अमेरिका की वफादारी बनी मुनीर के लिए गले की फांस
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इस समय पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण एशिया तक भू-राजनीतिक समीकरण बेहद तेजी से बदल रहे हैं। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे शीत युद्ध और टकराव के माहौल में मध्यस्थ बनने की कोशिश करना पाकिस्तान के लिए भारी मुसीबत बनता जा रहा है। पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर द्वारा अमेरिका और तेहरान के बीच शांति स्थापित करने के लिए किए जा रहे प्रयास अब खुद उनके और उनके देश के गले की फांस बन चुके हैं। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका के प्रति अत्यधिक वफादारी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अनिश्चित नीतियों ने पाकिस्तान को एक ऐसी कूटनीतिक दलदल में धकेल दिया है, जहाँ से बाहर निकलना नामुमकिन सा प्रतीत हो रहा है।
अमेरिकी वफादारी का दिखावा और ट्रंप की रणनीतिक बेरुखी
विदेशी मामलों के जाने-माने एक्सपर्ट्स और प्रोफेसरों का कहना है कि पाकिस्तान ने वाशिंगटन को खुश करने के लिए अपनी तरफ से पूरी ताकत झोंक दी, लेकिन इसके बदले में उसे सिवाय निराशा के कुछ नहीं मिला। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के साथ करीबी बढ़ाने और उनकी हर बात पर मुहर लगाने के चक्कर में पाकिस्तान ने अपनी क्षेत्रीय साख दांव पर लगा दी है। अमेरिका की तरफ से पाकिस्तान को बड़े आर्थिक फंड और भारी मदद देने के लुभावने वादे किए गए थे, लेकिन जमीनी स्तर पर आज तक कोई ठोस मदद या राहत पैकेज इस्लामाबाद तक नहीं पहुंच पाया है। जानकारों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन अपनी कूटनीतिक चालों के तहत सिर्फ पाकिस्तान का इस्तेमाल कर रहा है, और जरूरत पूरी होने पर उसे दरकिनार करने में देर नहीं लगाएगा। यही वजह है कि अमेरिका की यह तथाकथित वफादारी अब जनरल असीम मुनीर के लिए ट्रंप से भी बड़ा संकट साबित हो रही है।
ईरान के साथ क्यों बढ़ा गहरा तनाव और क्यों भड़का तेहरान
अमेरिका के साथ नजदीकी बढ़ाने के इस खेल में पाकिस्तान ने अपने पड़ोसी देश ईरान का भरोसा पूरी तरह से खो दिया है। हाल ही में जब जनरल असीम मुनीर ने तेहरान का दौरा किया, तो उन्हें ईरान के तीखे तेवर और भारी नाराजगी का सामना करना पड़ा। ईरानी हुक्मरानों और मीडिया ने मुनीर के सामने कड़े सवाल खड़े किए। तेहरान का साफ कहना है कि जब पाकिस्तान अमेरिकी इशारों पर अपनी सीमाएं और बॉर्डर की आवाजाही बंद कर सकता है, तो वह एक निष्पक्ष और भरोसेमंद मध्यस्थ कैसे हो सकता है? इसके अलावा, सऊदी अरब के साथ पाकिस्तान के बढ़ते सैन्य समझौतों और मक्का पैक्ट को लेकर भी ईरान के भीतर गहरी बेचैनी और गुस्सा है। ईरान यह अच्छी तरह समझ चुका है कि पाकिस्तान पर्दे के पीछे अमेरिकी हितों को साधने का काम कर रहा है, जिससे दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक संबंधों में खटास आ गई है।
एक्सपर्ट्स की चेतावनी: पाकिस्तान के लिए आगे कुआं और पीछे खाई जैसी स्थिति
राजनीतिक विश्लेषकों और कूटनीति के जानकारों का यह स्पष्ट मानना है कि पाकिस्तान ने अमेरिका की सरपरस्ती हासिल करने के लिए जो अति-सक्रियता दिखाई है, उसके फायदे की सीमा अब समाप्त हो चुकी है। स्थिति यह बन चुकी है कि पाकिस्तान न तो अमेरिका का पूरी तरह भरोसा जीत पा रहा है और न ही अपने पड़ोसी मुल्कों को संतुष्ट कर पा रहा है। अमेरिका के साथ आंख मूंदकर चलने की नीति के कारण इस्लामाबाद क्षेत्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ता जा रहा है। एक तरफ जहां ईरान के साथ कूटनीतिक दूरियां बढ़ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ वाशिंगटन से भी अपेक्षित कूटनीतिक या आर्थिक लाभ न मिलने से पाकिस्तानी हुक्मरानों की मुश्किलें कई गुना बढ़ गई हैं। आने वाले दिनों में यह संकट पाकिस्तान की आंतरिक और बाहरी दोनों नीतियों को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है।