ग्रह शांति के उपायों में मंत्र साधना की भूमिका, जानें ग्रहों के मंत्र जप की निर्धारित संख्या
भारतीय सनातन संस्कृति और वैदिक ज्योतिष शास्त्र में मनुष्य के जीवन पर नौ ग्रहों (नवग्रहों) के प्रभाव को बहुत गहराई से स्वीकार किया गया है। जन्म कुंडली में ग्रहों की स्थिति अच्छी हो तो व्यक्ति रंक से राजा बन जाता है, वहीं यदि ग्रह प्रतिकूल या नीच के हों तो जीवन में संघर्ष, बाधाएं और मानसिक तनाव का दौर शुरू हो जाता है। इन खगोलीय पिंडों यानी ग्रहों के नकारात्मक प्रभावों को शांत करने और उनकी सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करने के लिए हमारे ऋषियों-मुनियों ने कई तरह के उपाय बताए हैं, जिनमें रत्न धारण करना, दान करना, व्रत रखना और सबसे प्रभावी रूप से 'मंत्र साधना' करना शामिल है। मंत्र साधना एक ऐसा आध्यात्मिक और वैज्ञानिक मार्ग है जिसमें शब्दों की ध्वनि ऊर्जा (Sound Energy) और एकाग्रता के माध्यम से ब्रह्मांडीय आवृत्तियों के साथ सीधा संपर्क स्थापित किया जाता है। जब कोई जातक विधि-विधान से किसी विशेष ग्रह के मंत्र का जाप करता है, तो उसके भीतर एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है जो उस ग्रह से जुड़ी पीड़ाओं को कम करने में सहायक बनता है। आज के इस भौतिकवादी और तनावपूर्ण युग में जहां हर व्यक्ति किसी न किसी ग्रह की महादशा या अंतर्दशा से परेशान है, मंत्र साधना एक ऐसा सस्ता, सरल और शत-प्रतिशत प्रभावी उपाय है जिसे कोई भी व्यक्ति घर बैठे आसानी से अपना सकता है।
सूर्य, चंद्रमा और मंगल ग्रह के मंत्र और उनकी निर्धारित जप संख्या
वैदिक ज्योतिष के अनुसार नवग्रहों में सबसे पहले बात करते हैं ग्रहों के राजा 'सूर्य देव' की, जिनकी कृपा से मान-सम्मान, यश और प्रशासनिक सफलता मिलती है। यदि कुंडली में सूर्य कमजोर हो तो 'ॐ सूर्याय नमः' या सूर्य के बीज मंत्र 'ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः' का जाप करना चाहिए, जिसकी कुल निर्धारित संख्या 7,000 है। इसके बाद मन और भावनाओं के कारक 'चंद्रमा' की शांति के लिए 'ॐ शं सोमाय नमः' या चंद्रमा के बीज मंत्र 'ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्रमसे नमः' का जाप 11,000 बार करने का विधान है, जिससे मानसिक स्थिरता और शीतलता प्राप्त होती है। ऊर्जा, पराक्रम और भूमि-भवन के कारक 'मंगल' ग्रह के अशुभ प्रभाव (या मांगलिक दोष) को दूर करने के लिए मंगल के बीज मंत्र 'ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः' का जाप 10,000 संख्या में पूर्ण करना चाहिए। इन सभी मंत्रों के जाप के लिए रुद्राक्ष की माला या लाल चंदन की माला का उपयोग करना सर्वोत्तम माना गया है, और जाप हमेशा शुद्ध आसन पर बैठकर शांत चित्त से करना चाहिए ताकि ध्वनि तरंगे सीधे ब्रह्मांड तक पहुंच सकें।
बुध, गुरु और शुक्र ग्रह की शांति के लिए मंत्र साधना के नियम
