बिल्डिंग बायलॉज में ऐतिहासिक बदलाव: अब ग्रीन बेल्ट में भी हो सकेगा निर्माण, विकास प्राधिकरणों ने दी हरी झंडी; जानें क्या बन सकेगा और क्या हैं कड़े नियम

बिल्डिंग बायलॉज में ऐतिहासिक बदलाव: अब ग्रीन बेल्ट में भी हो सकेगा निर्माण, विकास प्राधिकरणों ने दी हरी झंडी; जानें क्या बन सकेगा और क्या हैं कड़े नियम

शहरी विकास, मास्टर प्लान और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन साधने की दिशा में राज्य सरकार के आवास एवं शहरी नियोजन विभाग ने एक युगांतरकारी और नीतिगत निर्णय लिया है। प्रदेश के सभी विकास प्राधिकरणों (Development Authorities) के मॉडल बिल्डिंग बायलॉज और जोनिंग रेगुलेशन में बड़ा संशोधन करते हुए अब मास्टर प्लान में दर्ज 'ग्रीन बेल्ट' (हरित पट्टी) और खुले मनोरंजक क्षेत्रों (Open Recreational Zones) में नियंत्रित निर्माण की सशर्त अनुमति प्रदान कर दी गई है।

अब तक ग्रीन बेल्ट घोषित भूखंडों पर किसी भी प्रकार के पक्के निर्माण पर पूर्ण प्रतिबंध था, जिसके कारण लाखों हेक्टेयर जमीन अनुपयोगी पड़ी रहती थी और धीरे-धीरे भू-माफियाओं द्वारा अवैध कॉलोनियों व झोपड़पट्टियों के कब्जे का शिकार हो जाती थी। शासन के इस नए बायलॉज संशोधन से न केवल ग्रीन बेल्ट की जमीनों पर अवैध कब्जों पर रोक लगेगी, बल्कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना वहां आधुनिक, जन-उपयोगी, खेल-कूद, पर्यटन और स्वास्थ्य से जुड़ी हरित गतिविधियों को विधिवत बढ़ावा मिल सकेगा।

बिल्डिंग बायलॉज में संशोधन: आखिर क्या बदला और क्यों पड़ी जरूरत?

शहरीकरण की तेज रफ्तार के बीच विभिन्न महानगरों के मास्टर प्लान-2031 में बड़े भूभाग को ग्रीन बेल्ट, एग्रीकल्चरल ग्रीन या रीजनल पार्क के रूप में आरक्षित किया गया था। कड़े प्रतिबंधों के कारण इन भूखंडों के मूल मालिक (काश्तकार व निजी निवेशक) न तो अपनी जमीन का कोई उपयोग कर पा रहे थे और न ही विकास प्राधिकरण वहां कोई गतिविधि शुरू कर पा रहे थे। इसके चलते अनियोजित निर्माण और अवैध फार्महाउसों की बाढ़ आ गई थी।

नगर एवं ग्राम नियोजन विभाग (Town and Country Planning Department) की उच्चस्तरीय तकनीकी समिति ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ग्रीन जोनिंग मॉडलों का गहन अध्ययन करने के बाद पाया कि यदि न्यूनतम ग्राउंड कवरेज और अधिकतम हरित क्षेत्र की अनिवार्य शर्त रखी जाए, तो ग्रीन बेल्ट में पर्यावरण-मित्र (Eco-Friendly) गतिविधियों को अनुमति देना शहर के हित में होगा। इसी आधार पर उपविधि में संशोधन कर ग्रीन बेल्ट के नियमों को अधिक व्यावहारिक और आर्थिक रूप से उपयोगी बनाया गया है।

ग्रीन बेल्ट में क्या-क्या बनाने की मिलेगी कानूनी अनुमति?

