किसान के बेटे मयंक बहुगुणा ने पलटा गढ़वाल सेंट्रल यूनिवर्सिटी का पासा, एबीवीपी को धूल चटाकर रचे नया इतिहास
उत्तराखंड की हसीन वादियों और उच्च शिक्षा के सबसे बड़े केंद्रों में शुमार हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनावों ने इस बार राज्य की राजनीति में ऐसा भूचाल ला दिया है, जिसकी गूंज सीधे देहरादून के सत्ता के गलियारों तक सुनाई दे रही है। इन चुनावों के बीच एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले और किसान के बेटे मयंक बहुगुणा ने वह करिश्मा कर दिखाया है, जिसकी चर्चा आज पूरे प्रदेश की जुबान पर है। मयंक बहुगुणा ने छात्र राजनीति के स्थापित दिग्गजों और सत्ताधारी दल की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) को करारी शिकस्त देते हुए सचिव पद पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। विश्वविद्यालय परिसर में चुनावों के आए इन चौंकाने वाले परिणामों ने न सिर्फ छात्र संगठनों के समीकरणों को पूरी तरह बदलकर रख दिया है, बल्कि यह भी साबित कर दिया है कि अगर किसी युवा के इरादे बुलंद हों और वह जमीन से जुड़ा हो, तो धनबल और बाहुबल की सियासत को धूल चटाई जा सकती है। मयंक की इस धमाकेदार जीत के बाद से ही छात्र वर्ग में जबरदस्त उत्साह का माहौल है और हर कोई यह जानना चाहता है कि आखिर संघर्ष की भट्टी में तपकर निकलने वाले मयंक बहुगुणा कौन हैं और उन्होंने इस सियासी गढ़ को कैसे फतह किया।
कौन हैं मयंक बहुगुणा? साधारण किसान परिवार से निकलकर छात्र संसद तक का तय किया प्रेरणादायक सफर
उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के अंतर्गत आने वाले सुदूर खिर्सू क्षेत्र के एक बेहद साधारण परिवार में जन्मे मयंक बहुगुणा का शुरुआती जीवन संघर्षों और कठिनाइयों से भरा रहा है। उनके पिता अनिल बहुगुणा एक आम किसान हैं, जो अपनी जमीन पर दिन-रात मेहनत करके अपने परिवार का गुजर-बसर करते हैं और बच्चों को पढ़ाने के लिए कड़ा परिश्रम करते आए हैं। मयंक ने अपनी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई बेहद सामान्य परिस्थितियों में पूरी की और उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए साल 2021 में गढ़वाल सेंट्रल यूनिवर्सिटी के श्रीनगर परिसर में बीए कोर्स में दाखिला लिया। कॉलेज के गेट पर कदम रखते ही उन्होंने महसूस किया कि आम छात्रों को अपनी छोटी-छोटी बुनियादी और शैक्षणिक समस्याओं के लिए किस हद तक जूझना पड़ता है, जिसके बाद उन्होंने प्रशासनिक और व्यवस्थागत कमियों के खिलाफ मुखर होने का फैसला किया। पढ़ाई के साथ-साथ कॉलेज के गलियारों में छात्रों के हकों की आवाज उठाने वाले मयंक लगातार छात्रहित के मुद्दों पर सक्रिय रहे और कभी भी अपनी पृष्ठभूमि को अपनी तरक्की के आड़े नहीं आने दिया। स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने एमए सोशियोलॉजी में एडमिशन लिया और वर्तमान में वे इसी विषय के छात्र हैं, जहां उन्होंने अपनी नेतृत्व क्षमता और मिलनसार स्वभाव के दम पर आम छात्रों के दिलों में एक खास जगह बना ली है।
ABVP के किले में बड़ी सेंध, छात्रसंघ चुनाव में सत्ताधारी दल की छात्र इकाई का हुआ सूपड़ा साफ
हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के बिड़ला परिसर और पौड़ी परिसर में हुए इन ताज़ा छात्रसंघ चुनावों को उत्तराखंड की मुख्य राजनीतिक धारा का प्रवेश द्वार माना जाता है, क्योंकि यहां से निकलने वाले छात्र नेता आगे चलकर राज्य की बड़ी सियासत संभालते हैं। इस बार के चुनाव परिणामों ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी गहरी सोच में डाल दिया है, क्योंकि भाजपा समर्थित छात्र संगठन एबीवीपी को यूनिवर्सिटी के कई प्रमुख पदों पर करारी हार का मुंह देखना पड़ा है। चुनावों की मतगणना जैसे-जैसे आगे बढ़ी, वैसे-वैसे विपक्षी और स्वतंत्र संगठनों के पक्ष में परिणाम आने शुरू हो गए, जिससे सत्ता के गलियारों में हलचल तेज हो गई। एनएसयूआई (NSUI) समर्थित उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरे मयंक बहुगुणा ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी एबीवीपी के प्रत्याशी को 300 से अधिक मतों के स्पष्ट अंतर से पछाड़ते हुए सचिव पद की कुर्सी पर कब्जा जमा लिया। इस चुनाव में न सिर्फ सचिव पद बल्कि अन्य प्रमुख सीटों पर भी गैर-एबीवीपी उम्मीदवारों के जीतने से यह साफ हो गया कि परिसरों के भीतर युवाओं की सोच और उनका मिजाज अब तेजी से बदल रहा है, जो आने वाले समय के बड़े राजनीतिक बदलावों का साफ संकेत दे रहा है।
पहाड़ी सियासत के बदलते समीकरण और इस शानदार जीत के दूरगामी राजनीतिक मायने
गढ़वाल सेंट्रल यूनिवर्सिटी के ये छात्रसंघ चुनाव केवल विश्वविद्यालयों की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इनका सीधा प्रभाव उत्तराखंड के राजनीतिक परिदृश्य पर पड़ता है, खासकर तब जब राज्य में विधानसभा चुनाव की आहट नजदीक हो। जिस क्षेत्र में यह यूनिवर्सिटी स्थित है, वहां से प्रदेश सरकार के कई दिग्गज मंत्री और रसूखदार नेता विधायक हैं, ऐसे में सत्तारूढ़ दल के गढ़ में इस प्रकार की चुनावी हार निश्चित रूप से संगठन स्तर पर आत्मમंथन का बड़ा विषय बन गई है। मयंक बहुगुणा की इस शानदार जीत को इसलिए भी ऐतिहासिक माना जा रहा है क्योंकि उन्होंने किसी बड़े राजनीतिक परिवार या रसूख के बल पर नहीं, बल्कि एक किसान परिवार के बेटे होने के बावजूद अपनी मेहनत, जुझारूपन और छात्रों के बीच लगातार बनी रही सक्रियता के दम पर यह मुकाम हासिल किया है। ग्रामीण और पर्वतीय पृष्ठभूमि से आने वाले युवाओं के लिए मयंक की यह सफलता एक मिसाल बन गई है, जो यह सिखाती है कि लोकतंत्र में आम आदमी की ताकत सबसे बड़ी होती है और दृढ़ इच्छाशक्ति से किसी भी बड़े से बड़े किले को ढहाया जा सकता है।