सीतापुर में कांग्रेस को बड़ा झटका: 55 साल पुराना दफ्तर खाली करने का आदेश, हाई कोर्ट से भी नहीं मिली राहत
उत्तर प्रदेश के सीतापुर में ग्रैंड पुराने दल यानी कांग्रेस पार्टी पर एक बड़ा कानूनी संकट आ खड़ा हुआ है। शहर के बीचोंबीच दशकों से चल रहे कांग्रेस कार्यालय को अब खाली करना होगा क्योंकि इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने पार्टी को किसी भी तरह की राहत देने से दोटूक मना कर दिया है।
नगर पालिका के बेदखली फरमान के खिलाफ कोर्ट पहुंची कांग्रेस पार्टी के हाथ निराशा लगी है। आरोप है कि यह ऐतिहासिक इमारत और नजूल की भूमि बिना किसी वैध आवंटन के इतने लंबे समय से इस्तेमाल हो रही थी और पिछले पांच दशकों से अधिक समय से एक भी पाई का भुगतान नहीं किया गया है।
अदालत की दोटूक: लंबे कब्जे से अधिकार नहीं मिलता
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी सरकारी संपत्ति पर केवल कब्जा जमाए रहने से वह संपत्ति उस पर कब्जा करने वाले की वैध संपत्ति नहीं बन जाती। अदालत ने याचिकाकर्ताओं से आवंटन से जुड़ा कोई भी पुख्ता दस्तावेज या कानूनी आदेश मांगा जिसे वे पेश करने में नाकामयाब रहे। राज्य सरकार की तरफ से भी इस बात पर जोर दिया गया कि संबंधित जमीन पूरी तरह से नजूल श्रेणी की है और उस पर किया गया कब्जा शुरू से ही नियमों के विरुद्ध रहा है।
कागजों में उलझा दावा और 55 साल का बकाया
विवाद की शुरुआत तब हुई जब नगर पालिका परिषद सीतापुर की प्रभारी अधिशासी अधिकारी ने टैमसेन गंज क्षेत्र के घंटाघर स्थित प्लॉट संख्या 244/1 से कांग्रेस का नाम हटाने और कब्जा हटाने का नोटिस थमाया। इसके जवाब में पार्टी पदाधिकारियों ने साल 1971 की एक पुरानी रसीद का हवाला दिया जिसमें 320 रुपये जमा करने का दावा किया गया था।
हालांकि नगर पालिका की जांच में ऐसा कोई भी आधिकारिक रिकॉर्ड या वैध लीज एग्रीमेंट नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि वह जगह कानूनी तौर पर पार्टी को आवंटित की गई थी। अधिकारियों के मुताबिक पिछले 55 सालों से इस पते पर न तो किराया चुकाया गया और न ही कोई वैध अनुमति ली गई।
आगे की कानूनी प्रक्रिया और जवाब तलब
हाई कोर्ट ने नगर पालिका के आदेश पर रोक लगाने से साफ इनकार करते हुए याचिकाकर्ताओं की अंतरिम राहत की मांग को खारिज कर दिया है। अदालत ने मामले में पक्षकारों को निर्देश दिया है कि वे आगामी तीन हफ्तों के भीतर अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करें जिसके बाद आगे की सुनवाई की जाएगी। इस कानूनी झटके के बाद अब सीतापुर की राजनीति में हलचल तेज हो गई है क्योंकि पार्टी के लिए अपने पुराने और ऐतिहासिक ठिकाने को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती बन गया है।