बलूचिस्तान बना पाकिस्तानी सेना का कब्रिस्तान, BLA के खूंखार हमलों से थर्राया पाकिस्तान
दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक मानचित्र पर इस समय एक बहुत बड़ा और विस्फोटक बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां पाकिस्तान का सबसे बड़ा और संसाधन-संपन्न प्रांत बलूचिस्तान अब उसकी ही सेना के लिए एक ऐसा नासूर और डरावना कब्रिस्तान बन चुका है, जिससे पार पाना पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान और रावलपिंडी के जनरलों के बस की बात अब बिल्कुल नहीं रही है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर और पाकिस्तानी सैन्य कमान के माथे पर इस वक्त गहरी शिकन और भयंकर तनाव साफ तौर पर देखा जा सकता है, क्योंकि जिस बलूचिस्तान की धरती पर दशकों से पाकिस्तानी हुक्मफिरोजों ने संसाधनों की लूट और दमन चक्र चला रखा था, वही जमीन अब उनके सैनिकों के लिए काल बन चुकी है। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी यानी BLA के फिदायीन दस्तों और घातक यूनिटों ने जिस प्रकार से पाकिस्तानी सुरक्षा बलों और सैन्य काफिलों को चुन-चुनकर निशाना बनाना शुरू किया है, उससे पाकिस्तानी सेना का मनोबल पूरी तरह टूट चुका है और बूँद-बूँद खून के लिए पाकिस्तानी फौज अब अंदर ही अंदर गिड़गिड़ाने और शांति की भीख मांगने पर मजबूर हो गई है।
पाकिस्तान के इतिहास का सबसे भीषण दौर और बलूच विद्रोहियों का खौफनाक कहर
पाकिस्तान के भीतरूनी हालात इस समय इस कदर बेकाबू हो चुके हैं कि राज्य की सत्ता और तोप-बंदूक का डर अब बलूच अवाम और वहां के स्वतंत्रता सेनानियों के दिलों से पूरी तरह खत्म हो चुका है। इतिहास के पन्नों को पलटा जाए तो पता चलता है कि किस तरह पाकिस्तानी हुकूमत ने साल 1948 से ही बलूचिस्तान पर जबरन कब्जा जमाया हुआ है और तब से लेकर आज तक वहां के स्थानीय नागरिकों के बुनियादी अधिकारों का गला घोंटा जा रहा है। इस क्षेत्र में अकूत प्राकृतिक गैस, सोना, तांबा और खनिज होने के बावजूद यहां के मूल बाशिंदों को दो जून की रोटी और विकास के नाम पर केवल प्रताड़ना, अपहरण, गायब किए जाने की घटनाएं और गोलियां ही मिली हैं। लेकिन अब बलूच युवाओं ने अन्याय के इस अंधकार के खिलाफ अपनी खुद की तकदीर लिखने का बीड़ा उठा लिया है और बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) के रूप में एक ऐसा फौलादी प्रतिरोध खड़ा कर दिया है, जिसके आगे दुनिया भर में अपनी धौंस जमाने वाली पाकिस्तानी फौज पूरी तरह असहाय और लाचार नजर आ रही है। प्रांत के कोने-कोने से लगातार आ रही ताबूतों की लाइनें और जलते हुए सैन्य वाहनों की तस्वीरें इस बात की गवाही दे रही हैं कि पाकिस्तान का यह साम्राज्य भीतर से पूरी तरह खोखला हो चुका है और उसकी दमनकारी नीतियों का अंत अब बहुत करीब आ चुका है।
BLA के घातक हमलों ने उड़ाई रावलपिंडी की नींद, जनरल आसिम मुनीर की बढ़ी मुश्किलें
पिछले कुछ हफ्तों और महीनों के दौरान बलूचिस्तान की वादियों में जिस बड़े पैमाने पर पाकिस्तानी सेना पर हमले हुए हैं, उन्होंने रक्षा विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय रणनीतिकारों को भी हैरान करके रख दिया है। BLA के विशेष दस्तों ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हाइवे, रेलवे लाइनों, सैन्य छावनियों और कन्वेय पर एक साथ कई कोऑर्डिनेटेड हमले बोलकर पाकिस्तानी सेना को गहरी नींद से झकझोर कर रख दिया है। एक के बाद एक कई सैन्य अभियानों में दर्जनों पाकिस्तानी सैनिकों और कमांडरों के मारे जाने की पुष्ट खबरों ने रावलपिंडी के जनरल मुख्यालय (GHQ) में तहलका मचा दिया है। आलम यह है कि पाकिस्तानी सैनिक अब बलूचिस्तान के दूरदराज इलाकों में गश्त पर जाने से भी कतराने लगे हैं, क्योंकि उन्हें हर एक चट्टान और हर एक मोड़ पर मौत मंडराती हुई दिखाई देती है। जनरल आसिम मुनीर और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार ने इस आंतरिक विद्रोह को कुचलने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी, आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल किया और दमन के तमाम पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए, लेकिन इसके बावजूद बलूच लड़ाकों के हौसले और उनकी सामरिक बढ़त पर कोई असर नहीं पड़ा, बल्कि उनका प्रतिरोध हर गुजरते दिन के साथ और अधिक आक्रामक और घातक होता चला गया।
पाकिस्तानी सेना की लाचारी और शांति की गुहार के पीछे की असली भू-राजनीतिक मजबूरी
जब किसी देश की सेना अपने ही देश के एक भूभाग पर जनता के विद्रोह को दबाने में पूरी तरह असफल हो जाती है और उसे लगातार भारी जानी नुकसान का सामना करना पड़ता है, तब उसका पतन निश्चित माना जाता है और आज पाकिस्तान ठीक इसी मुहाने पर खड़ा होकर हांफ रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हमेशा अपनी मजबूत और आक्रामक छवि दिखाने वाला पाकिस्तान अंदरखाने इस बात को अच्छी तरह समझ चुका है कि अगर बलूचिस्तान का यह संघर्ष और कुछ समय तक इसी तीव्रता के साथ जारी रहा, तो देश को टूटने से कोई नहीं रोक सकता। यही वजह है कि पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व अब गुप्त चैनलों के माध्यम से और परोक्ष रूप से इस बात के लिए गिड़गिड़ाने लगा है कि किसी तरह बलूच विद्रोही शांत हो जाएं और क्षेत्र में संघर्ष विराम या शांति स्थापित हो सके। हालांकि, बलूचिस्तान की जनता और BLA साफ तौर पर कह चुकी है कि अब बहुत देर हो चुकी है और वे आधे-अधूरे समझौतों या झूठे वादों के झांसे में आने वाले नहीं हैं, क्योंकि उनका एकमात्र अंतिम लक्ष्य अपनी मातृभूमि को पाकिस्तानी कब्जे से पूरी तरह आजाद कराना है। इस बदलते हुए क्षेत्रीय समीकरण ने यह साबित कर दिया है कि बलपूर्वक किसी भी क्षेत्र पर अधिकार बनाए रखने की पाकिस्तानी जिद्द अब उसके खुद के वजूद को दीमक की तरह चाट रही है और आने वाले दिनों में यह संकट पाकिस्तान के विघटन का सबसे बड़ा कारण बन सकता है।