अगर बेंजामिन नेतन्याहू हारे तो क्या बदल जाएगी भारत-इजरायल की दोस्ती
इजरायल की 120 सीटों वाली संसद (नेसेट) के लिए देश भर में मतदान प्रक्रिया चल रही है। लंबे समय से सत्ता की कमान संभाल रहे प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (बीबी) के राजनीतिक भविष्य और उनकी लिकुड पार्टी की वापसी को लेकर कड़ा मुकाबला देखने को मिल रहा है। इस चुनाव के नतीजे न केवल पश्चिम एशिया की भू-राजनीति को प्रभावित करेंगे, बल्कि नई दिल्ली के विदेश नीति गलियारों में भी इसे उत्सुकता से देखा जा रहा है। भारत में यह सवाल उठ रहा है कि यदि सत्ता परिवर्तन होता है और नेतन्याहू चुनाव हार जाते हैं, तो क्या भारत और इजरायल के बीच दशकों पुराने सामरिक, सैन्य और कूटनीतिक संबंधों में कोई बड़ा बदलाव आएगा? रक्षा विशेषज्ञों और कूटनीतिज्ञों का मानना है कि दोनों देशों की साझेदारी केवल दो नेताओं की व्यक्तिगत केमिस्ट्री पर नहीं, बल्कि गहरे संस्थागत और राष्ट्रीय हितों पर टिकी हुई है।
क्या नेता बदलने से बदल जाएगी रणनीतिक साझेदारी? एक्सपर्ट्स का नजरिया
कूटनीतिक विश्लेषकों और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञों के अनुसार, बेंजामिन नेतन्याहू और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच बेहतरीन व्यक्तिगत संबंध रहे हैं, लेकिन भारत और इजरायल की दोस्ती किसी एक नेता या दल की मोहताज नहीं है। इतिहास गवाह है कि इजरायल में सत्ता चाहे लिकुड पार्टी के पास रहे या यैर लापिड, बेनी गैंट्स या नाफ्ताली बेनेट जैसे विपक्षी नेताओं के हाथ में आए, भारत के प्रति तेल अवीव की सर्वदलीय विदेश नीति हमेशा बेहद सकारात्मक रही है। विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि यदि इजरायल में सरकार बदलती भी है, तब भी द्विपक्षीय संबंधों की मुख्य दिशा पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा। दोनों देश एक-दूसरे की सामरिक और तकनीकी जरूरतों के पूरक हैं, जिसके कारण नेतृत्व में बदलाव के बावजूद यह साझेदारी मजबूत बनी रहेगी।
रक्षा, एआई और कृषि सहयोग: संस्थागत रूप ले चुकी है भारत-इजरायल दोस्ती
भारत और इजरायल के संबंध पिछले एक दशक में केवल 'क्रेता-विक्रेता' के रिश्ते से आगे बढ़कर गहरे संस्थागत ढांचे में तब्दील हो चुके हैं। भारत अपनी सैन्य तैयारियों के लिए बराक-8 मिसाइल सिस्टम, एयर डिफेंस रडार, हेरॉन ड्रोन और साइबर सुरक्षा तकनीकों के लिए इजरायल पर भरोसा करता है। वहीं दूसरी ओर, 'मेक इन इंडिया' के तहत कई इजरायली कंपनियां भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर रक्षा उपकरणों का विनिर्माण कर रही हैं। रक्षा क्षेत्र के अलावा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर, ड्रिप इरिगेशन, जल प्रबंधन और साइबर सिक्योरिटी में दोनों देशों के बीच हुए द्विपक्षीय समझौते किसी एक सरकार के नहीं, बल्कि दोनों राष्ट्रों के दीर्घकालिक हितों से जुड़े हैं। यही कारण है कि नेतन्याहू के सत्ता से बाहर होने की स्थिति में भी रक्षा आपूर्ति और वैज्ञानिक अनुसंधान के प्रोजेक्ट्स बिना किसी रुकावट के चलते रहेंगे।
IMEC कॉरिडोर, I2U2 और पश्चिम एशिया का बदलता कूटनीतिक संतुलन
इजरायल चुनाव के नतीजे भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे पश्चिम एशिया के बड़े आर्थिक प्रोजेक्ट्स की गति तय करेंगे। 'भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर' (IMEC) और 'I2U2' (भारत, इजरायल, अमेरिका, यूएई) जैसे आधुनिक मंचों में इजरायल की भूमिका केंद्र बिंदु में है। हाइफा पोर्ट में भारतीय निवेश और अरब-इजरायल संबंधों को सामान्य बनाने वाले 'अब्राहम अकॉर्ड्स' के भविष्य पर भी नई दिल्ली की निगाह बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इजरायल में कोई नई गठबंधन सरकार आती है, जो क्षेत्रीय अरब देशों के साथ तनाव कम करने और गाजा संकट में कूटनीतिक नरमी की राह चुनती है, तो इससे भारत की 'लुक्स वेस्ट' नीति और IMEC कॉरिडोर की प्रगति को और अधिक बल मिल सकता है।