कब रखा जाएगा प्रदोष व्रत, 23 या 24 अक्टूबर? कंफ्यूजन करें दूर

कब रखा जाएगा प्रदोष व्रत, 23 या 24 अक्टूबर? कंफ्यूजन करें दूर

सनातन धर्म में प्रदोष व्रत का विशेष और अत्यंत पवित्र महत्व माना गया है। भगवान शिव को समर्पित यह प्रदोष व्रत हर महीने की दोनों पक्षों की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है। इस व्रत को करने से न केवल भोलेनाथ की कृपा प्राप्त होती है, बल्कि जीवन के सभी कष्टों, पापों और अड़चनों से भी मुक्ति मिलती है। वर्तमान में अक्टूबर 2026 के महीने में प्रदोष व्रत की तिथि को लेकर श्रद्धालुओं के मन में काफी असमंजस की स्थिति बनी हुई है कि यह व्रत 23 अक्टूबर को रखा जाएगा या फिर 24 अक्टूबर को। पंचांगीय गणना और उदया तिथि के नियमों के अनुसार तिथियों के घटने-बढ़ने के कारण अक्सर व्रत के दिन को लेकर ऐसा संशय उत्पन्न हो जाता है। यदि आप भी इस बात को लेकर भ्रमित हैं कि इस महीने प्रदोष व्रत किस दिन रखा जाना शास्त्र सम्मत रहेगा, तो इस लेख में आपकी सारी उलझन दूर हो जाएगी। आइए जानते हैं अक्टूबर 2026 के प्रदोष व्रत की एकदम सटीक तारीख, पूजा का शुभ मुहूर्त, प्रदोष काल का समय और संपूर्ण विधि-विधान।

पंचांगीय गणना के अनुसार जानें अक्टूबर 2026 प्रदोष व्रत की सही डेट और तिथि का समय

वैदिक पंचांग के अनुसार, किसी भी व्रत या त्योहार का निर्णय तिथियों के सूर्योदय और प्रदोष काल (संध्याकाल) में उनकी व्याप्ति के आधार पर किया जाता है। अक्टूबर 2026 के इस प्रदोष व्रत के लिए त्रयोदशी तिथि का आरंभ कब हो रहा है और इसका समापन कब होगा, यह जानना बेहद जरूरी है ताकि व्रत का पूर्ण फल प्राप्त किया जा सके। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, त्रयोदशी तिथि का प्रवेश 23 अक्टूबर की शाम को हो रहा है और इसका विस्तार 24 अक्टूबर तक रहेगा। चूंकि प्रदोष व्रत की मुख्य पूजा प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के ठीक बाद के समय में की जाती है, इसलिए संध्याकाल में भगवान शिव की आराधना का विशेष महत्व होता है। विद्वान ज्योतिषियों और पंचांग कर्ताओं के मत के अनुसार, प्रदोष काल की प्रधानता को देखते हुए ही व्रत का दिन निर्धारित किया जाता है। इसलिए श्रद्धालुओं को सलाह दी जाती है कि वे तिथि के सही क्षय और वृद्धि के नियमों को ध्यान में रखते हुए ही अपने व्रत का संकल्प लें और भगवान शिव की आराधना करें, जिससे व्रत का पूर्ण पुण्य प्राप्त हो सके।

प्रदोष व्रत पूजा का शुभ मुहूर्त और संध्याकाल में शिव आराधना का महत्व

प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव की पूजा का सबसे सर्वोत्तम समय प्रदोष काल माना गया है, जो कि सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पहले और 45 मिनट बाद तक का समय होता है। इस दौरान पूरा वातावरण शांत और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण रहता है। अक्टूबर 2026 के इस प्रदोष व्रत के दिन प्रदोष काल में पूजा करने के लिए भक्तों को विशेष रूप से तैयार रहना चाहिए। इस शुभ मुहूर्त में भगवान शंकर, माता पार्वती, भगवान गणेश, कार्तिकेय और नंदी जी की विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस समयावधि में पंचाक्षर मंत्र (ॐ नमः शिवाय) का जाप करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, प्रदोष काल में की गई पूजा से कुंडली में चंद्रमा की स्थिति मजबूत होती है और मानसिक शांति तथा आरोग्यता का वरदान मिलता है। इस दिन शाम के समय मंदिरों में भी विशेष अनुष्ठान और रुद्राभिषेक का आयोजन किया जाता है, जिसमें भाग लेने के लिए दूर-दूर से शिव भक्त पहुंचते हैं और हर-हर महादेव के जयकारों से पूरा माहौल गुंजायमान हो जाता है।

प्रदोष व्रत की संपूर्ण पूजा विधि और ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण नियम

प्रदोष व्रत के दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद व्रत का संकल्प लेकर घर के पूजा स्थल या किसी नजदीकी शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव की पूजा की तैयारी करनी चाहिए। पूजा के दौरान शिवलिंग का जल, गंगाजल, दूध, दही, शहद, घी और पंचामृत से अभिषेक करना बेहद शुभ माना जाता है। अभिषेक के बाद भोलेनाथ को बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल, सफेद चंदन, रोली, अक्षत और जनेऊ अर्पित करें। इसके पश्चात भोग के रूप में फल, मिठाई और ठंडाई का नैवेद्य लगाएं। पूजा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा प्रदोष काल में होता है, जहां सूर्यास्त के समय एक बार फिर से स्नान करके साफ वस्त्र पहनकर दीपक प्रज्वलित किया जाता है और प्रदोष व्रत की कथा का पाठ या श्रवण किया जाता है। कथा समाप्त होने के बाद आरती करें और भगवान से अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करें। इस व्रत में फलाहार या अन्न का त्याग करके अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार उपवास रखा जाता है और अगले दिन पारण के बाद ही व्रत का समापन किया जाता है।