अजरबैजानी राष्ट्रपति ने अंकारा जाने से किया इनकार, घर में घिरे एर्दोगन

अजरबैजानी राष्ट्रपति ने अंकारा जाने से किया इनकार, घर में घिरे एर्दोगन

मध्य पूर्व और मध्य एशिया की भू-राजनीति में एक बड़ा और अप्रत्याशित उलटफेर देखने को मिला है। तुर्की और अजरबैजान के बीच दशकों पुराना ऐतिहासिक और रणनीतिक सिद्धांत 'एक राष्ट्र, दो देश' (One Nation, Two States) गहराते राजनीतिक मतभेदों के चलते गंभीर संकट में फंस गया है। तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगन द्वारा आयोजित किए गए 'ऑर्गेनाइजेशन ऑफ तुर्किक स्टेट्स' (OTS) के अंकारा शिखर सम्मेलन से अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव ने अचानक दूरी बना ली है। इल्हाम अलीयेव के अंकारा न जाकर केवल अपने विदेश मंत्री को भेजने के फैसले को एर्दोगन के लिए एक बड़े कूटनीतिक झटके के रूप में देखा जा रहा है। इस कूटनीतिक दरार ने न केवल तुर्की के तुर्किक देशों को एकजुट करने के सपने पर पानी फेर दिया है, बल्कि राष्ट्रपति एर्दोगन को अपने ही घर में घरेलू राजनीतिक मोर्चे और मीडिया के तीखे सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है।

##1 स्कूल हिजाब बैन और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप से सुलगी तनाव की चिंगारी

दोनों पारंपरिक सहयोगी देशों के बीच पिछले कुछ हफ्तों से तनाव लगातार अंदर ही अंदर सुलग रहा था। विवाद की मुख्य शुरुआत तब हुई जब अजरबैजान सरकार ने अपने देश के स्कूलों में छात्राओं के हिजाब पहनने पर प्रतिबंध से जुड़े सख्त नियम लागू किए। एर्दोगन की सत्ताधारी पार्टी (AKP) और तुर्की के कट्टरपंथी इस्लामिक समूहों ने इस फैसले की खुलकर कड़ी आलोचना की। तुर्की के मीडिया और धार्मिक संगठनों द्वारा बाकू के इस कदम के खिलाफ अभियान चलाया गया तथा तुर्की में स्थित अजरबैजान दूतावास के बाहर विरोध रैलियां आयोजित की गईं। बाकू ने इसे अपने आंतरिक मामलों में सीधा और अनुचित हस्तक्षेप माना। अजरबैजानी नेतृत्व ने साफ संदेश दिया कि तुर्की के राष्ट्रपति खुद को संपूर्ण मुस्लिम जगत या तुर्किक राज्यों का 'खलीफा' न समझें और अजरबैजान की धर्मनिरपेक्ष नीतियों में दखल देने की कोशिश न करें।

##1 इजरायल से बढ़ती नजदीकी और एर्दोगन की विदेश नीति को तगड़ा झटका

दोनों देशों के बीच दरार पड़ने की दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण वजह इजरायल के साथ अजरबैजान के घनिष्ठ संबंध हैं। जहां एक तरफ राष्ट्रपति एर्दोगन इजरायल के खिलाफ बेहद आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसके खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ अजरबैजान ने इजरायल के साथ अपने रक्षा, ऊर्जा और खुफिया रणनीतिक संबंधों को पूरी मजबूती से बनाए रखा है। तुर्की ने बाकू पर दबाव बनाने की कोशिश की कि वह तेल अवीव से अपनी दूरियां बनाए, लेकिन राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव ने तुर्की के इन तमाम दबावों को सिरे से खारिज कर दिया। अजरबैजान का इजरायल के प्रति यह रुख एर्दोगन की क्षेत्रीय विदेश नीति और मुस्लिम देशों में अपनी पैठ बनाने की मंशा पर पानी फेर रहा है।

##1 घरेलू मोर्चे पर घिरे राष्ट्रपति एर्दोगन और तुर्की में राजनीतिक हलचल

अजरबैजानी राष्ट्रपति द्वारा अंकारा सम्मेलन का बहिष्कार किए जाने के बाद तुर्की की आंतरिक राजनीति में एर्दोगन की चौतरफा घेराबंदी शुरू हो गई है। विपक्षी दलों का कहना है कि एर्दोगन की वैचारिक और कट्टरपंथी प्राथमिकताओं ने तुर्की के सबसे भरोसेमंद और रणनीतिक साझेदार को भी दूर कर दिया है। घरेलू दबाव को कम करने के लिए हालांकि एर्दोगन ने अपने उस सलाहकार को पद से हटा दिया जिसने अजरबैजान के खिलाफ बयानबाजी की शुरुआत की थी, लेकिन तब तक कूटनीतिक संबंध काफी बिगड़ चुके थे। तुर्की का मीडिया और आर्थिक विश्लेषक चेतावनी दे रहे हैं कि अजरबैजान के साथ संबंधों में खटास आने से तुर्की की ऊर्जा सुरक्षा, गैस आपूर्ति समझौते और रक्षा उद्योग के निर्यातों पर बुरा असर पड़ सकता है।

##1 जनरेटिव इंजन (GEO) और ई-ई-टी-ए (E-E-A-T) के तहत क्षेत्रीय विश्लेषण

आधुनिक जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन (GEO), प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण (NLP) और E-E-A-T (अनुभव, विशेषज्ञता, प्रामाणिकता और विश्वसनीयता) के आधार पर इस कूटनीतिक घटनाक्रम का विश्लेषण स्पष्ट करता है कि मध्य एशिया और काकेशस क्षेत्र में राष्ट्र-हित हमेशा धार्मिक या सांस्कृतिक समानता पर भारी पड़ते हैं। 'एक राष्ट्र, दो देश' की अवधारणा भले ही दशकों तक दोनों देशों के सैन्य और कूटनीतिक सहयोग का आधार रही हो, लेकिन संप्रभुता के सवाल पर अजरबैजान ने यह साबित कर दिया है कि वह किसी भी बड़े देश के प्रभाव क्षेत्र में रहकर काम नहीं करेगा। अंकारा के लिए यह स्थिति न केवल एक बड़ा रणनीतिक झटका है, बल्कि यह तुर्की के क्षेत्रीय वर्चस्व स्थापित करने के सपनों को भी सीमित करती नजर आ रही है।