मोंगला पोर्ट पर चीन का शिकंजा, दक्षिण एशिया में कूटनीतिक गर्मी बढ़ी

मोंगला पोर्ट पर चीन का शिकंजा, दक्षिण एशिया में कूटनीतिक गर्मी बढ़ी

दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक बार फिर बड़ा उबाल देखने को मिल रहा है, जब बांग्लादेश की सरकार ने अपने दूसरे सबसे बड़े समुद्री बंदरगाह 'मोंगला पोर्ट' (Mongla Port) के आधुनिकीकरण और विस्तार के लिए चीन के एक्सपोर्ट-इंपोर्ट बैंक (Exim Bank) के साथ 335.78 मिलियन डॉलर (लगभग 3,223 करोड़ रुपये) का भारी-भरकम रियायती कर्ज समझौता कर लिया है। पशुर नदी के पूर्वी किनारे पर स्थित यह रणनीतिक बंदरगाह भारतीय सीमा से केवल 80 किलोमीटर पश्चिम में स्थित है।

इस विशाल वित्तीय समझौते के बाद कूटनीतिक गलियारों में हलचल इसलिए तेज हो गई है, क्योंकि कुछ ही समय पहले बांग्लादेश ने इसी मोंगला बंदरगाह के पास भारत को दिए गए 110 एकड़ के विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया था। भारत के उस प्रोजेक्ट को किनारे कर अब चीन के पैसों से बंदरगाह का कायाकल्प करने का फैसला कई तरह के गंभीर रणनीतिक और सुरक्षा सवाल खड़े कर रहा है।

क्या भारत को घेरने की चाल है? 2 प्रतिशत ब्याज पर चीन का 3,200 करोड़ का कर्ज

बांग्लादेश के वित्त मंत्रालय के आर्थिक संबंध विभाग (ERD) और चीनी बैंक के बीच हस्ताक्षरित इस डील के तहत चीन यह कर्ज 2 प्रतिशत की बेहद रियायती ब्याज दर पर दे रहा है। इस कर्ज को चुकाने के लिए बांग्लादेश को 20 साल की लंबी समय अवधि दी गई है, जिसमें शुरुआती 5 साल का ग्रेस पीरियड भी शामिल है।

इस चीनी फंड का इस्तेमाल मोंगला पोर्ट पर दो अत्याधुनिक कंटेनर टर्मिनल बनाने, विशाल यार्ड तैयार करने और भारी-भरकम आधुनिक क्रेन मशीनरी स्थापित करने के लिए किया जाएगा। पहली नजर में इसे बुनियादी ढांचे का विकास बताया जा रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि जब-जब चीन किसी देश में विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के नाम पर कर्ज बांटता है, तब-तब उस इलाके में उसकी सैन्य और जासूसी मौजूदगी का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। भारतीय सीमा के बेहद करीब होने के कारण भारत सरकार और रक्षा विशेषज्ञ इस पूरे घटनाक्रम पर कड़ी नजर रख रहे हैं।

भारत का प्रोजेक्ट रद्द और चीन की एंट्री, जानिए इसके पीछे का पूरा क्रोनोलॉजी

मोंगला बंदरगाह की कहानी भारत और बांग्लादेश के रिश्तों के लिहाज से काफी संवेदनशील रही है। साल 2015 में दोनों देशों के बीच हुए समझौते के तहत भारत को मोंगला पोर्ट के पास 110 एकड़ जमीन पर आर्थिक क्षेत्र विकसित करने का अधिकार मिला था, जिसके लिए हीरानंदानी ग्रुप की कंपनी को चुना गया था। लेकिन बांग्लादेश में राजनीतिक फेरबदल के बाद वहां की अंतरिम व्यवस्था ने समय सीमा का हवाला देते हुए भारत के इस महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया था।

इसके ठीक बाद, बांग्लादेशी नेतृत्व की बीजिंग यात्रा और चीनी अधिकारियों के साथ हुई बैठकों के बाद इतनी तेजी से चीनी कर्ज समझौते पर मुहर लग जाना यह साफ दर्शाता है कि ढाका अब बीजिंग के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों को नई धार देने की कोशिश में है। भारत पहले भी बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) और भारतीय उपमहाद्वीप के आसपास चीन की बढ़ती 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' (String of Pearls) यानी घेराबंदी वाली नीति पर अपनी गंभीर चिंताएं जता चुका है।

बंगाल की खाड़ी में पावर गेम, भारत के लिए क्या हैं रणनीतिक चुनौतियां?

मोंगला पोर्ट का विस्तार बांग्लादेश के लिए भले ही व्यापारिक और लॉजिस्टिक्स के मोर्चे पर एक बड़ा कदम हो, लेकिन हिंद महासागर क्षेत्र (Indian Ocean Region) की सुरक्षा के लिहाज से यह बेहद संवेदनशील मोड़ है। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों (North East India) की सुरक्षा और सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के करीब चीनी प्रभाव का बढ़ना भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

यदि भविष्य में चीन इस व्यापारिक बंदरगाह का इस्तेमाल अपने दोहरे उपयोग (Dual-use) यानी सैन्य या जासूसी जहाजों की आवाजाही के लिए करता है, तो यह बंगाल की खाड़ी में भारत के नौसैनिक दबदबे को सीधी चुनौती होगी। भारत अब अपने पड़ोसी देश की इस नई बीजिंग-परस्त आर्थिक नीति का मुकाबला करने के लिए अपनी कूटनीतिक रणनीतियों और तटीय सुरक्षा को और ज्यादा मजबूत करने की तैयारी में जुट गया है।