‘या तो वो झूठ बोल रहा है या फिर गोरखा है’… नेपाल की बाढ़ में सच हुआ सैम बहादुर का डायलॉग

‘या तो वो झूठ बोल रहा है या फिर गोरखा है’… नेपाल की बाढ़ में सच हुआ सैम बहादुर का डायलॉग

'या तो वो झूठ बोल रहा है या फिर गोरखा है'... नेपाल की तबाही में क्यों सच साबित हुआ सैम बहादुर का यह ऐतिहासिक बयान?

पड़ोसी देश नेपाल में हाल ही में मानसूनी बारिश और भीषण बाढ़ के कारण उपजे हाहाकार ने पूरे उपमहाद्वीप का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। नद उफान पर हैं, पहाड़ी इलाकों से लेकर मैदानी बस्तियों तक जलप्रलय का तांडव जारी है और आम जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो चुका है। इस बीच, सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा की चर्चाओं में भारतीय सेना के महान रणनीतिकार और फील्ड मार्शल सैम मानेकशाह—जिन्हें दुनिया 'सैम बहादुर' के नाम से जानती है—का एक पुराना और बेहद लोकप्रिय कथन अचानक से सबसे बड़ा ट्रेंड बन गया है। लोग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर उनके उस अमर वाक्य—'या तो वो झूठ बोल रहा है या फिर गोरखा है'—को बड़े पैमाने पर साझा कर रहे हैं। नेपाल के आपदा प्रभावित इलाकों में जिस प्रकार से गोरखा सैनिकों ने अपनी जान जोखिम में डालकर राहत और बचाव कार्यों को अंजाम दिया है, उसने एक बार फिर साबित कर दिया है कि अदम्य साहस, वफादारी और इंसानियत की जब भी मिसाल दी जाएगी, उसमें गोरखा जवानों का नाम सबसे ऊपर होगा।

नेपाल में कुदरत का कहर और बाढ़ का भयंकर तांडव

पिछले कुछ दिनों से नेपाल के कई हिस्सों में बादलों के फटने और मूसलाधार मानसूनी बारिश ने भयंकर तबाही मचा रखी है। देश की प्रमुख नदियां खतरे के निशान को पार कर चुकी हैं, जिससे कई बड़े इलाके जलमग्न हो गए हैं। अचानक आई बाढ़ और पहाड़ी क्षेत्रों में हुए बड़े भूस्खलन ने रास्तों को पूरी तरह से जाम कर दिया है, जिससे संपर्क मार्ग कट चुके हैं। हजारों की संख्या में लोग घरों की छतों पर और ऊंचे स्थानों पर शरण लेने को मजबूर हैं। स्थानीय प्रशासन और राहत एजेंसियों के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती इन दुर्गम और कटे हुए इलाकों तक पहुंचना तथा सुरक्षित स्थानों पर फंसे नागरिकों तक खाद्य सामग्री और चिकित्सीय सहायता पहुंचाना है। इस आपदा के कारण नेपाल के नागरिकों में भारी दहशत का माहौल है और हर तरफ केवल तबाही के निशान ही दिखाई दे रहे हैं।

संकट के समय उम्मीद की किरण बनकर उभरे गोरखा जवान

इस विकट प्राकृतिक आपदा में जब चारों तरफ निराशा का माहौल था और सरकारी तंत्र भी भारी भौगोलिक बाधाओं से जूझ रहा था, तब गोरखा सैनिकों ने एक बार फिर अपनी बहादुरी का परचम लहराया है। उफनती हुई नदियों, तेज बहाव वाले पानी और लगातार गिरते पत्थरों के बीच इन जांबाज जवानों ने अपनी जान की परवाह न करते हुए मोर्चा संभाल लिया। स्थानीय लोगों का कहना है कि जहां बड़े-बड़े आधुनिक उपकरण और संसाधन भी नाकाफी साबित हो जाते हैं, वहां गोरखा रेजिमेंट के जवान अपनी शारीरिक सहनशक्ति, मानसिक दृढ़ता और अनुशासन के दम पर रास्ता बना लेते हैं। बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को सुरक्षित ठिकानों पर पहुंचाना हो या मलबे में दबे लोगों को बाहर निकालना हो, इन सैनिकों ने हर मोर्चे पर अद्भुत मानवीय सेवा का परिचय दिया है।

क्यों प्रासंगिक हो गया सैम बहादुर का वो ऐतिहासिक डायलॉग?

