अमेरिका को ईरान युद्ध में लगा तगड़ा झटका: 45 घातक MQ-9 Reaper ड्रोन खाक, उड़े ट्रंप के होश

अमेरिका को ईरान युद्ध में लगा तगड़ा झटका: 45 घातक MQ-9 Reaper ड्रोन खाक, उड़े ट्रंप के होश

अमेरिका और ईरान के बीच पिछले पांच महीनों से जारी तनाव और खूनी संघर्ष में अमेरिकी सेना (US Military) को एक बड़ा डेंट लगा है। वॉशिंगटन पोस्ट की एक हालिया और चौंकाने वाली रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान अमेरिका ने अपने निगरानी और हमले करने वाले लगभग 45 बेहद घातक एमक्यू-9 रीपर (MQ-9 Reaper) ड्रोन खो दिए हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि इनमें से कुछ ड्रोन दुश्मन के हमलों में मार गिराए गए हैं, जबकि कुछ तकनीकी खराबी या कंट्रोल रूम से संपर्क टूटने के कारण क्रैश हो गए।

5 महीने में तबाह हुआ 25% ड्रोन बेड़ा

इस युद्ध ने पेंटागन (Pentagon) के रणनीतिकारों की चिंता बढ़ा दी है। इस साल की शुरुआत में जब ईरान के साथ सीधी जंग के हालात बने थे, तब अमेरिका के पास कुल 185 रीपर ड्रोन का मजबूत बेड़ा मौजूद था। इनमें से 165 अमेरिकी वायु सेना (USAF) और 20 मरीन कॉर्प्स के पास थे। अब महज पांच महीनों के भीतर अमेरिका ने अपने कुल बेड़े का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा गवां दिया है, जो किसी भी सैन्य अभियान के लिहाज से एक बहुत बड़ा नुकसान माना जाता है।

करदाताओं पर पड़ा 1.3 अरब डॉलर का सीधा बोझ

आधुनिक तकनीक से लैस एक एमक्यू-9 रीपर ड्रोन की कीमत करोड़ों में होती है। वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, 45 ड्रोन्स के नष्ट होने से अमेरिकी खजाने को करीब 1.3 अरब डॉलर का सीधा नुकसान हुआ है। यह भारी भरकम आर्थिक नुकसान अंततः अमेरिकी करदाताओं (Taxpayers) की जेब पर ही बोझ बनकर गिरेगा।

रीपर ड्रोन: अमेरिका का 'ब्रह्मास्त्र' और भारत से मेगा डील

साल 2007 में जब से MQ-9 Reaper ड्रोन को अमेरिकी सेना में शामिल किया गया है, तब से यह आतंकवाद और समुद्री डकैती विरोधी अभियानों में अमेरिका का सबसे भरोसेमंद हथियार रहा है। अफगानिस्तान, इराक, सीरिया और यमन जैसे देशों में अमेरिका ने इसका भरपूर इस्तेमाल किया है।

भारतीय संदर्भ की बात करें तो, 2024 में भारत और अमेरिका के बीच 31 रीपर ड्रोन खरीदने का एक अहम रक्षा समझौता हुआ है। उम्मीद है कि 2029 से भारत को इन ड्रोन्स की डिलीवरी मिलने लगेगी। डील के तहत भारतीय सेना और वायु सेना को 8-8 जबकि भारतीय नौसेना को समुद्री सुरक्षा के लिए 15 रीपर ड्रोन दिए जाएंगे। अहम बात यह है कि 10 ड्रोन सीधे उड़ान भरने की स्थिति में आएंगे, जबकि बाकी 21 ड्रोन्स को मेक इन इंडिया के तहत भारत में ही असेंबल किया जाएगा।

युद्ध की बेतहाशा लागत और पीछे हटने की तैयारी में अमेरिका?

वॉशिंगटन पोस्ट की इस रिपोर्ट ने अमेरिका में ईरान युद्ध की लागत को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। पिछले महीने (जुलाई में) अमेरिकी युद्ध सचिव पीट हेगसेथ ने भी माना था कि ईरान के साथ इस जंग में अमेरिका अब तक 37.5 अरब डॉलर खर्च कर चुका है। इसके साथ ही उन्होंने कांग्रेस से 87 अरब डॉलर के अतिरिक्त फंड की गुहार लगाई थी ताकि सैनिकों को वेतन देने और हथियारों की सप्लाई में कोई रुकावट न आए।

बढ़ते आर्थिक और सैन्य नुकसान को देखते हुए, कई रिपोट्स दावा कर रही हैं कि अब अमेरिका इस युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता खोज रहा है। डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को खोलने की शर्त पर बिना किसी नए परमाणु समझौते के भी युद्ध रोकने को तैयार दिख रहा है। हालांकि, दूसरी ओर ईरान के तेवर अब भी आक्रामक हैं और उसने ऐलान कर दिया है कि वह 2028 में ट्रंप का कार्यकाल खत्म होने तक यह संघर्ष जारी रखने का माद्दा रखता है।