100 साल पुराना मंदिर हुआ जमींदोज, पाकिस्तान में प्रशासन पर उठे सवाल

100 साल पुराना मंदिर हुआ जमींदोज, पाकिस्तान में प्रशासन पर उठे सवाल

धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों और उनकी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को लेकर पाकिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर चर्चा में है। पंजाब प्रांत के नारोवाल जिले में एक सदी से भी अधिक पुराने धार्मिक स्थल के जमींदोज होने से स्थानीय अल्पसंख्यक आबादी के बीच गहरी चिंता फैल गई है।

लाहौर से लगभग 130 किलोमीटर की दूरी पर बसे सिराज गांव में स्थित यह देवस्थान लगभग 1000 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला हुआ था। घटना के बाद से क्षेत्र के गैर-मुस्लिम नागरिकों में अपनी सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक स्थलों की सुरक्षा को लेकर असुरक्षा का भाव गहराने लगा है।

विवाद का केंद्र: जमीन विस्तार या प्राकृतिक आपदा?

घटना को लेकर स्थानीय लोगों और प्रशासन के बीच गंभीर विरोधाभास देखने को मिल रहा है। स्थानीय सूत्रों और अल्पसंख्यक प्रतिनिधियों का कहना है कि निकटवर्ती धार्मिक मदरसे के विस्तार के उद्देश्य से इस प्राचीन ढांचे को नुकसान पहुंचाया गया। इस कृत्य के पीछे प्रतिबंधित संगठन तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) से संबंधित तत्वों की भूमिका होने की बात कही जा रही है।

चश्मदीदों के मुताबिक इमारत को गिराने के उपरांत वहां से धातु के कलश और निर्माण सामग्री को भी हटा दिया गया। दूसरी ओर सरकारी तंत्र इस घटना को भारी वर्षा का परिणाम बता रहा है।

प्रशासनिक विफलता पर अल्पसंख्यक समुदाय में रोष

सामुदायिक प्रतिनिधि रतन लाल ने इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ईटीपीबी) और स्थानीय प्रशासन की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि समय रहते सुरक्षा उपाय न किए जाने और अतिक्रमणकारियों पर लगाम न कसे जाने के कारण यह ऐतिहासिक धरोहर नष्ट हो गई। उन्होंने सरकार से मांग की है कि इस पवित्र स्थल का शीघ्र पुनर्निर्माण कराया जाए।

वहीं ईटीपीबी के प्रतिनिधि राणा इफ्तिखार का पक्ष है कि सरकारी अभिलेखों में इस ढांचे का नाम दर्ज नहीं था। उन्होंने इसे 100 से 125 वर्ष प्राचीन मानते हुए दोहराया कि इमारत अत्यधिक बारिश के चलते स्वतः धराशायी हुई है।