'ग्रीन एनर्जी' की आड़ में तिब्बत को 'पावर बेस' बना रहा चीन, बनाई 'ग्रे जोन' रणनीति

'ग्रीन एनर्जी' की आड़ में तिब्बत को 'पावर बेस' बना रहा चीन, बनाई 'ग्रे जोन' रणनीति

'ग्रीन एनर्जी' की आड़ में तिब्बत को 'पावर बेस' बना रहा चीन, भारत-नेपाल और भूटान के लिए खतरे की घंटी; बनाई 'ग्रे जोन' रणनीति

अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति के गलियारों में इन दिनों एक बेहद खतरनाक और चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है, जो भारत और उसके पड़ोसी देशों के लिए किसी बड़ी रणनीतिक चुनौती से कम नहीं है। दुनिया की निगाहों से दूर और हिमालय की बर्फीली वादियों के आगोश में चीन एक ऐसी खामोश साजिश को अंजाम दे रहा है, जिसके दूरगामी परिणाम पूरे दक्षिण एशिया की सुरक्षा व्यवस्था को हिला कर रख सकते हैं। पर्यावरण संरक्षण और 'ग्रीन एनर्जी' यानी हरित ऊर्जा के नाम पर चीन तिब्बत के संवेदनहीन और नाजुक भौगोलिक क्षेत्र को एक विशालकाय 'पावर बेस' में तब्दील करने में जुटा हुआ है। ड्रैगन की इस नई चाल के पीछे केवल बिजली उत्पादन का उद्देश्य नहीं है, बल्कि इसके जरिए भारत, नेपाल और भूटान की सीमाओं पर एक स्थायी और खतरनाक दबाव बनाने की सोची-समझी रणनीति तैयार की गई है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की यह तथाकथित विकास परियोजनाएं वास्तव में उसकी एक बड़ी 'ग्रे जोन' वॉरफेयर स्ट्रैटेजी का हिस्सा हैं, जो भविष्य में क्षेत्रीय स्थिरता के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित हो सकती हैं।

पर्यावरण और हरित ऊर्जा का मुखौटा: आखिर क्यों तिब्बत के पठारों पर मेगा डैम्स का जाल बिछा रहा है ड्रैगन?

चीन दुनिया के सामने अपनी छवि एक पर्यावरण-अनुकूल देश के रूप में पेश करने के लिए लगातार रिन्यूएबल एनर्जी और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स का ढिंढोरा पीटता रहता है। इसी मुखौटे का इस्तेमाल करते हुए उसने तिब्बत के ऊंचे और दुर्गम पठारों पर विशालकाय हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स, जलविद्युत बांधों और ट्रांसमिशन ग्रिड्स का एक ऐसा जाल बिछाना शुरू कर दिया है, जिसकी कल्पना करना भी आम इंसान के लिए मुश्किल है। यालुंग त्संगपो यानी ब्रह्मपुत्र नदी और अन्य प्रमुख एशियाई नदियों के उद्गम स्थलों पर बनाए जा रहे ये मेगा स्ट्रक्चर्स चीन को पानी के प्राकृतिक प्रवाह पर पूर्ण नियंत्रण देने का काम कर रहे हैं। बीजिंग भले ही इसे अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने का माध्यम बताए, लेकिन भू-रणनीतिक विश्लेषक इस बात से भली-भांति वाकिफ हैं कि इन परियोजनाओं का असली मकसद चीन की सैन्य छावनियों को निर्बाध बिजली आपूर्ति देना और दुर्गम पर्वतीय इलाकों में अपनी सामरिक पकड़ को और अधिक मजबूत करना है। प्रकृति की कीमत पर चल रहा यह सुनियोजित निर्माण कार्य न केवल तिब्बत की नाजुक पारिस्थितिकी को नष्ट कर रहा है, बल्कि निचले इलाकों में बसने वाले देशों के लिए भी तबाही का स्थायी खतरा पैदा कर रहा है।

भारत, नेपाल और भूटान के लिए अलार्मिंग बेल: पानी के हथियार और 'वाटर वॉर' का खतरनाक ब्लूप्रिंट

तिब्बत में खड़े किए जा रहे इस विशाल पावर बेस का सबसे सीधा और गंभीर असर भारत, नेपाल और भूटान जैसे देशों पर पड़ने वाला है। चीन जिस तरह से ट्रांस-बाउंड्री नदियों के बहाव को मोड़ने और उन पर बड़े बांध बनाने की नीति पर काम कर रहा है, उससे भविष्य में भारत के पूर्वोत्तर राज्यों और बांग्लादेश में या तो भयंकर सूखा पड़ने की आशंका है या फिर अचानक कृत्रिम बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। इसे आधुनिक कूटनीति की भाषा में 'हाइड्रोलॉजिकल वॉरफेयर' यानी जल युद्ध कहा जाता है, जहां पानी को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा, इन पावर प्रोजेक्ट्स की आड़ में चीन तिब्बत की सीमा के पास अपने मिलिट्री बेस, रडार स्टेशन, और भारी सैन्य उपकरणों के लिए चार्जिंग व कम्यूनिकेशन हब विकसित कर रहा है। नेपाल और भूटान जैसे छोटे पड़ोसी देश अपनी भौगोलिक स्थिति और आर्थिक मजबूरियों के चलते खुलकर इसका विरोध नहीं कर पा रहे हैं, जिसका पूरा फायदा चीन अपनी विस्तारवादी महत्वकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उठा रहा है।

'ग्रे जोन' रणनीति का नया अध्याय: बिना गोली चलाए सीमाओं पर आधिपत्य जमाने की खौफनाक चीनी चाल

सीमाओं पर सीधे युद्ध लड़ने के बजाय बिना हथियार उठाए और बिना कोई प्रत्यक्ष गोली चलाए दुश्मन देश को मानसिक, आर्थिक और भौगोलिक रूप से पंगु बना देना ही चीन की आधुनिक 'ग्रे जोन' रणनीति का मुख्य आधार है। तिब्बत को एक हाइटेक पावर बेस में बदलना इसी ग्रे जोन वॉरफेयर का सबसे पुख्ता उदाहरण है, जहां बुनियादी ढांचे के विकास के नाम पर रणनीतिक ठिकानों का जाल बिछाया जा रहा है। चीनी सेना PLA इन ऊर्जा संयंत्रों और ट्रांसमिशन लाइनों का इस्तेमाल अपने फॉरवर्ड पोस्ट्स को अत्यधिक ठंड और विपरीत मौसम में भी सक्रिय रखने के लिए करेगी। भारत के सुरक्षा प्रतिष्ठान चीन की इस दोहरी चाल पर बेहद बारीकी से नजर बनाए हुए हैं और अपनी उत्तरी सीमाओं पर बुनियादी ढांचे को तेजी से मजबूत कर रहे हैं। ड्रैगन की यह चाल भले ही बहुत चालाकी से चली गई हो, लेकिन भारत की सतर्कता और सामरिक तैयारियों ने उसके मंसूबों को भांप लिया है, जिससे यह साफ हो गया है कि दक्षिण एशिया में चीन की मनमानी अब उतनी आसान नहीं रहने वाली है जितनी वह सोच रहा था।