बुद्धि, व्यापार और संवाद के दाता 'बुध' ग्रह को मजबूत करने के लिए बुध के बीज मंत्र 'ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः' का जाप 9,000 की निर्धारित संख्या में करना चाहिए, जिससे निर्णय लेने की क्षमता और बौद्धिक विकास में वृद्धि होती है। देवगुरु बृहस्पति यानी 'गुरु' जो ज्ञान, भाग्य और वैवाहिक सुख के कारक हैं, उनकी कृपा पाने के लिए 'ॐ बृं बृहस्पतये नमः' या गुरु बीज मंत्र 'ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः' का 19,000 बार जाप करने का शास्त्रीय नियम है। इसी प्रकार, ऐश्वर्य, सौंदर्य, प्रेम और भौतिक सुख-सुविधाओं के स्वामी 'शुक्र' ग्रह के दोषों को समाप्त करने के लिए शुक्र के बीज मंत्र 'ॐ द्रां द्रिं द्रौं सः शुक्राय नमः' का जाप 16,000 की संख्या में अनुशासित तरीके से पूरा करना चाहिए। इन मंत्रों के जाप के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि संख्या हमेशा संकल्प लेकर ही शुरू की जाए और प्रतिदिन एक निश्चित समय पर ही माला का जाप किया जाए, जिससे ऊर्जा का प्रवाह नियमित बना रहता है और ग्रहों के सकारात्मक परिणाम बहुत जल्द दिखने लगते हैं।
शनि, राहु और केतु के लिए विशेष मंत्र और जाप की संख्या
ज्योतिष में न्याय के देवता 'शनि देव' को कर्मफलदाता माना जाता है, जिनकी साढ़ेसाती या ढैय्या के दौरान व्यक्ति को कड़े संघर्षों का सामना करना पड़ता है। शनि के कोप से बचने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए शनि के बीज मंत्र 'ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः' का जाप 23,000 की निर्धारित संख्या में करना सबसे अचूक उपाय माना गया है, और इस दौरान काले वस्त्र या नीले आसन का प्रयोग तथा गरीबों की सेवा करना विशेष फलदायी होता है। इसी प्रकार, छाया ग्रह 'राहु' की शांति के लिए राहु के बीज मंत्र 'ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः' का जाप 18,000 बार और मोक्ष के कारक 'केतु' ग्रह के लिए केतु के बीज मंत्र 'ॐ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं सः केतवे नमः' का जाप 17,000 बार किया जाना चाहिए। राहु और केतु के मंत्रों का जाप आमतौर पर गोधूलि बेला या रात्रि के समय करना अधिक प्रभावी माना जाता है, क्योंकि ये दोनों छाया ग्रह रहस्यमयी ऊर्जाओं से जुड़े होते हैं।
मंत्र जाप करते समय किन नियमों और सावधानियों का रखना चाहिए ध्यान?
किसी भी ग्रह के मंत्रों की निर्धारित संख्या को पूरा करते समय कुछ विशेष नियमों और सावधानियों का पालन करना अनिवार्य होता है, अन्यथा साधना का पूरा फल नहीं मिल पाता है। सबसे पहले, मंत्रों का उच्चारण पूरी तरह से शुद्ध और स्पष्ट होना चाहिए क्योंकि गलत उच्चारण से ऊर्जा का सकारात्मक प्रभाव कम हो सकता है। दूसरा, जाप के लिए कुश या ऊन के आसन का ही प्रयोग करें और माला हमेशा गोमुखी के अंदर रखकर फेरनी चाहिए ताकि माला का कोई भी मनका जमीन को न छुए। तीसरा, साधना काल के दौरान सात्विक आहार का सेवन करें, ब्रह्मचर्य का पालन करें और मन में किसी के प्रति ईर्ष्या या द्वेष का भाव न रखें। जब किसी ग्रह के मंत्रों की निर्धारित संख्या पूरी हो जाती है, तो उसका दशांश (यानी दसवां हिस्सा) हवन, तर्पण या गरीबों को दान करके उसका पूर्ण अनुष्ठान (उद्यापन) करना चाहिए। यदि आप इन सभी नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करते हुए अपने जीवन में ग्रह शांति के इन उपायों को अपनाते हैं, तो निश्चित रूप से आपके जीवन के सभी कष्ट दूर होंगे और भाग्य का पूरा साथ मिलना शुरू हो जाएगा।