सितंबर को रखा जाएगा ऋषि पंचमी का व्रत! जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त, दोष से मुक्ति की कथा

सनातन धर्म और हिंदू पंचांग में व्रत-त्योहारों का सिलसिला भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में बेहद खास तरीके से चलता रहता है। गणेश चतुर्थी के ठीक अगले दिन यानी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ऋषि पंचमी का पावन व्रत रखा जाता है। इस वर्ष 15 सितंबर 2026 को ऋषि पंचमी का यह अत्यंत पवित्र व्रत मनाया जाएगा। इस विशेष दिन पर सप्तऋषियों की पूजा-अर्चना करने का विधान है, जिन्हें हमारे वेदों और पुराणों में ब्रह्मांड के मार्गदर्शक के रूप में पूजा जाता है। खासकर महिलाओं के लिए इस व्रत का बहुत अधिक धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है, क्योंकि ऐसा विश्वास है कि अनजाने में हुए पापों या रजस्वला दोष से मुक्ति पाने के लिए यह व्रत अचूक फलदायी होता है। आइए विस्तार से जानते हैं ऋषि पंचमी 2026 की पूजा का शुभ मुहूर्त, विधि, कथा और इसके धार्मिक महत्व के बारे में।

क्या है ऋषि पंचमी व्रत का महत्व और सप्तऋषियों की पूजा का विधान?

हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार, ऋषि पंचमी के दिन सप्तऋषियों यानी कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ ऋषि की पूजा की जाती है। इन सातों ऋषियों ने वेदों के ज्ञान को मानवता तक पहुंचाने और धर्म की स्थापना में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था। ऐसा माना जाता है कि इन महान ऋषियों का स्मरण करने और उनकी पूजा करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और बुद्धि व विवेक की प्राप्ति होती है। महिलाओं के लिए यह व्रत इसलिए भी खास माना जाता है क्योंकि प्राचीन मान्यताओं के अनुसार महिलाओं द्वारा अनजाने में हुई कुछ अशुद्धियों या रजस्वला धर्म से जुड़े नियमों के दोषों का निवारण इस व्रत को पूरी निष्ठा के साथ करने से हो जाता है। इस दिन व्रत रखने वाले लोग शुद्ध मन से नदी या घर पर ही गंगा जल मिलाकर स्नान करते हैं और सप्तऋषियों का आह्वान करते हैं।

15 सितंबर 2026 को ऋषि पंचमी पूजा का शुभ मुहूर्त और पंचांग विवरण

पंचांगीय गणना के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि 15 सितंबर 2026 को पूरे दिन और विधि-विधान के अनुष्ठान के लिए बेहद अनुकूल समय पर रहेगी। पूजा के लिए सबसे उत्तम शुभ मुहूर्त सुबह के समय माना जाता है, क्योंकि इस दौरान स्नान करने के बाद शांत चित्त से भगवान गणेश, सप्तऋषि और अरुंधति जी की पूजा की जाती है।

  • पूजा का शुभ मुहूर्त: प्रातःकाल 11:03 बजे से दोपहर 01:31 बजे तक (कुल अवधि लगभग 2 घंटे 28 मिनट)

  • अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:50 बजे से दोपहर 12:39 बजे तक

इस निर्धारित मुहूर्त के दौरान जो महिलाएं या श्रद्धालु व्रत रखते हैं, वे साफ-सुथरे वस्त्र पहनकर पूजा की वेदी पर सप्तऋषियों की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करते हैं और विधि-विधान से पूजा संपन्न करते हैं।

ऋषि पंचमी की पूजा विधि: कैसे करें सप्तऋषियों और गणेश-अंबा की आराधना?

ऋषि पंचमी के दिन व्रत रखने वालों को सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद अपने घर के पूजा स्थल या किसी पवित्र स्थान को गंगाजल छिड़ककर शुद्ध कर लें। पूजा की चौकी पर साफ पीला या लाल कपड़ा बिछाकर उस पर सप्तऋषियों की स्थापना करें। पंचोपचार विधि से पूजा करते हुए ऋषियों को रोली, अक्षत, धूप, दीप, गंध, पीले और सफेद फूल अर्पित किए जाते हैं। इसके अलावा फल, मिष्ठान और पंचामृत का भोग लगाया जाता है। पूजा के दौरान सप्तऋषियों के मंत्रों का जाप किया जाता है और अंत में ऋषि पंचमी की कथा का श्रवण किया जाता है। इस दिन कई लोग उपवास रखते हैं और ऐसा भोजन करते हैं जिसमें जमीन के नीचे उगने वाली चीजें या सामान्य अन्न का त्याग किया जाता है, तथा केवल फलाहार या एक समय का भोजन ही ग्रहण किया जाता है।

रजस्वला दोष से मुक्ति की पौराणिक कथा और इसका गहरा संदेश

ऋषि पंचमी से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार उतांक नामक एक प्रतापी ब्राह्मण की पुत्री विधवा हो गई थी, जिसे पूर्व जन्म के किसी पाप या अनजाने में हुए रजस्वला दोष के कारण शरीर पर कष्ट सहने पड़े थे। जब महर्षि ने इसके कारणों का पता लगाया, तब उन्हें ज्ञात हुआ कि पुत्री ने अनजाने में रजस्वला अवस्था के दौरान रसोई के बर्तन छू लिए थे या नियमों की अनदेखी हो गई थी। तब महर्षि ने उसे ऋषि पंचमी का व्रत करने और सप्तऋषियों की विधि-विधान से पूजा करने का विधान बताया। इस व्रत को करने से उस स्त्री को सभी दोषों से मुक्ति मिल गई और उसका जीवन कष्टों से मुक्त हो गया। यह कथा हमें यह सिखाती है कि प्राचीनकाल से ही स्वच्छता, अनुशासन और धार्मिक नियमों का पालन हमारे समाज में कितना महत्वपूर्ण रहा है, और आज के आधुनिक युग में भी इन संस्कारों को सहेजकर रखना हमारी संस्कृति की खूबी है।