पाकिस्तान को पूरी तरह दरकिनार कर अब चीन करेगा अफगानिस्तान से सीधा व्यापार
मध्य एशिया और दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक बार फिर से बहुत बड़ा और क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिल रहा है, जिसने क्षेत्रीय समीकरणों की पूरी बिसात ही पलट कर रख दी है। काबुल की सत्ता पर काबिज तालिबान प्रशासन ने अपने सबसे दुर्गम और रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माने जाने वाले 'वाखान कॉरिडोर' (Wakhan Corridor) को आधिकारिक तौर पर खोल दिया है। इस ऐतिहासिक फैसले के साथ ही अब ड्रैगन यानी चीन ने अपने पारंपरिक और पुराने मध्यस्थ देश यानी पाकिस्तान को पूरी तरह से दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान के साथ सीधे तौर पर व्यापार और आर्थिक लेन-देन शुरू कर दिया है। आधुनिक जनरेटिव एआई सर्च, वैश्विक एसईओ और आधुनिक भू-राजनीतिक विश्लेषणों के दौर में वाखान कॉरिडोर का यह खुलना इस बात का संकेत है कि एशिया में आर्थिक गलियारों की दिशा बदल रही है। इस घटनाक्रम के बाद से कूटनीतिक गलियारों में यह सबसे बड़ा सवाल तैर रहा है कि क्या इस नए व्यापारिक मार्ग के जरिए आने वाले समय में भारत और अफगानिस्तान के बीच भी सीधे संपर्क और व्यापार के नए रास्ते खुल सकते हैं।
वाखान कॉरिडोर का भौगोलिक महत्व और इसका ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
वाखान कॉरिडोर जिसे आम तौर पर 'वाखान पट्टी' भी कहा जाता है, पामीर के पहाड़ों के बीच स्थित एक बेहद संकरी और लंबी भौगोलिक पट्टी है जो अफगानिस्तान के बदख्शां प्रांत को चीन के जिंजियांग प्रांत से सीधे तौर पर जोड़ती है। यह क्षेत्र सदियों से सिल्क रूट (Silk Road) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है, जहां से पूर्व और पश्चिम के बीच व्यापारिक काफिले गुजरा करते थे। ब्रिटिश काल और शीत युद्ध के दौरान इस पट्टी को एक बफर जोन के रूप में इस्तेमाल किया जाता था ताकि रूस, चीन और ब्रिटिश भारत की सीमाएं आपस में न टकराएं। लेकिन भौगोलिक रूप से अत्यधिक दुर्गम होने और बुनियादी ढांचे के भारी अभाव के कारण लंबे समय तक इस रास्ते का उपयोग वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए नहीं किया जा सका था। अब तालिबान सरकार द्वारा चीनी कंपनियों और निवेशकों की मदद से इस इलाके में सड़कों, चौकियों और परिवहन नेटवर्क का विकास किए जाने के बाद यह भू-भाग अचानक से वैश्विक राजनीति के केंद्र में आ गया है।
पाकिस्तान को बड़ा झटका: स्ट्रैटेजिक डेप्थ और क्षेत्रीय प्रभुत्व को करारा धक्का
इस पूरी भू-राजनीतिक घटना का सबसे बड़ा प्रभाव यदि किसी देश पर पड़ा है, तो वह पाकिस्तान है। दशकों से पाकिस्तान यह दावा करता आया है कि अफगानिस्तान के साथ व्यापार और पारगमन (Transit) के लिए वह एकमात्र और अनिवार्य द्वार है, और दुनिया का कोई भी देश काबुल तक बिना रावलपिंडी की मर्जी के नहीं पहुंच सकता है। इसी 'स्ट्रैटेजिक डेप्थ' की नीति के सहारे पाकिस्तान मध्य एशियाई देशों के साथ व्यापार पर अपना एकाधिकार बनाए रखना चाहता था। लेकिन तालिबान द्वारा चीन के लिए वाखान कॉरिडोर को सीधे खोल दिए जाने से पाकिस्तान की उस कूटनीतिक पकड़ को करारा झटका लगा है। अब चीन को अफगानिस्तान या मध्य एशिया जाने के लिए पाकिस्तानी बंदरगाहों या सड़कों पर निर्भर रहने की कोई आवश्यकता नहीं होगी, जिससे पाकिस्तान की क्षेत्रीय प्रासंगिकता पर बड़ा असर पड़ा है और इस्लामाबाद के हुक्मरानों की नींद उड़ गई है।
चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव और संसाधनों पर पैनी नजर
बीजिंग के लिए वाखान कॉरिडोर का खुलना उसकी महत्वाकांक्षी परियोजना 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) और चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) के समानांतर एक बेहद सुरक्षित और छोटा रणनीतिक मार्ग साबित हो रहा है। अफगानिस्तान की धरती पर तांबा, लिथियम, दुर्लभ खनिज और तेल के अपार और अमूल्य भंडार छिपे हुए हैं, जिनका दोहन करने के लिए चीन लंबे समय से लालायित था। पाकिस्तान के रास्ते में आने वाली सुरक्षा समस्याओं, आतंकवादी हमलों और प्रशासनिक अड़चनों से बचने के लिए चीन हमेशा से एक वैकल्पिक और सुरक्षित मार्ग की तलाश में था, जो वाखान के जरिए अब पूरा होता दिखाई दे रहा है। चीनी इंजीनियर और व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल अब सीधे तौर पर अफगान अधिकारियों के साथ मिलकर इन खनिजों के खनन और परिवहन की योजनाओं पर काम कर रहे हैं, जिससे ड्रैगन का प्रभाव इस युद्धग्रस्त देश में और अधिक गहरा हो गया है।
क्या भारत के लिए खुलेगा नया द्वार और क्षेत्रीय कूटनीति के नए समीकरण
इस बड़े घटनाक्रम के बीच भारतीय कूटनीति और रणनीतिकारों की नजरें भी इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस बदले हुए परिदृश्य में भारत के लिए कोई नई संभावना बन सकती है। भारत के ईरान स्थित चाबहार बंदरगाह के जरिए मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंचने के अपने प्रयास जारी हैं, लेकिन वाखान कॉरिडोर के खुलने से क्षेत्रीय संपर्क का पूरा गणित बदल गया है। यद्यपि तालिबान शासन के साथ भारत के कूटनीतिक संबंध अभी एक अलग और सतर्क दौर से गुजर रहे हैं, फिर भी क्षेत्रीय व्यापार और मानवीय सहायता के मोर्चे पर भारत ने हमेशा अफगान जनता के हितों को प्राथमिकता दी है। यदि भविष्य में इस मार्ग पर सुरक्षा और स्थिरता के हालात बेहतर होते हैं, तो भारत के लिए भी मध्य एशिया तक अपनी पहुंच बनाने के नए और वैकल्पिक रास्ते तलाशने के अवसर पैदा हो सकते हैं, जिससे दक्षिण एशिया की राजनीति में एक नया कूटनीतिक अध्याय लिखा जा सकता है।