'बस लुढ़कने वाला है ईरान', नेतन्याहू को मिल गई शिया देश की कौन सी कमजोर नस?
अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीतिक गलियारों से इस वक्त दुनिया की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने पश्चिम एशिया के समीकरणों को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एक बार फिर अपने बयानों और रणनीतिक फैसलों से सनसनी फैला दी है। इस बार नेतन्याहू के निशाने पर सीधे तौर पर मध्य ूर्व की सियासत का केंद्र माना जाने वाला शिया बहुल देश ईरान है। इजरायली खुफिया और सैन्य तंत्र को लेकर ऐसा दावा किया जा रहा है कि तेल अवीव के रणनीतिकारों के हाथ तेहरान की वह सबसे कमजोर नस लग चुकी है, जिसे दबाते ही ईरान की सत्ता का पूरा ढांचा तास के पत्तों की तरह ढह सकता है। प्रधानमंत्री नेतन्याहू के इन तेवरों और अंदरूनी खुफिया खुलासों के बाद से पूरी दुनिया के राजनीतिक विश्लेषक यह कयास लगाने लगे हैं कि क्या वाकई ईरान के हुक्मरानों की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है और आने वाले दिनों में मध्य पूर्व का भूगोल हमेशा के लिए बदलने वाला है।
क्या है ईरान की वह अंदरूनी नस जिस पर नेतन्याहू ने साध रखा है अपना सटीक निशाना
दशकों से पश्चिमी देशों और इजरायल के खिलाफ कट्टरपंथी तेवर अपनाने वाला ईरान बाहर से भले ही कितना भी मजबूत और आक्रामक दिखाई देता हो, लेकिन उसके भीतर सुलग रही आंतरिक समस्याएं अब उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन चुकी हैं। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद ने इसी नब्ज को सबसे सटीक तरीके से पकड़ा है। ईरान के भीतर पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से आर्थिक बदहाली, आसमान छूती महंगाई, बेरोजगारी और कड़े धार्मिक प्रतिबंधों के खिलाफ आम जनता का गुस्सा फूटा है, उसने तेहरान की मौलवी हुकूमत की चूलें हिला दी हैं। इसके अलावा, ईरान के भीतर विभिन्न जातीय और भाषाई अल्पसंख्यक समूह भी केंद्रीय शासन के खिलाफ लगातार आवाज बुलंद कर रहे हैं। इजरायली नेतृत्व इस बात को भली-भांति समझ चुका है कि ईरान को हराने के लिए सिर्फ बाहरी सैन्य हमलों की नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक व्यवस्था और जनता के असंतोष को सही दिशा देने की जरूरत है, जो अब ईरान की सरकार के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द साबित हो रहा है।
क्षेत्रीय छद्म युद्ध और छिनता हुआ प्रभाव: कैसे चारों तरफ से घिरता जा रहा है तेहरान
ईरान की ताकत का मुख्य आधार लंबे समय से उसका वह छद्म नेटवर्क रहा है जिसे वह मध्य पूर्व के अलग-अलग देशों में हथियार, फंडिंग और वैचारिक समर्थन देकर चलाता रहा है। लेबनान में हिजबुल्लाह, यमन में हूती विद्रोही और गाजा में हमास जैसे संगठन ईरान के 'प्रॉक्सी' के रूप में उसकी ढाल बनते आए हैं। लेकिन पिछले कुछ महीनों में इजरायल ने जिस आक्रामक और सुनियोजित तरीके से इन तमाम मोर्चों पर इन संगठनों की कमर तोड़ी है, उसने ईरान को अंदर से पूरी तरह अकेला कर दिया है। इजरायली सैन्य हमलों ने न केवल ईरान के इन क्षेत्रीय हथियारों को मलबे में तब्दील किया है, बल्कि तेहरान के इस भ्रम को भी तोड़ दिया है कि वह अपनी सीमाओं से दूर बैठकर दूसरे देशों में युद्ध चला सकता है। जब ईरान का यह आक्रामक मुखौटा ही उतर गया, तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी रणनीतिक लाचारी खुलकर दुनिया के सामने आ गई है।
आर्थिक बदहाली और चरमराती अर्थव्यवस्था के बीच आम जनता का बढ़ता भयंकर रोष
युद्ध और हथियारों की होड़ में अरबों डॉलर झोंकने वाले ईरान की घरेलू अर्थव्यवस्था आज पूरी तरह से बर्बादी के कगार पर पहुंच चुकी है। अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण ईरानी मुद्रा रियाल की कीमत लगभग शून्य के बराबर हो चुकी है, जिससे आम नागरिकों के लिए दो वक्त की रोटी जुटाना भी दूभर हो गया है। देश के युवा भविष्य की तलाश में सड़कों पर उतर रहे हैं और वर्तमान शासन व्यवस्था के खिलाफ खुलकर प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नेतन्याहू बार-बार अपने संबोधनों में इस बात का जिक्र करते रहे हैं कि ईरान के असली मालिक वहां के शासक नहीं, बल्कि वहां की पीड़ित और दबी हुई आवाम है जो इस तानाशाही शासन से मुक्ति चाहती है। आर्थिक मोर्चे पर लग रहे इन ताबड़तोड़ झटकों ने ईरान की सरकार को अंदर से खोखला कर दिया है, और विश्लेषकों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो जनता का यह सैलाब किसी भी वक्त बड़े बदलाव या तख्तापलट का कारण बन सकता है।
पश्चिम एशिया का भविष्य और वैश्विक भू-राजनीति पर पड़ने वाले इसके दूरगामी प्रभाव
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू द्वारा ईरान की इस कमजोर नस को पकड़ने और उस पर लगातार दबाव बनाए रखने के फैसले ने वैश्विक राजनीति की दिशा ही बदल दी है। अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश भी अब खुलकर इजरायल की इस रणनीति का समर्थन कर रहे हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रमों को हमेशा के लिए नेस्तनाबूद करना और क्षेत्रीय आतंकवाद के मुख्य केंद्र को समाप्त करना है। यदि नेतन्याहू की यह रणनीति सफल होती है, तो यह मध्य पूर्व के इतिहास का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक बदलाव साबित होगा, जिससे न सिर्फ एक कट्टरपंथी शासन का अंत होगा बल्कि पूरी दुनिया में शांति और स्थिरता की एक नई उम्मीद जागेगी। आने वाले कुछ सप्ताह और महीने इस बात का फैसला करेंगे कि क्या वाकई ईरान की हुकूमत इन चौतरफा दबावों के आगे घुटने टेकने पर मजबूर होती है या यह संघर्ष किसी और ही भयानक मोड़ पर पहुंचता है।