संशोधित बिल्डिंग बायलॉज के अनुसार, ग्रीन बेल्ट की जमीन पर केवल उन्हीं गतिविधियों को स्वीकृति दी जाएगी जो प्रकृति और हरियाली के संवर्धन में सहायक हों और जिनसे किसी भी प्रकार का औद्योगिक या रासायनिक प्रदूषण न फैलता हो। नए नियमों के तहत निम्नलिखित परियोजनाओं के नक्शे पास किए जा सकेंगे:

  • ओपन-एयर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, खेल अकादमी, गोल्फ ड्राइविंग रेंज, क्रिकेट/फुटबॉल टर्फ, टेनिस कोर्ट और स्विमिंग पूल।

  • प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र, आयुर्वेद व योग आश्रम, मेडिटेशन रिट्रीट और हॉलिस्टिक वेलनेस सेंटर।

  • आधुनिक एग्रो-टूरिज्म पार्क, बॉटनिकल गार्डन, हॉर्टिकल्चर नर्सरी और फ्लोरीकल्चर फार्म।

  • प्री-फैब्रिकेटेड स्ट्रक्चर या लकड़ी/बैम्बू आधारित इको-फ्रेंडली रिसॉर्ट्स और कॉटेज।

  • खुला थीम पार्क, बायोडायवर्सिटी पार्क, चिल्ड्रन्स प्ले जोन और सार्वजनिक एम्यूजमेंट वेन्यू।

  • ओपन-एयर डाइनिंग, गार्डन रेस्टोरेंट, ऑर्गेनिक फूड कैफे और आर्ट गैलरी/हस्तशिल्प प्रदर्शनी केंद्र।

  • हेलीपैड, सौर ऊर्जा संयंत्र (सोलर फार्म), वर्षा जल संचयन अवसंरचना और अनिवार्य ग्रीन पार्किंग लॉट।

यह पूरी तरह स्पष्ट किया गया है कि ग्रीन बेल्ट में किसी भी प्रकार की भारी आवासीय बहुमंजिला इमारतें (Group Housing), सामान्य व्यावसायिक शॉपिंग मॉल, विनिर्माण उद्योग, गोदाम (वेयरहाउस) या रासायनिक इकाइयां स्थापित करने पर पूर्ण प्रतिबंध पूर्ववत जारी रहेगा।

ग्राउंड कवरेज और एफएआर (FAR) के कड़े नियम: कंक्रीट का जंगल बनने पर रोक

ग्रीन बेल्ट की मूल आत्मा यानी हरियाली को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए विकास प्राधिकरणों ने निर्माण के तकनीकी मानकों (Building Parameters) को अत्यंत कठोर रखा है:

  • न्यूनतम भूखंड क्षेत्रफल: ग्रीन बेल्ट में किसी भी गतिविधि के लिए न्यूनतम भूखंड का आकार 1 एकड़ (लगभग 4,000 वर्ग मीटर) से लेकर 5 एकड़ तक निर्धारित किया गया है, ताकि छोटे-छोटे टुकड़ों में कंक्रीट का निर्माण न हो सके।

  • ग्राउंड कवरेज की सीमा: कुल भूखंड क्षेत्रफल के केवल 5 प्रतिशत से अधिकतम 10 प्रतिशत हिस्से पर ही कंक्रीट/पक्का निर्माण करने की अनुमति होगी। शेष 90 से 95 प्रतिशत भूभाग को अनिवार्य रूप से खुला, हरा-भरा और वृक्षारोपण से आच्छादित रखना होगा।

  • फ्लोर एरिया रेशियो (FAR): इस क्षेत्र में एफएआर को 0.05 से 0.10 के बीच सीमित रखा गया है, ताकि अत्यधिक सघनता न बने।

  • ऊंचाई पर पाबंदी: भवनों की अधिकतम ऊंचाई ग्राउंड प्लस वन (G+1) यानी 9 से 12 मीटर तक ही सीमित रहेगी।

  • सॉलिड वेस्ट व एसटीपी अनिवार्यता: परिसर के भीतर ही जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (ZLD) और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) लगाना अनिवार्य होगा, ताकि बाहर किसी प्रकार की गंदगी न बहे।

ग्रीन बेल्ट भू-स्वामियों को मिली बड़ी राहत, अवैध कब्जों पर लगेगी लगाम

इस फैसले से उन लाखों भू-स्वामियों और किसानों को सबसे बड़ी राहत मिली है, जिनकी उपजाऊ या पैतृक जमीनें मास्टर प्लान लागू होने के बाद ग्रीन बेल्ट में दर्ज हो गई थीं। पहले ऐसी जमीनों के खरीदार नहीं मिलते थे और बैंकों से उन पर कोई लोन भी स्वीकृत नहीं होता था।