फील्ड मार्शल सैम मानेकशाह ने अपने कार्यकाल के दौरान भारतीय सेना में गोरखा सैनिकों की निष्ठा, अटूट वफादारी और असाधारण बहादुरी को बयां करते हुए एक बार कहा था, 'या तो वो झूठ बोल रहा है या फिर गोरखा है'। उनके इस कथन का आशय यह था कि एक गोरखा सैनिक के साहस और उसकी ड्यूटी के प्रति ईमानदारी पर कभी भी शक नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे असंभव लगने वाले कार्यों को भी अपनी वीरता से संभव कर दिखाते हैं। नेपाल की इस मौजूदा बाढ़ आपदा में जब गोरखा सैनिकों ने अपनी जान की बाजी लगाकर अनगिनत जिंदगियां बचाई हैं, तो इतिहास के वे पन्ने एक बार फिर जीवंत हो उठे हैं। यह कोट इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण बन गया है कि मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों में भी गोरखा जवान अपनी जान की परवाह किए बिना इंसानियत की रक्षा के लिए सबसे आगे खड़े रहते हैं।

स्थानीय नागरिकों की जुबानी सेना और जवानों की बहादुरी के किस्से

बाढ़ और भूस्खलन से बुरी तरह प्रभावित क्षेत्रों के कई स्थानीय लोगों ने नम आंखों और भरे गले से गोरखा जवानों की इस निष्ठावान सेवा की सराहना की है। प्रभावित क्षेत्रों के निवासियों का कहना है कि जब चारों तरफ पानी का सैलाब उमड़ रहा था और ऐसा प्रतीत हो रहा था कि अब कोई मदद नहीं पहुंच पाएगी, तब संकटमोचन बनकर आए गोरखा जवानों ने उनके जीवन की रक्षा की। कई घंटों की कड़ी मशक्कत के बाद जान जोखिम में डालकर रस्सियों के सहारे नदी पार कराना या फिर कट चुके रास्तों पर अस्थायी पुल बनाकर लोगों को निकालना कोई आम बात नहीं है, लेकिन इन जवानों ने अपनी असाधारण कार्यशैली से इसे मुमकिन कर दिखाया। सोशल मीडिया पर इन बचाव अभियानों के वीडियो और तस्वीरें तेजी से वायरल हो रही हैं, जिन्हें देखकर पूरी दुनिया इन सैनिकों के जज्बे को सलाम कर रही है।

इस आपदा से भविष्य के लिए सीख और पर्यावरणीय चुनौतियां

यह भीषण त्रासदी न केवल नेपाल के लिए बल्कि पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र के लिए जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान और पर्यावरण असंतुलन के गंभीर परिणामों पर विचार करने की एक बड़ी चेतावनी है। हर साल मानसूनी सीजन में इस तरह की प्राकृतिक आपदाएं भारी मात्रा में जान और माल का नुकसान करती हैं। हालांकि, इस आपदा ने हमें यह भी सिखाया है कि मानवीय संकट के समय आपसी सहयोग, एकजुटता और सैनिकों का अदम्य साहस बड़े से बड़े तूफान को भी मात दे सकता है। नेपाल की इस बाढ़ में सैम मानेकशाह के शब्द केवल एक पुरानी कहावत या इतिहास का हिस्सा बनकर नहीं रहे, बल्कि एक ऐसा जीवंत और शाश्वत सत्य बन गए हैं जो हर दौर में कर्तव्य, निष्ठा और वीरता की नई परिभाषा लिखता रहेगा।