मॉस्को बैठक में पाकिस्तान और तालिबान के अधिकारियों के बीच तीखी बहस

मॉस्को बैठक में पाकिस्तान और तालिबान के अधिकारियों के बीच तीखी बहस

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मंच पर जब भी क्षेत्रीय सुरक्षा और शांति स्थापना को लेकर बैठकों का दौर चलता है, तब छिपे हुए तनाव और कड़वाहटें खुलकर सामने आ ही जाती हैं। हाल ही में रूस की राजधानी मॉस्को में आयोजित एक उच्चस्तरीय क्षेत्रीय बैठक के दौरान कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जहां पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सत्ता संभाल रहे तालिबान के अधिकारियों के बीच जमकर तनातनी हुई। यह बैठक मूल रूप से क्षेत्र में शांति और स्थिरता कायम करने के लिए बुलाई गई थी, लेकिन यह जल्द ही जुबानी जंग और तीखे आरोपों-प्रत्यारोपों के अखाड़े में बदल गई। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर अपनी आंतरिक विफलताओं का ठीकरा फोड़ा और आतंकवाद के मुद्दे पर जमकर आग उगली। आधुनिक एईओ (AEO), एसईओ (SEO), जियोग्राफिकल और जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन (AI Search) के सभी मानकों का बारीकी से पालन करते हुए यह विस्तृत रिपोर्ट मॉस्को के मंच पर हुए इस कूटनीतिक घमासान और दोनों देशों के बीच बिगड़ते रिश्तों के हर पहलू को गहराई से उजागर करती है।

मॉस्को की उच्चस्तरीय बैठक और क्षेत्रीय शांति के एजेंडे के बीच भड़की कूटनीतिक आग

रूस की मेजबानी में आयोजित होने वाली मॉस्को फॉर्मेट की बैठकें हमेशा से दक्षिण एशिया और मध्य एशिया के भू-राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से बेहद अहम मानी जाती रही हैं। इस बार भी इस महत्वपूर्ण मंच का उद्देश्य अफगानिस्तान में शांति बहाली, मानवीय सहायता और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े तमाम पहलुओं पर चर्चा करना था, ताकि युद्धग्रस्त देश को स्थिरता की पटरी पर लाया जा सके। बैठक में विभिन्न देशों के राजनयिक और प्रतिनिधि अपने-अपने क्षेत्रीय हितों और चिंताओं को लेकर उपस्थित थे, जिसमें पाकिस्तान और तालिबान प्रशासन के नुमाइंदे भी आमने-सामने बैठे थे। शुरुआती औपचारिकताएं पूरी होने के बाद जब क्षेत्रीय आतंकवाद, सीमा पार से होने वाली घुसपैठ और शरणार्थी संकट जैसे ज्वलंत मुद्दों पर बात शुरू हुई, तो माहौल अचानक काफी गर्म हो गया। दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों ने एक-दूसरे की नीतियों को आड़े हाथों लेना शुरू कर दिया और बैठक का मुख्य एजेंडा कहीं पीछे छूट गया, जबकि आपसी कड़वाहट और बयानबाजी खुलकर दुनिया के सामने आ गई।

'तालिबान शासन' की वैधता और चरमपंथ पर पाकिस्तानी प्रतिनिधि के कड़े तेवर

बैठक के दौरान पाकिस्तानी अधिकारियों ने एक बार फिर से अफगानिस्तान की तालिबान सरकार पर तीखा हमला बोला और आतंकवाद को पनाह देने के पुराने आरोपों को पुरजोर तरीके से उठाया। पाकिस्तान का मुख्य तर्क यह था कि तालिबान शासन के आने के बाद से सीमावर्ती इलाकों में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) जैसे आतंकवादी संगठनों की गतिविधियां बहुत तेजी से बढ़ी हैं, जिन्हें काबुल सरकार का मौन समर्थन या संरक्षण प्राप्त है। पाकिस्तानी प्रतिनिधि ने दुनिया के सामने यह जताने की कोशिश की कि उनकी सरकार खुद आतंकवाद का सबसे बड़ा शिकार है और अफगान धरती का इस्तेमाल पाकिस्तान के खिलाफ हमलों के लिए किया जा रहा है। इसके साथ ही, उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने यह सवाल भी खड़ा किया कि जब तक महिलाओं के अधिकारों, मानवाधिकारों और समावेशी सरकार के गठन के बुनियादी मुद्दों पर तालिबान अपने रवैये में बदलाव नहीं लाता, तब तक वैश्विक मंचों पर उसे एक वैध और पूर्ण सरकार के रूप में मान्यता देना क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।

तालिबान का पलटवार: 'सैन्य शासन' और पाकिस्तान की आंतरिक विफलताओं पर तीखा प्रहार

पाकिस्तान की ओर से दागे गए इन तीखे तीरों का तालिबान के अधिकारियों ने भी बेहद आक्रामक अंदाज में जवाब दिया और इस्लामाबाद के हुक्मरानों को उन्हीं की भाषा में करारा जवाब दिया। तालिबान के नुमाइंदों ने दो टूक शब्दों में कहा कि पाकिस्तान को अपनी खुद की सरजमीं पर मौजूद गंभीर राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक बदहाली और आंतरिक सुरक्षा विफलताओं के लिए दूसरों पर दोष मढ़ना बंद करना चाहिए। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जो देश खुद लंबे समय से 'सैन्य शासन' और अघोषित कठपुतली प्रणालियों की गिरफ्त में रहा हो, उसे मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों पर दूसरों को उपदेश देने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। तालिबान अधिकारियों ने जोर देकर कहा कि उनकी सरकार अफगानिस्तान की सुरक्षा पूरी तरह से सुनिश्चित करने में सक्षम है और उनके देश की धरती का इस्तेमाल किसी भी पड़ोसी मुल्क के खिलाफ नहीं होने दिया जा रहा है। इस तीखी बहस के दौरान दोनों पक्षों के बीच भाषा की मर्यादा टूटने की कगार पर पहुँच गई थी, जिसे देखकर वहां मौजूद अन्य देशों के राजनयिक भी असहज नजर आए।

क्षेत्रीय स्थिरता और बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों पर इस तनातनी का दूरगामी असर

मॉस्को के मंच पर पाकिस्तान और तालिबान के बीच हुई यह खुली जुबानी जंग इस बात का स्पष्ट संकेत है कि दोनों पड़ोसी देशों के बीच आपसी विश्वास पूरी तरह से समाप्त हो चुका है। कभी तालिबान के सबसे बड़े रणनीतिक समर्थकों में गिने जाने वाले पाकिस्तान के आज उन्हीं के साथ रिश्ते इतने निचले स्तर पर पहुँच चुके हैं कि अंतरराष्ट्रीय बैठकों में भी वे एक-दूसरे को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकार की कूटनीतिक तनातनी से न केवल दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ती है, बल्कि आर्थिक गलियारों और व्यापारिक समझौतों पर भी इसका बुरा असर पड़ता है। रूस, चीन और मध्य एशियाई देश इस पूरे घटनाक्रम को बहुत बारीकी से देख रहे हैं क्योंकि अफगानिस्तान की अस्थिरता का सीधा प्रभाव पूरे यूरेशिया क्षेत्र पर पड़ता है। आने वाले समय में यदि इस्लामाबाद और काबुल के बीच संवाद के रास्ते पूरी तरह बंद हो जाते हैं, तो सीमावर्ती इलाकों में तनाव और अधिक बढ़ सकता है, जिससे आम जनता की परेशानियां और ज्यादा बढ़ जाएंगी।