अब अधिकृत तौर पर इको-फ्रेंडली प्रोजेक्ट्स, रिसॉर्ट्स, वेलनेस सेंटर्स और स्पोर्ट्स एकेडमी के लिए रास्ता साफ होने से इन जमीनों का वास्तविक बाजार मूल्य बढ़ेगा। साथ ही, जब इन भूखंडों पर बाउंड्रीवॉल और वैध परियोजनाओं का विकास होगा, तो असमाजिक तत्वों और अवैध प्लॉटिंग करने वाले सिंडिकेट्स द्वारा सरकारी व निजी ग्रीन बेल्ट पर किए जाने वाले अतिक्रमणों पर पूरी तरह विराम लग सकेगा।

पर्यावरण संरक्षण और प्राधिकरणों के राजस्व का संतुलित मॉडल

नगरीय विकास विशेषज्ञों का मानना है कि यह नीति पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के बीच उत्कृष्ट संतुलन स्थापित करती है। एक तरफ जहां शहर के चारों ओर ग्रीन बफर जोन का दायरा सुरक्षित रहेगा और सघन पौधारोपण को कानूनी बाध्यता बनाया जाएगा, वहीं दूसरी तरफ विकास प्राधिकरणों को विकास शुल्क (Development Charges), लैंड यूज कन्वर्जन चार्ज और नक्शा पासिंग फीस के रूप में करोड़ों रुपये का अतिरिक्त गैर-कर राजस्व (Non-Tax Revenue) प्राप्त होगा।

इस राजस्व का उपयोग संबंधित विकास प्राधिकरण अपने अधिकार क्षेत्र में नए पार्क विकसित करने, झीलों के पुनरुद्धार और शहरी वनीकरण (Urban Forestry) अभियानों को वित्तपोषित करने में कर सकेंगे।

नक्शा पास कराने की प्रक्रिया होगी ऑनलाइन और पारदर्शी

विकास प्राधिकरणों में भ्रष्टाचार और लालफीताशाही को समाप्त करने के लिए ग्रीन बेल्ट निर्माण की स्वीकृति प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल बनाया जा रहा है।

  • सभी आवेदन 'ऑनलाइन बिल्डिंग प्लान अप्रूवल सिस्टम' (OBPAS) पोर्टल के माध्यम से स्वीकार किए जाएंगे।

  • आवेदक को आर्किटेक्चरल डिजाइन के साथ पर्यावरण प्रबंधन योजना (EMP) और लैंडस्केप प्लान अपलोड करना होगा।

  • प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB), वन विभाग और दमकल विभाग (Fire Department) से एनओसी प्राप्त करने के लिए सिंगल विंडो क्लीयरेंस सिस्टम की व्यवस्था की गई है।

  • निर्माण पूरा होने के बाद ड्रोन मैपिंग और सैटेलाइट इमेजरी के जरिए जांच की जाएगी कि स्वीकृत 5-10% ग्राउंड कवरेज से अधिक निर्माण तो नहीं किया गया है। उल्लंघन पाए जाने पर तत्काल ध्वस्तीकरण और भारी जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

प्रदेश के इन प्रमुख विकास प्राधिकरणों में लागू होगा नया नियम

आवास विभाग द्वारा जारी यह अधिसूचना उत्तर प्रदेश के सभी छोटे-बड़े विकास प्राधिकरणों पर लागू होगी। इनमें लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA), नोएडा प्राधिकरण (NOIDA), ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण (GNIDA), यमुना एक्सप्रेसवे प्राधिकरण (YEIDA), गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (GDA), कानपुर विकास प्राधिकरण (KDA), आगरा विकास प्राधिकरण (ADA), वाराणसी विकास प्राधिकरण (VDA), प्रयागराज विकास प्राधिकरण (PDA), मेरठ विकास प्राधिकरण (MDA), बरेली विकास प्राधिकरण (BDA), मुरादाबाद (MDA), गोरखपुर (GDA), अयोध्या (ADA) और झांसी विकास प्राधिकरण (JDA) शामिल हैं।

संबंधित विकास प्राधिकरणों के बोर्ड स्तर पर इस प्रस्ताव को औपचारिक रूप से अंगीकार कर अगले कुछ हफ्तों के भीतर जनता से आपत्तियां व सुझाव आमंत्रित किए जाएंगे, जिसके बाद ऑनलाइन पोर्टल पर ग्रीन बेल्ट बिल्डिंग परमिट के लिए आवेदन विंडो खोल दी जाएगी।