8 साल के लंबे इंतजार के बाद फिर खुले उत्तराखंड के बुग्यालों के दरवाजे: हाई एल्टीट्यूड टूरिज्म के रोमांच के साथ पर्यटक रात भी गुजार सकेंगे
देवभूमि उत्तराखंड की गोद से साहसिक पर्यटन (Adventure Tourism) प्रेमियों के लिए एक बेहद रोमांचक, ऐतिहासिक और बड़ी खुशखबरी सामने आ रही है। पिछले लगभग 8 सालों से पर्यटकों के लिए पूरी तरह प्रतिबंधित या सीमित किए गए राज्य के खूबसूरत और संवेदनशील अल्पाइन घास के मैदान यानी बुग्याल (Bugyals) एक बार फिर पर्यटकों के स्वागत के लिए खुलने जा रहे हैं। राज्य सरकार और वन विभाग ने हाई एल्टीट्यूड टूरिज्म (High Altitude Tourism) को बढ़ावा देने के लिए एक नया और संतुलित दिशा-निर्देश तैयार किया है, जिसके तहत अब पर्यटक न केवल इन मखमली बुग्यालों की प्राकृतिक सुंदरता का दीदार कर सकेंगे, बल्कि विशेष अनुमति और तय नियमों के तहत वहां रात (Night Stay) भी गुजार सकेंगे। इस फैसले से प्रदेश के ट्रैकिंग और पर्यटन उद्योग में एक नया उत्साह लौट आया है।
क्यों लगाए गए थे बुग्यालों में प्रवेश और रात्रि विश्राम पर प्रतिबंध?
उत्तराखंड के ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में स्थित बुग्याल पर्यावरण और जैव विविधता (Biodiversity) के लिहाज से बेहद संवेदनशील और अनमोल माने जाते हैं। आज से लगभग आठ साल पहले, पर्यावरणविदों और स्थानीय इकोलॉजिस्ट की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए माननीय न्यायालय और वन विभाग ने इन क्षेत्रों में पर्यटकों के अनियंत्रित प्रवेश, प्लास्टिक कचरे के फैलाव, कैंपिंग और रात बिताने पर रोक लगा दी थी। पिछले कुछ वर्षों में अत्यधिक टूरिस्ट फुटफॉल और अनियोजित कैंपिंग के कारण इन दुर्लभ अल्पाइन घास के मैदानों की प्राकृतिक वनस्पति और वन्यजीवों का आवास खतरे में पड़ गया था। सरकार का उद्देश्य इन पारिस्थितिक तंत्रों (Ecosystems) को पुनर्जीवित करना और उन्हें संवारना था, जिसमें काफी हद तक सफलता भी मिली है।
नए नियमों के साथ होगी शुरुआत: पर्यावरण संरक्षण और पर्यटन का संतुलन
इस बार बुग्यालों के दरवाजे खोलने के साथ ही सरकार ने नियमों को बेहद सख्त और पर्यावरण-अनुकूल (Eco-friendly) बनाया है ताकि दोबारा प्रकृति को नुकसान न पहुंचे। पर्यटन विभाग और उत्तराखंड वन विकास निगम ने तय किया है कि:
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बुग्यालों में जाने वाले ट्रैकरों और पर्यटकों के लिए एक निश्चित दैनिक सीमा (Carrying Capacity) तय होगी।
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कैंपिंग के दौरान प्लास्टिक, कांच या किसी भी प्रकार के अजैव निम्नीकरणीय कचरे (Non-biodegradable waste) को फैलाना पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा।
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पर्यटकों को पर्यावरण संरक्षण के नियमों की शपथ लेनी होगी और स्थानीय गाइडों की मदद से ही तय ट्रेकिंग मार्गों पर चलना होगा।
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रात्रि विश्राम के लिए आधुनिक और पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाने वाले टेंट या स्विस कॉटेज की सीमित अनुमति दी जाएगी।
राज्य के इन प्रसिद्ध बुग्यालों में फिर गूंजेगी पर्यटकों की चहल-पहल
उत्तराखंड के जिन प्रमुख अल्पाइन घास के मैदानों में यह रोमांचक गतिविधि फिर से शुरू होने जा रही है, उनमें प्रकृति प्रेमियों की पहली पसंद शामिल हैं:
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बेदनी बुग्याल और औली-गोरसों बुग्याल: गढ़वाल मंडल के इन विश्व प्रसिद्ध बुग्यालों में हिमालय की बर्फीली चोटियों का अद्भुत नजारा दिखाई देता है।
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दयारा बुग्याल: उत्तरकाशी जिले का यह बुग्याल अपनी विशालता और स्कीइंग के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है।
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चोपता और मडमहेश्वर क्षेत्र: यहाँ के ऊंचे अल्पाइन घास के मैदानों में रात गुजारने का अनुभव यात्रियों के लिए किसी सपने जैसा होता है।
स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार के नए अवसर
पर्यटन विशेषज्ञों का मानना है कि 8 साल बाद बुग्यालों के रात्रि विश्राम के साथ खुलने से उत्तराखंड के ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों की आर्थिकी को एक बहुत बड़ा संबल मिलेगा। होमस्टे संचालकों, स्थानीय पोर्टर्स (कुलियों), गाइडों और छोटे कारोबारियों के चेहरों पर एक बार फिर मुस्कान लौट आई है। साहसिक पर्यटन से जुड़े लोगों का कहना है कि यह कदम न केवल राज्य में एडवेंचर टूरिज्म को नई ऊंचाइयां देगा, बल्कि देश-विदेश के आने का एक सुनहरा अवसर भी प्रदान करेगा।