UNSC में भारत ने मांगा वीटो पावर, पाकिस्तान ने जताई आपत्ति

UNSC में भारत ने मांगा वीटो पावर, पाकिस्तान ने जताई आपत्ति

अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सबसे बड़े मंच यानी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में बदलाव और सुधारों की सुगबुगाहट जैसे ही तेज होती है, पाकिस्तान की नींद उड़ना लाजमी हो जाता है। एक बार फिर से वैश्विक पटल पर यह चर्चा जोरों पर है कि भारत को यूएनएससी की स्थायी सदस्यता और वीटो पावर (Veto Power) मिलनी चाहिए। दुनिया के तमाम ताकतवर देश और ग्लोबल लीडर्स इस बात की वकालत कर रहे हैं कि आज की तारीख में भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश को सुरक्षा परिषद में उचित स्थान मिलना अनिवार्य हो चुका है। लेकिन जैसे ही भारत की इस मजबूत और न्यायसंगत दावेदारी पर अंतर्राष्ट्रीय सहमति बनने लगी है, हमेशा की तरह पाकिस्तान ने अपनी पुरानी और संकीर्ण मानसिकता का परिचय देते हुए इस पर आपत्ति जतानी शुरू कर दी है। पाकिस्तान ने न केवल भारत की इस मांग का कड़ा विरोध किया है, बल्कि खुलेआम यह धमकी भरी चेतावनी भी दी है कि सुरक्षा परिषद में नए सदस्यों को जोड़ना पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो सकता है।

क्या है पूरा विवाद और क्यों यूएनएससी में हो रही है बदलाव की मांग

बीते कई दशकों से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के ढांचे में सुधार की मांग की जा रही है। मौजूदा समय में यूएनएससी के पास जो पांच स्थायी सदस्य देश हैं—अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन—वे द्वितीय विश्व युद्ध के दौर के भू-राजनीतिक समीकरणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। आज की 21वीं सदी की दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे बड़े क्षेत्रों की अनदेखी करके वैश्विक शांति और सुरक्षा के फैसले करना अब असंभव सा हो गया है। भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील (जिन्हें G4 देशों के रूप में जाना जाता है) लगातार यह मांग कर रहे हैं कि संयुक्त राष्ट्र को समकालीन वास्तविकताओं के अनुकूल ढालना चाहिए। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के साथ-साथ वैश्विक शांति सेना में सबसे बड़ा योगदान देने वाला देश और दुनिया की उभरती हुई पांचवीं सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति है। ऐसे में भारत का यूएनएससी में स्थायी सीट का हकदार होना हर पैमाने पर पूरी तरह जायज और तर्कसंगत है।

पाकिस्तान का पुराना राग और सुरक्षा परिषद के विस्तार पर बचकानी आपत्तियां

जब भी संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थायी सदस्यता या वीटो पावर पर चर्चा होती है, पाकिस्तान के पेट में दर्द होना तय माना जाता है। इस बार भी पाकिस्तानी राजनयिकों और हुक्मरानों ने यूएनएससी के गलियारों से लेकर वैश्विक मंचों तक रोना रोना शुरू कर दिया है। पाकिस्तान का तर्क है कि सुरक्षा परिषद में किसी भी नए देश को स्थायी सदस्यता या वीटो पावर देना वैश्विक संतुलन को बिगाड़ देगा। इस्लामाबाद का यह बेतुका दावा है कि वीटो पावर के दायरे को बढ़ाने से निर्णय लेने की प्रक्रिया और अधिक जटिल हो जाएगी, जिससे संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली प्रभावित होगी। इसके साथ ही, पाकिस्तान ने गिदड़भभकी देते हुए यह तक कह डाला है कि यदि भारत जैसे देशों को इसमें शामिल किया गया, तो इससे क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव और अधिक बढ़ जाएगा। पाकिस्तान के इस रवैये से साफ जाहिर होता है कि वह अपनी द्वेषपूर्ण और भारत-विरोधी नीतियों के चलते ग्लोबल रिफॉर्म्स के रास्ते में जानबूझकर रोड़े अटकाने की कोशिश कर रहा है।

दुनिया के बड़े देशों का समर्थन और पाकिस्तान की बढ़ती कूटनीतिक孤立 (Isolation)

हकीकत यह है कि आज वैश्विक समुदाय पाकिस्तान के इन खोखले और पूर्वाग्रह से ग्रसित बयानों को पूरी तरह से खारिज कर चुका है। अमेरिका, फ्रांस, रूस और ब्रिटेन जैसे कई प्रमुख स्थायी सदस्य देश खुलकर भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन कर चुके हैं। उनका मानना है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की उपस्थिति के बिना संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के फैसले अधूरे और अप्रभावी माने जाएंगे। जी-4 देशों के अलावा दुनिया के अधिकांश विकासशील देश भी यह मानते हैं कि यूएनएससी का लोकतंत्रीकरण होना बेहद जरूरी है। ऐसे में पाकिस्तान द्वारा बार-बार बाधा डालने की कोशिश करना केवल उसकी अपनी हताशा और कूटनीतिक नाकामी को ही उजागर करता है। दुनिया के तमाम राजनीतिक एक्सपर्ट्स का यह मानना है कि पाकिस्तान की धमकियों का अब अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है, क्योंकि भारत की मजबूत आर्थिक, सैन्य और राजनीतिक स्थिति आज ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर एक अपरिहार्य सच्चाई बन चुकी है।

भविष्य की वैश्विक राजनीति और भारत की बढ़ती धमक

आने वाले समय में संयुक्त राष्ट्र में सुधारों का यह मुद्दा और अधिक तूल पकड़ने वाला है। जिस तरह से भारत ने अपने कूटनीतिक कौशल, मानवीय सहायता और वैश्विक मंचों पर अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का लोहा मनवाया है, उसने पूरी दुनिया को यह बता दिया है कि भारत अब किसी भी बाहरी दबाव या धमकियों के आगे झुकने वाला नहीं है। पाकिस्तान चाहे जितनी भी कोशिश कर ले या यूएनएससी के विस्तार को रोकने के लिए अनर्गल बयानबाजी कर ले, भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा और सुरक्षा परिषद में उसकी भागीदारी को अब लंबे समय तक टाला नहीं जा सकता है। इतिहास गवाह है कि प्रगति और न्याय के पहिए को कभी भी संकीर्ण स्वार्थों के जरिए रोका नहीं जा सकता। भारत की यह दावेदारी केवल उसकी अपनी जीत नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल साउथ और उन तमाम विकासशील देशों की आवाज है जो दशकों से वैश्विक व्यवस्था में उचित प्रतिनिधित्व की आस लगाए बैठे हैं।