चमोली की कुप्रथा ने ली युवती की जान, धार्मिक मान्यता के नाम पर महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल
उत्तराखंड के चमोली जिले में 15 अगस्त की शाम लापता हुई युवती सुमित्रा का शव आखिरकार बरामद हो गया। नंदानगर ब्लॉक के सुतोल-तातड़ा क्षेत्र में हुई इस घटना ने एक दर्दनाक हादसे के साथ-साथ महिलाओं से जुड़ी एक पुरानी सामाजिक परंपरा पर भी बहस छेड़ दी है।
बताया जा रहा है कि सुमित्रा सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने के बाद स्नान के लिए नदी की ओर गई थी। इसके बाद वह वापस नहीं लौटी। कई दिनों तक तलाश चलने के बाद शनिवार को उसके शव की पुष्टि हुई।
मासिक धर्म के दौरान गांव में स्नान की मनाही
स्थानीय जानकारी के मुताबिक ग्राम सभा सुतोल के तातड़ा तोक में भूमियाल देवता की मान्यता से जुड़ी एक परंपरा आज भी चली आ रही है। इसके तहत मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को गांव की सीमा के भीतर स्नान करने की अनुमति नहीं होती।
ऐसी स्थिति में महिलाओं को करीब 5 किलोमीटर दूर सुतोल गांव की तरफ नंदाकिनी नदी के किनारे जाना पड़ता है। यही दूरी अब इस मामले के बाद सुरक्षा और सामाजिक सोच से जुड़े सवालों का कारण बन गई है।
नदी किनारे गई थी सुमित्रा
15 अगस्त की शाम सुमित्रा भी स्नान के लिए नदी की ओर गई थी। आशंका है कि इसी दौरान वह नदी में बह गई। स्थानीय लोगों ने उसकी तलाश शुरू की थी।
रात में नदी से करीब एक किलोमीटर दूर उसकी चप्पल मिलने के बाद नदी में बहने की आशंका और मजबूत हो गई थी। इसके बाद खोज अभियान जारी रहा। शनिवार को उसका शव बरामद होने के साथ तलाश खत्म हुई।
हादसे के बाद महिलाओं की सुरक्षा पर चर्चा
सुमित्रा की मौत ने स्थानीय लोगों के बीच दुख के साथ नाराजगी भी पैदा की है। कई लोगों का सवाल है कि अगर किसी महिला को मासिक धर्म के दौरान गांव से बाहर जाकर स्नान करना पड़ता है तो उसके लिए सुरक्षित और सम्मानजनक व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए।
जागरूक लोगों का कहना है कि 5 किलोमीटर दूर खुले स्थान पर जाने की मजबूरी महिलाओं के लिए असुविधा के साथ सुरक्षा का जोखिम भी बढ़ाती है। खासकर तब जब उन्हें अपनी निजी स्थिति के बारे में रास्ते में दूसरों को बताना पड़ता हो।
आस्था के साथ बदलाव की जरूरत पर जोर
स्थानीय स्तर पर अब इस परंपरा को खत्म करने की मांग उठ रही है। लोगों का कहना है कि धार्मिक आस्था अपनी जगह महत्वपूर्ण है लेकिन किसी ऐसी व्यवस्था को जारी रखना उचित नहीं है जिससे महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान प्रभावित हो।
जागरूक नागरिकों ने बुजुर्गों और युवाओं से इस मुद्दे पर मिलकर विचार करने की अपील की है। उनका तर्क है कि आस्था का उद्देश्य लोगों की रक्षा और कल्याण होना चाहिए। इसलिए समय के साथ ऐसी परंपराओं में बदलाव जरूरी है जो किसी के लिए परेशानी या खतरा बन जाएं।